महाराष्ट्र : कोई कितनी ही बढ़ावै साखा, होइहि सोइ जो ‘भगत’ रचि राखा..?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 12 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। जनता की ओर से चुनाव पूर्व गठबंधन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP)-शिवसेना (SS) को पूर्ण बहुमत दिए जाने के बावज़ूद शिवसेना की अपेक्षाओं के खेल ने न चाहते हुए भी सरकार गठन की गेंद राजभवन में जा गिरी है और अब राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी के ‘विवेकाधिकार’ पर ही महाराष्ट्र का भविष्य टिका हुआ है। राज्यपाल कोशियारी ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन के एक साथ मिल कर सरकार बनाने के लिए पहल नहीं करने के बाद उत्पन्न स्थिति में अब तक अपने विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाई हैं, जिनसे उन पर किसी दल विशेष का पक्षपात करने का कोई भी आरोप न लग सके।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के लिए गत 21 अक्टूबर को वोट पड़े थे और 24 अक्टूबर को स्पष्ट जनादेश भाजपा-शिवसेना गठबंधन के पक्ष में आया था, परंतु शिवसेना के ‘ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री पद’ फॉर्मूला पर अड़ जाने के बाद गठबंधन ने नई सरकार के गठन के लिए पहल नहीं की और इसके साथ ही राजभवन को सक्रिय होना पड़ा। राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी ने परिपाटी का अनुकरण करते हुए सबसे बड़े राजनीतिक दल भाजपा (105 सीटें) को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया, परंतु भाजपा ने बहुमत का आँकड़ा न होने के कारण सरकार गठन से दूरी बना ली। कोशियारी ने अगले विकल्पों पर कार्यारंभ किया और दूसरे सबसे बड़े दल शिवसेना (56 सीटें) को सरकार के गठन के लिए आमंत्रित किया, परंतु शिवसेना 48 घण्टों के भीतर बहुमत का आँकड़ा राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत करने में विफल रही। अब राज्यपाल ने तीसरे सबसे बड़े दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) को न्योता दिया है, जिसे जनता ने 54 सीटें दी हैं। संभव है कि एनसीपी भी यदि 48 घण्टे के भीतर बहुमत का आँकड़ा राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत करने में विफल रही, तो राज्यपाल 44 सीटों वाली कांग्रेस को सरकार गठन के लिए आमंत्रित करें, परंतु अभी ऐसा कहना ज़ल्दबाज़ी होगी।

सब पर भारी कोशियारी की ‘होशियारी’

राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी ने महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर जो ‘होशियारी भरी’ (SMART) प्रक्रिया अपनाई, वह सब पर भारी पड़ी। यदि कोशियारी यह होशियारी नहीं दिखाते, तो संभवत: भाजपा के इनकार के बाद शिवसेना के सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त हो जाता और फिर वह ‘किसी’ भी तरह कांग्रेस-एनसीपी का समर्थन हासिल करने में सफलता प्राप्त कर लेती, क्योंकि जब कोई दल सत्ता पर आ जाता है और उसकी सरकार बन जाती है तथा उसका नेता मुख्यमंत्री बन जाता है, तब कोई ‘कार्य’ कठिन नहीं रह जाता, परंतु कोशियारी ने शिवसेना को आँकड़ों के साथ सरकार गठन के लिए केवल 24 घण्टों का ही समय दिया। महाराष्ट्र में बहुमत के लिए 145 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता है, परंतु केवल 56 सीटों वाली और अपनी ही सरकार तथा अपना ही मुख्यमंत्री बनवाने के राजहठ में फँसी शिवसेना को उसकी कट्टर हिन्दुत्व वाली विचारधारा तथा राजनीतिक विरोधाभास के कारण कांग्रेस-एनसीपी 24 घण्टों के भीतर स्वयं को तैयार नहीं कर सकीं और शिवसेना के सरकार बनाने के अरमानों पर पानी फिर गया। अब बारी एनसीपी की है, तो सीधी-सी बात है कि शिवसेना अपने राजहठ को त्याग कर एनसीपी को समर्थन देने वाली नहीं है। यदि कांग्रेस की बारी आएगी, तब भी राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी नंबर्स मांगेंगे, जो बिना शिवसेना के समर्थन के नहीं बन सकते।

तो क्या राष्ट्रपति शासन ही है अंतिम विकल्प ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर अपने चुनावी-राजनीतिक भाषणों में धारा 356 के दुरुपयोग को लेकर कांग्रेस को घेरते हैं। ऐसे में मोदी कदापि नहीं चाहेंगे कि उनकी सरकार पर भी किसी राज्य में इस धारा के दुरुपयोग का आरोप लगे। इसीलिए नई दिल्ली से राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास और गृह मंत्रालय से मिल रहे निर्देशों तथा अपने विवेक का उपयोग करते हुए राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी यह सिद्ध करना चाहते हैं कि उन्होंने महाराष्ट्र में सरकार के गठन को लेकर कोई कोर-कसर नहीं छोड़े, सभी प्रयास किए। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि शिवसेना के बाद एनसीपी और उसके बाद कांग्रेस यानी इस त्रिकोण के एक नहीं होने की स्थिति में महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन ही अंतिम विकल्प रह जाएगा। गत विधानसभा का कार्यकाल 9 नवंबर को पूर्ण हो चुका है और नई विधानसभा का अभी तक गठन नहीं हुआ है। ऐसे में राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी संवैधानिक संभावनाओं को तलाश लेने-तराश लेने के बाद कोई विकल्प नहीं बचेगा, तो राज्य में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर सकते हैं। यह राज्यपाल के विवेक पर निर्भर रहेगा कि वे प्रस्तावित विधानसभा को निलंबित करते हैं या निष्कासित। यदि विधानसभा निलंबित की जाएगी, तो छह माह या एक वर्ष के भीतर पुन: भाजपा, शिवसेना, एनसीपी या कांग्रेस में से कोई भी दल बहुमत का आँकड़ा जुटा कर सरकार बनाने का दावा कर सकता है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो अंतत: महाराष्ट्र को मध्यावधि चुनाव की ओर अग्रसर होना होगा।

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