जानिए कौन हैं गोपाल सिंह विशारद, जिन्हें मृत्यु के 33 साल बाद मिला रामलला की पूजा करने का अधिकार ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 9 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। अयोध्या में राम जन्मभूमि विवाद पर देश की शीर्ष अदालत ने शनिवार को ऐतिहासिक निर्णय के दौरान गोपाल सिंह विशारद को विवादास्पद स्थल पर रामलला की पूजा करने का अधिकार भी दे दिया, परंतु खेद इस बात का है कि गोपाल सिंह इस खुशी का इज़हार करने के लिये जीवित नहीं हैं। अदालत का निर्णय उनकी मृत्यु के 33 साल बाद आया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में गोपाल सिंह विशारद का जिक्र आने के बाद से ही यह सवाल उठ रहा है कि आखिर गोपाल सिंह विशारद कौन हैं ?

कौन थे गोपाल सिंह विशारद ?

दिवंगत गोपाल सिंह विशारद अयोध्या के इस विवाद पर प्रारंभिक चार सिविल मुकदमे दायर करने वालों में से एक थे। चार में से एक सिविल मुकदमे में गोपाल सिंह विशारद और एम. सिद्दीक मुख्य पक्षकार थे। दोनों का ही निधन हो चुका है। बाद में विशारद के बेटे राजेन्द्र सिंह विशारद अपने पिता का मुकदमा लड़ रहे थे। मामला 22 और 23 दिसंबर 1949 की रात को हुए एक घटनाक्रम से जुड़ा था, जिसमें अभय रामदास और उनके साथियों ने राम-जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियों को दीवार फाँद कर मस्ज़िद के अंदरूनी भाग में मुख्य गुंबद के नीचे वाले कमरे में रख दिया था और अगली सुबह यह प्रचार किया गया था कि भगवान राम ने वहाँ प्रकट होकर अपने जन्म स्थान पर पुनः कब्जा कर लिया है। इससे पहले सदियों तक यह मूर्तियाँ मस्ज़िद के बाहर राम चबूतरे पर बिराजमान थीं और वहीं पर सीता रसोई जिसे कौशल्या रसोई भी कहते हैं, उसमें रामलला के लिये भोग बनता था। यह राम चबूतरा और सीता रसोई निर्मोही अखाड़े के नियंत्रण में थे और इसी अखाड़े के साधु-संन्यासी यहाँ रामलला की पूजा-पाठ आदि का विधान करते थे। इसी दिन पुलिस ने मस्ज़िद में मूर्तियाँ रखने का मुकदमा दर्ज किया था, जिसके आधार पर 29 दिसंबर 1949 को मस्ज़िद कुर्क कर ली गई थी और उस पर ताला लगा दिया गया था।

अयोध्या केस में सबसे पहले याचिका कर्ता थे गोपाल सिंह विशारद

1949 में मस्ज़िद के अंदर रखी गईं मूर्तियाँ, फोटो 1950

इसके बाद 16 जनवरी-1950 को गोपाल सिंह विशारद ने सिविल जज की अदालत में सरकार, जहूर अहमद और अन्य मुसलमानों के विरुद्ध मुकदमा दायर करके कहा था कि राम जन्मभूमि पर स्थापित भगवान राम और अन्य मूर्तियों को हटाया न जाए और उन्हें दर्शन तथा पूजा के लिये जाने से भी न रोका जाए। हालाँकि उसी दिन सिविल जज ने स्टे लगा दिया, जिसे बाद में मामूली संशोधनों के साथ जिला जज और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी अनुमोदित किया था। इस स्टे को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, परंतु फाइल पाँच साल तक दबी पड़ी रही। कुछ दिन बाद दिगंबर अखाड़ा के महंत रामचंद्र परमहंस ने भी विशारद जैसा एक और सिविल केस दायर किया। परमहंस उन्हीं लोगों में से एक थे, जिन्होंने मूर्तियाँ मस्ज़िद के अंदर रखी थी और बाद में विश्व हिंदू परिषद के आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। इस आदेश में भी मूर्तियाँ नहीं हटाने और पूजा जारी रखने का आदेश हुआ था। इसके कई साल बाद 1989 में सेवा निवृत्त जज देवकी नंदन अग्रवाल ने स्वयं भगवान राम की मूर्ति को न्यायिक व्यक्ति करार देते हुए नया मुकदमा दायर किया, तब परमहंस ने अपना केस वापस ले लिया था। मूर्तियाँ रखे जाने के लगभग दस साल बाद 1959 में निर्मोही अखाड़े ने जन्म स्थान मंदिर के प्रबंधक के रूप में तीसरा मुकदमा दायर किया था, इसमें राम मंदिर में पूजा और प्रबंध के अधिकार का दावा किया गया था। इसके दो साल बाद 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड और नौ स्थानीय मुसलमानों की ओर से चौथा मुकदमा दायर किया गया था, जिसमें न केवल मस्ज़िद बल्कि आसपास कब्रिस्तान की ज़मीनों पर भी स्वामित्व का दावा किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने विशारद को दिया पूजा करने का अधिकार

वह घर जिसमें गोपाल सिंह विशारद रहते थे

जिला कोर्ट ने चारों मुकदमों को एक साथ जोड़ कर सुनवाई शुरू की थी। दो दशक से भी अधिक समय तक यह एक सामान्य मुकदमे की तरह चलता रहा था। 1986 में गोपाल सिंह विशारद की मृत्यु हो गई। उनके बाद उनके बेटे राजेन्द्र सिंह केस की पैरवी कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की दैनिक सुनवाई के दौरान 30वें दिन मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने दलील पेश की थी कि विशारद ने राम जन्मभूमि पर पूजा के लिये व्यक्तिगत अधिकार का दावा किया था, जो उनकी मृत्यु के साथ ही मुकदमा पूरा हो गया। उनकी मृत्यु के बाद उनकी याचिका का कोई औचित्य नहीं रहा। इस प्रकार गोपाल सिंह विशारद अयोध्या केस में प्रथम याचिकाकर्ताओं में से एक थे। उनकी ओर से पेश हुए वकील रंजीत कुमार ने निर्वाणी अखाड़े के दावे को सुप्रीम कोर्ट में गलत ठहराया था। 69 साल पहले गोपाल सिंह विशारद की याचिका दायर हुई थी और अब जाकर सुप्रीम कोर्ट से उन्हें मस्ज़िद में जाकर रामलला की पूजा करने का अधिकार मिला है, परंतु वे अब इस दुनिया में नहीं हैं।

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