बड़ा सवाल : क्या न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव होगा ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 24 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। महाराष्ट्र (MAHARASHTRA) में रातों रात राष्ट्रपति शासन (PRESIDENT RULES) हटाकर भाजपा नेता देवेन्द्र फडणवीस (DEVENDRA FADANVIS) को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाने का मामला सुप्रीम कोर्ट (SUPREME COURT) पहुँचने के बाद रविवार को जो दलीलें हुईं, इन दलीलों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल ये कि क्या इस मामले को लेकर अब न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव तो नहीं होगा ? क्योंकि भारतीय संविधान में दोनों को ही अलग-अलग अधिकार दिये गये हैं और दोनों का कामकाज और कार्य पद्धति भी अलग-अलग है। महाराष्ट्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई याचिका ने यह भी सवाल उठाये हैं कि क्या अब न्यायपालिका और विधायिका की अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखा बनी रहेगी या ये एक-दूसरे के काम में हस्तक्षेप करके एक-दूसरे के अधिकारों को चुनौती तो नहीं देंगी ?

सुप्रीम कोर्ट जाकर भी शिवसेना (SHIV SENA), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और कांग्रेस (CONGRESS) को फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों पक्षकारों की सुनवाई करने की याचिका को स्वीकार करके रविवार को छुट्टी के दिन भी सुनवाई तो की, परंतु किसी भी पक्षकार के पास कोई कागज़ी प्रमाण मौजूद नहीं होने से 3 जजों की खंडपीठ (BENCH) ने सुनवाई सोमवार सुबह 10.30 बजे तक के लिये टाल दी और इसी के साथ सभी पक्षकारों को नोटिस (NOTICE) जारी करके कागज़ी दस्तावेजों के साथ उपस्थित होने का आदेश दिया है।

महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस को लगा है झटका

महाराष्ट्र में 22 नवंबर शुक्रवार की रात को राष्ट्रपति शासन हटा कर अगले दिन 23 नवंबर शनिवार को तड़के महाराष्ट्र के राज्यपाल (GOVERNOR) भगत सिंह कोशियारी (BHAGAT SINGH KOSHYARI) ने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता देवेन्द्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। फडणवीस के साथ एनसीपी के वरिष्ठ नेता अजित पवार (AJIT PAWAR) जो कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार (SHARAD PAWAR) के भतीजे हैं, उन्हें भी उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। जब सुबह उठते ही शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (UDDHAV THACKERAY), एनसीपी प्रमुख शरद पवार और कांग्रेस नेताओं को इस बात का पता चला तो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन ही खिसक गई। क्योंकि यह तीनों ही पार्टियाँ एक-दूसरे के समर्थन से प्रदेश में सरकार गठित करने के प्रयासों में जुटी थीं। शुक्रवार देर शाम को ही तीनों पार्टियों ने उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद के लिये चुन लिया था, जबकि कुछ अन्य मुद्दों पर सहमति बनाने के लिये शनिवार को उनकी दोबारा बैठक होने वाली थी, उससे पहले ही फडणवीस के अजित पवार के समर्थन से प्रदेश में सरकार गठित करके शपथ भी ले लेने से इन तीनों ही पार्टियों को करारा झटका लगा।

सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत

इस प्रकार रातों रात सरकार गठित होने से तीनों पार्टियों ने राज्यपाल, केन्द्र सरकार और यहाँ तक कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (RAMNATH KOVIND) की भूमिका पर भी सवाल उठाये और सरकार गठन के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें तीनों पक्षकारों ने केन्द्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार, मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस और अजित पवार को प्रतिवादी बनाया है। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस अशोक भूषण तथा जस्टिस संजीव खन्ना की खंडपीठ ने रविवार को छुट्टी का दिन होने के बावजूद सुनवाई की। तीनों पक्षकारों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने दलीलें पेश की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से माँग की कि अदालत फडणवीस को विधायकों की जोड़-तोड़ करने का कोई भी मौका दिये बिना सोमवार को ही किसी सीनियर विधायक को प्रोटेम स्पीकर (PROTEM SPEAKER) नियुक्त करने का आदेश दे। साथ ही अदालत प्रोटेम स्पीकर के माध्यम से महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 में चुने गये सभी 288 विधायकों को सदन में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाये और इसी दिन शाम 4 बजे तक फडणवीस सरकार को बहुमत साबित करने का आदेश दे। इतना ही नहीं, अदालत यह भी सुनिश्चित करे कि महाराष्ट्र विधानसभा गृह में होने वाली यह संपूर्ण प्रक्रिया कैमरों की निगरानी में हो, ताकि महाराष्ट्र समेत पूरे देश की जनता भी पारदर्शी तरीके से इस प्रक्रिया को देख सके।

न्यायपालिका और विधायिका के काम अलग-रोहतगी

दूसरी ओर तीनों पक्षकारों की ओर से प्रतिवादी बनाई गई केन्द्र सरकार की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता और भाजपा की ओर से मुकुल रोहतगी ने प्रतिवादियों का पक्ष रखते हुए दलीलें पेश की। रोहतगी ने दलील दी कि संविधान में न्यायपालिका और विधायिका दोनों का काम अलग-अलग है। इसलिये सुप्रीम कोर्ट को विधायिका के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। वादियों के वकीलों ने अदालत से माँगें की हैं, वह स्वीकार नहीं की जा सकती, क्योंकि राज्यपाल के अधिकारों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। उन्होंने दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए कहा कि वादी आनन-फानन में अदालत से प्रोटेम स्पीकर नियुक्त कराने और उसके माध्यम से तुरंत-फुरंत में फ्लोर टेस्ट कराने के निर्देश देने की माँग कर रहे हैं, जो कि उचित नहीं है। ऐसा करना अदालत का विधायिका के काम में हस्तक्षेप करना होगा। यदि विधायिका कोई कानून पास करके सुप्रीम कोर्ट से दो साल में देश के सभी मुकदमों का निपटारा करने को कहे, तो यह न्यायपालिका पर कुठाराघात होगा। इसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट को भी इस मामले को विधायिका के विवेक पर छोड़ देना चाहिये और वादियों की याचिका को खारिज करना चाहिये। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 360 और 361 में राष्ट्रपति व राज्यपाल के अधिकारों का विस्तारपूर्वक वर्णन है। इसी अनुच्छेद 361 के अनुसार राज्यपाल स्वयं के द्वारा लिये गये किसी भी फैसले के लिये किसी भी अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। राज्यपाल को यह स्वतंत्र अधिकार है कि वो किसे मुख्यमंत्री बनायें।

हालाँकि वादी और प्रतिवादी अपने-अपने पक्ष में अदालत के समक्ष कोई कागज़ी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाये। इसलिये अदालत ने इस मामले पर कोई फैसला देने से इनकार कर दिया और सभी पक्षकारों को कागज़ी दस्तावेजों के साथ सोमवार सुबह 10.30 बजे उपस्थित होने का नोटिस जारी करके सुनवाई कल सुबह तक के लिये टाल दी। कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से देवेन्द्र फडणविस की ओर से राज्यपाल के समक्ष पेश किये गये बहुमत और समर्थन के दावे की कॉपी तथा राज्यपाल के आदेश की कॉपी प्रस्तुत करने का आदेश भी दिया है।

इस मामले में दोनों पक्षों की ओर से दी गई दलीलों ने देश के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कोई भी फैसला सुनाता है, उसे लेकर यह बहस अवश्य होगी कि क्या न्यायपालिका को विधायिका के कामकाज में दखल करना चाहिये ? यदि हाँ, तो इसकी सीमा क्या तय होनी चाहिये और क्या विधायिका इसे कुठाराघात के रूप में नहीं लेगी ? ऐसी स्थिति में क्या आगामी दिनों में विधायिका और न्यायपालिका के बीच घर्षण देखने को मिल सकता है ?

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