विचित्र, किंतु सत्य : भारत का एक ऐसा युद्ध स्मारक, जो नहीं गाता भारत के शहीदों की गाथा !

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 19 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। आपको यह तो पता है कि 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद हो चुका है, परंतु कदाचित यह पता नहीं होगा कि इसी आज़ाद देश में एक ऐसी भी जगह है, जहाँ आज भी भारत सरकार की नहीं बल्कि ब्रिटिश शासन की हुकूमत चलती है। आज हम आपको उसी स्थान के बारे में बताने जा रहे हैं और यह भी बताएँगे कि मोदी सरकार को राजधानी दिल्ली में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनवाने की जरूरत क्यों महसूस हुई।

कोहिमा युद्ध स्मारक है ब्रिटिश सैनिकों का स्मारक

दरअसल पूर्वोत्तर में नागालैंड की राजधानी कोहिमा में एक युद्ध स्मारक है। इस स्मारक में मात्र शहीद ब्रिटिश सैनिकों की ही कब्रें हैं। इस युद्ध स्मारक को पूरी दुनिया में ‘KOHIMA WAR CEMETERY’ के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध स्मारक में दूसरे विश्वयुद्ध में शहीद हुए 2,700 ब्रिटिश सैनिकों की कब्रें होने से यह ब्रिटिश युद्ध स्मारक के रूप में पहचाना जाता है। इसी स्थान पर चिंडविन नदी के तट पर जापान की सेना ने सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व वाली आज़ाद हिंद फौज के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार पर हमला किया था, जिसमें 2,700 ब्रिटिश सैनिक मारे गये थे। इन सैनिकों की इसी जगह पर कब्रगाह बना दी गई थी, जिसे इतिहास में कोहिमा युद्ध के नाम से भी जाना जाता है।

ब्रिटिश सरकार ने अपने शहीद सैनिकों की याद में इस जगह पर कब्रगाह को युद्ध स्मारक का रूप दे दिया था। चूंकि उस समय ब्रिटेन की दुनिया के कई देशों में सत्ता थी, इसलिये ऐसे कई स्मारक भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे अन्य देशों में भी हैं। इस युद्ध स्मारक में मौजूद सभी स्मारकों की देख-रेख का काम कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव कमीशन करता है, इसलिये ऐसे स्थानों पर भारतीयों को तस्वीरें खींचने से लेकर रख-रखाव के काम के लिये भी ब्रिटिश सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है। बताया जाता है कि पिछले वर्ष इस स्मारक के पास स्थित एक सड़क को चौड़ा करने के लिये भारत की ओर से ब्रिटिश शासन को एक प्रस्ताव भेजा गया था, जिसे ब्रिटिश सरकार ने खारिज कर दिया। वैसे, नेताजी सुभाषचंद्र बोस संस्था के एक पदाधिकारी तमाल सान्याल इस जगह को अपने अधिकार क्षेत्र में लेने के लिये भारत सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं।

आज़ादी के 72 साल बाद देश को मिला पहला राष्ट्रीय युद्ध स्मारक

कोहिमा युद्ध स्मारक भारत में होने के बावजूद इस स्मारक में भारतीय शहीद सैनिकों के लिये ही कोई स्थान नहीं था। यह देश की विडंबना नहीं तो और क्या है कि आज़ादी के 72 साल बाद भी यानी 1947 से लेकर 2019 तक भारत ने 5 युद्ध लड़े, काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन किये, उग्रवाद के विरुद्ध अभियान चलाए, जिनमें लगभग 26 हजार सैनिकों को गँवाया। परंतु इन शहीदों के नाम का कोई अपना युद्ध स्मारक नहीं था। केवल अमर जवान ज्योति है।

देश को पिछले छह दशकों से खुद के राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की प्रतीक्षा थी। इसी दौरान 2014 में केन्द्र की सत्ता में आई नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2015 में ‘राष्ट्रीय युद्ध स्मारक’ बनाने की मंजूरी दी। इसके बाद साढ़े चार वर्ष में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनकर तैयार हुआ। राजधानी दिल्ली में इंडिया गेट के सी-हेक्सगन में कुल लगभग 40 एकड़ भूमि में देश के पहले राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का निर्माण हुआ। इसमें 26 हजार से अधिक शहीद भारतीय सैनिकों के नाम और उनकी रैंक ग्रेनाइट की अलग-अलग शिलाओं पर अंकित किये गये हैं। इस राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में 21 परमवीर चक्र विजेता शहीद सैनिकों की काँसे की मूर्तियाँ भी प्रस्थापित की गई हैं। इस राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के निर्माण के साथ ही भारत दुनिया के उन देशों के क्लब में शामिल हो गया, जिनके पास अपने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक हैं। फरवरी-2019 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के पहले राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का उद्घाटन किया।

अब राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर आयोजित होंगे शहीदों के कार्यक्रम

अभी तक इंडिया गेट पर शहीदों के लिये आयोजित होने वाले कार्यक्रम अब भारतीय शहीद सैनिकों की याद में बनाये गये इस राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में आयोजित होंगे। अब 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्व पर तथा किसी विदेशी मेहमान के द्वारा दी जाने वाली श्रद्धांजलि भी इस स्मारक पर ही दी जाएगी। इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति भी पहले की तरह ही प्रज्जवलित रहेगी। परंतु वहाँ अब केवल प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में शहादत देने वाले कुल लगभग 83 हजार भारतीयों से जुड़ी सैन्य रेजीमेंट्स से सम्बंधित कार्यक्रमों के दौरान ही श्रद्धांजलि दी जाएगी। यह 83 हजार शहीद सैनिक तत्कालीन ब्रिटिश शासन में ब्रिटिश सेना के हिस्सा थे।

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