महाराष्ट्र का 23/11 : अहंकार की हुई हार, जनादेश का हुआ उद्धार

* मोदी-शाह की चाणक्य नीति के आगे सब फेल

* पवार ही रहे किंगमेकर, परंतु शरद नहीं, अजित

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 23 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत और विशेषकर महाराष्ट्र में नवंबर के महीने की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तारीख़ 26/11 (26 नवंबर, 2008) है, जब मुंबई में भीषण आतंकवादी हमला हुआ था। इसी तरह भारत के लिए राष्ट्रीय स्तर पर हाल ही में 9/11 (9 नवंबर, 2019) भी ऐतिहासिक दिन रहा, जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम जन्म भूमि विवाद को समाप्त करते हुए विवादास्पद भूमि पर भगवान श्री राम का मंदिर बनाने का ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। नवंबर के महीने के इन दो ऐतिहासिक दिनों 26/11 और 9/11 के बाद अब महाराष्ट्र सहित पूरे देश के राजनीति इतिहास में 23/11 भी सदा-सदा के लिए अमर तिथि बन गई है, क्योंकि 23 नवंबर, 2019 का दिन एक ऐसी सुबह लेकर आया, जिसकी बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों ने कल्पना तक नहीं की थी। महाराष्ट्र के इस 23/11 को भारत के राजनीतिक इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। इस 23/11 के ऐतिहासिक दिन में बहुत कुछ समाया हुआ है, क्योंकि किसी की महत्वाकांक्षा को चोट पहुँची, किसी का अहंकार टूटा, किसी के राजनीतिक दाव-पेच विफल हुए, तो कोई किंगमेकर और कोई किंग बना, परंतु इस पूरे घटनाक्रम का सार यह है कि महाराष्ट्र में 24 अक्टूबर को जनता द्वारा दिए गए जनादेश, जो तुच्छ राजनीतिक स्वार्थों के मोह में फँस गया था, का आज उद्धार भी हो गया।

जी हाँ ! 22 नवंबर, 2019 यानी शुक्रवार रात को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के अध्यक्ष शरद पवार ने घोषणा की कि महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी ने शिवसेना को समर्थन देने का निर्णय किया है और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री होंगे। पवार के इस वक्तव्य के बाद पिछले एक महीने से महाराष्ट्र में शिवसेना के मुख्यमंत्री की सरकार का सपना पूरा करने के लिए फुटबॉल बन चुके उद्धव ठाकरे और उनके प्रमुख सिपहसलार संजय राउत चैन की नींद सो रहे थे कि अब उद्धव का राजतिलक होकर ही रहेगा, परंतु 8-10 घण्टों के बीच सब कुछ बदल गया और सुबह 8.05 बजे राजभवन में भारतीय जनता पार्टी (BJP-बीजेपी) नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। सबके आश्चर्य के बीच एनसीपी नेता और शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने भी उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

अहंकार और सत्ता के मोह में फँसे जनादेश को मिली मुक्ति

महाराष्ट्र में रातोंरात हुआ ऐसा भारी उलटफेर कदाचित स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहले किसी भी राज्य में नहीं हुआ होगा। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के लिए वोट 21 अक्टूबर को पड़े थे और जनादेश 24 अक्टूबर को भाजपा-शिवसेना (SS) गठबंधन के पक्ष में आया था, परंतु स्पष्ट जनादेश मिलने के बावज़ूद प्रदेश के लोगों को नई सरकार मिलने में लगभग एक महीना लग गया। अंतत: वही हुआ, जो महाराष्ट्र की जनता चाहती थी। शुक्रवार रात तक यह स्पष्ट लग रहा था कि महाराष्ट्र की जनता ने देवेन्द्र फडणवीस को पुन: मुख्यमंत्री बनाने के लिए जो स्पष्ट जनादेश दिया था, उस जनादेश का अनादर करने की सारी तैयारियाँ पूरी हो गई हैं। शिवसेना के राजहठ के अहंकार और सत्ता के मोह में जनादेश बुरी तरह फँस गया था और कुछ ही घण्टों में वह जनादेश शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी के बेमेल गठबंधन के चलते मटियामेट होने वाला था, परंतु तभी अचानक सब कुछ बदल गया और जनादेश प्राप्त नेता देवेन्द्र फडणवीस ने पुन: मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके साथ ही जनादेश का गला घुटने से बच गया और उसका उद्धार हो गया।

तूफ़ान से पहले के सन्नाटे में छिपी थी सरकार

24 अक्टूबर, 2019 को चुनाव परिणामों की घोषणा के कुछ ही घण्टों बाद जब शिवसेना ने 50-50 फॉर्मूला की ज़िद पकड़ ली, तो भाजपा ने स्वयं को सत्ता की दौड़ से बाहर कर लिया। इसके बाद तेजी से नहीं, बल्कि कछुआ चाल से घटे राजनीतिक घटनाक्रमों में एकमात्र शिवसेना ही उतावली दिखाई दे रही थी, परंतु जिनके भरोसे शिवसेना अपना मुख्यमंत्री बनवाना चाहती थी, वे कांग्रेस-एनसीपी फूँक-फूँक कर कदम रख रही थीं। भाजपा ने सरकार गठन से इनकार करने के साथ ही सार्वजनिक रूप से महाराष्ट्र की राजनीति में पूरी तरह मौन साध लिया था। राजभवन से लेकर मातोश्री और मुंबई से लेकर दिल्ली तक कई राजनीतिक घटनाक्रम घटे। इन घटनाक्रमों के केन्द्र में रहे एनसीपी प्रमुख शरद पवार, जो शिवसेना के राजहठ को पूरा करने के लिए कांग्रेस को समर्थन के लिए सहमत करने में जुटे हुए थे। राजभवन में राज्यपाल से मुलाक़ातों से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और शरद पवार की भेंट, कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले अहमद पटेल की दिल्ली से मुंबई तक दौड़, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे व उनके सिपहसलार संजय राउत के अहंकार भरे वक्तव्यों के बीच भाजपा की छावनी में गहरा सन्नाटा पसरा रहा, परंतु कोई नहीं जानता था कि महाराष्ट्र में जनादेश का अपमान करने के लिए आने वाले तूफ़ान से पहले के इस सन्नाटे में भाजपा की देवेन्द्र फडणवीस सरकार छिपी हुई थी।

उद्धव शरद की परिक्रमा करते रहे, मोदी-शाह बने ‘अजित’

महाराष्ट्र में अपनी सरकार और अपना मुख्यमंत्री बनवाने के लिए शिवसेना, उद्धव ठाकरे और संजय राउत ने दिन-रात एक कर दिए, क्योंकि मीडिया-महाराष्ट्र सहित पूरे देश में एक ही चर्चा थी कि भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूटने के बाद अब पवार ही किंगमेकर हैं और यह बात सही भी सिद्ध हुई, परंतु जो पवार किंगमेकर बने, वे शरद नहीं, अपितु उनके भतीजे अजित हैं। उद्धव ठाकरे शरद पवार की परिक्रमा करते रहे, परंतु उधर दिल्ली में बैठे राजनीति के दो महाचाणक्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने शरद को किनारे कर उनके भतीजे अजित पवार को साधने में सफलता प्राप्त की। मोदी-शाह की चतुराई भरी चाणक्य नीति के आगे उद्धव-सोनिया-शरद की तिकड़ी की सारी चतुराई धरी की धरी रह गई और महाराष्ट्र में फिर एक बार भाजपा ने अल्पमत में होने के बावज़ूद एनसीपी नेता अजित पवार के समर्थन से देवेन्द्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनवा दिया। अंतत: जनादेश भी यही मिला था, क्योंकि पूरे चुनाव प्रचार में मोदी-शाह सहित सभी भाजपा नेताओं ने जनता के बीच स्पष्ट उद्घोषणा की थी कि यदि भाजपा-शिवसेना को पुन: बहुमत मिलेगा, तो देवेन्द्र फडणवीस ही अगले पाँच साल के लिए मुख्यमंत्री होंगे। इसी उद्घोषणा पर विश्वास करके जनता ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन को बहुमत दिया था, परंतु शिवसेना अचानक राजहठ पर उतर आई और जनादेश का गला घोंटने पर आमादा हो गई।

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