DIGITAL युग में ‘कछुआ चाल न्याय प्रक्रिया’ पर सीधा प्रहार है हैदराबाद एनकाउंटर…

* अगर निर्दोष को दंड असंवैधानिक, तो न्याय में देरी भी अन्याय

* ‘निर्दोष को दंड नहीं, पर दोषी को दंड में देरी नहीं’ का सूत्रपात आवश्यक

* समय आ गया कि नीति-निर्धारक ‘संतुलन’ की दिशा में सोचें

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 6 दिसंबर, 2012 (युवाPRESS)। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में महिला पशु चिकित्सक के साथ सामूहिक दुष्कर्म और उसके बाद ज़िंदा जला कर उसकी नृशंस हत्या करने के आरोप में बंदी बनाए गए चार आरोपियों को मुठभेड़ में मार गिराए जाने के बाद पूरे देश में जहाँ हर्ष और उत्सव का वातावरण है, वहीं आरोपियों की मृत्यु से पहले कठोर से कठोर दंड देने के लिए सड़क से लेकर संसद तक संग्राम और शोर मचाने वालों में से कइयों ने मानवाधिकार हनन के नाम पर ‘विधवा विलाप’ आरंभ कर दिया है। हैदराबाद एनकाउंटर को लेकर बड़ी संख्या में जहाँ लोग पीड़िता के साथ न्याय होने की बात कह रहे हैं, तो संविधान-विधि-विधान का हवाला देकर पुलिस की आलोचना करने वालों ने भी मोर्चा खोल दिया है।

हैदराबाद पुलिस ने जो किया, वह वैधानिक, न्यायिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से उचित था या अनुचित, यह तो समय बताएगा, परंतु जनभावनाओं ने जिस प्रकार हैदराबाद पुलिस को सैल्यूट किया है, उसका एक सीधा, सरल, स्पष्ट तथा कठोर संदेश यह जाता है कि डिजिटल युग में जीने वाला आज का इंडिया वर्षों पुरानी कछुआ चाल न्याय प्रक्रिया से सहमत नहीं है। हमारे संविधान में लिखा हुआ है, ‘सौ दोषी छूट जाएँ, परंतु एक निर्दोष को दंड नहीं मिलना चाहिए’, परंतु अंग्रेजी के एक वाक्य ‘Justice delayed is justice denied’ की भी अवगणना नहीं की जा सकती। इस वाक्य का अर्थ है, ‘न्याय में देरी अन्याय है।’ हैदराबाद एनकाउंटर ने हमारे देश के नीति-निर्धारकों को यह कड़ा संदेश दिया है कि अब वह समय आ गया है, जब देश के नीति-निर्धारक न्याय प्रक्रिया में ‘निर्दोष को दंड नहीं, पर दोषी को दंड में देरी नहीं’ का संतुलन बनाने की दिशा में सोचें।

बलात्कार की संख्या लाखों में, फाँसी बरसों में क्यों ?

अधिक दूर जाने की आवश्यकता कहाँ है ? वर्ष 2012 में हुए दिल्ली के निर्भया सामूहिक बलात्कार केस के दोषी 7 वर्ष के बाद आज जीवित हैं। क्या न्याय प्रक्रिया में यह विलंब मृतक निर्भया से अधिक उसके परिजनों के साथ अन्याय नहीं है ? निर्भया केस के बाद हमारी सरकारें जागीं और बलात्कार के अपराधियों को कठोर दंड के प्रावधान किए गए, परंतु इससे बलात्कारों की संख्या में क्या अंतर आया ? बलात्कार के मामलों की संख्या न दिल्ली के निर्भया केस से पहले थमी थी और न ही हैदराबाद के दिशा केस से थमी। हंगामा और शोर-शराबा बहुत हुआ। वास्तव में बलात्कारियों के मन में क़ानून का ख़ौफ पैदा करने की आवश्यकता है और वह तभी पैदा होगा, जब अदालतों की न्याय प्रक्रिया में तेजी आएगी और घोषित अपराधियों को एक के बाद एक फाँसी पर लटकाया जाएगा, परंतु घोर आश्चर्य की बात यह है कि हमारे देश में किसी बलात्कारी को फाँसी दिए 15 वर्ष हो चुके हैं। 2004 में बलात्कार के अपराधी धनंजय चटर्जी को फाँसी दी गई थी। उसके बाद बलात्कार के 4 लाख से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं, परंतु फाँसी के फंदे तक एक भी अपराधी को नहीं पहुँचाया जा सका। ऐसा क्यों हुआ ? त्वरित न्याय की दिशा में सरकारों ने फास्टट्रैक कोर्ट का रास्ता निकाला, परंतु यह कितना कारगर सिद्ध हुआ ? इसका उत्तर इसी बात से मिल जाता है कि 2004 के बाद एक भी बलात्कारी को फाँसी पर नहीं लटकाया गया।

क्या ‘दया’ प्रक्रिया को टाला नहीं जा सकता ?

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आज केन्द्र सरकार को सुझाव दिया कि वह यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी अधिनियम (Protection of Children from Sexual Offences Act – POCSO) के तहत दोषी ठहराए जाने वाले अपराधियों को दया याचिका दायर करने के अधिकार से वंचित कर दें। राष्ट्रपति के इस सुझाव में बालिकाओं के साथ होने वाले यौन अत्याचार के विरुद्ध उनकी संवेदना झलकती है, परंतु पोक्सो ही क्यों, किसी भी बलात्कार के मामले में दया याचिका की प्रक्रिया को टालने जैसा कदम क्यों नहीं उठाया जाना चाहिए ? देश जब डिजिटल युग में जी रहा है, बलात्कार के मामलों के लिए फास्टट्रैक कोर्ट हैं, फिर भी निर्भया के अपराधियों को 7 वर्षों के बाद भी फाँसी पर नहीं चढ़ाया जा सका, क्योंकि उनके पास संविधान प्रदत्त दया याचिका का अंतिम विकल्प है। यद्यपि निर्भया के दोषियों की दया याचिका को दिल्ली सरकार, दिल्ली के उप राज्यपाल, केन्द्रीय गृह मंत्रालय और केन्द्र सरकार सभी ने ठुकरा दिया है और राष्ट्रपति से भी यही अनुशंसा की गई है कि वे दया याचिका ठुकरा दें। ऐसे में यह तो निश्चित हो गया है कि निर्भया के अपराधियों को फाँसी पर लटकना ही होगा, परंतु उन्हें 7 वर्ष जीवित रहने का अवसर कैसे मिला ? इसका कारण वही लम्बी, थका देने वाली और पुरानी रुढ़िगत न्याय प्रक्रिया है, क्योंकि फास्टट्रैक कोर्ट तो जल्द से जल्द फ़ैसला सुना देती है, परंतु दोषियों के पास पहले हाई कोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट और उसके बाद दया याचिका जैसे विकल्प होते हैं। ये सारी प्रक्रिया निश्चित रूप से संविधान की भावना ‘बेनुगाह को सजा न हो’ का पालन करवाती हैं, परंतु बलात्कार जैसे मामलों में यह प्रक्रिया निर्भया सहित कई केसों में ‘न्याय में देरी अन्याय’ को सार्थक करने वाली सिद्ध होती है। इसीलिए नीति-निर्धारकों को अब इन दोनों वाक्यों में सामंजस्य बैठाते हुए ऐसी न्याय प्रक्रिया का सूत्रपात करने की दिशा में सोचना चाहिए, जिसकी मूल भावना ‘निर्दोष को दंड नहीं, पर दोषी को दंड में देरी नहीं’ के बीच संतुलन बनाए रखे।

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