महाराष्ट्र का महाबोध : मत हो बहुमत के लिए, छोड़ी कसर तो मिलेगी कसक…

* 40 प्रतिशत ‘अमती’ भी हैं ‘कुमति’ के लिए उत्तरदायी

* 7,42,134 ‘नोटा महारथी’ अनायास बने ‘अन्यायी’

* महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 का सबसे सटीक विश्लेषण

अहमदाबाद 14 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। महाराष्ट्र में दो महीनों तक चले चुनावी घमासान, 21 अक्टूबर को हुए मतदान और 24 अक्टूबर को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP)-शिवसेना (SS) गठबंधन को मिले स्पष्ट बहुमत के बावजूद जनता को नई सरकार मिलने की जगह राष्ट्रपति शासन मिला। यह सब कुछ केवल और केवल शिवसेना के राजहठ के कारण हुआ और शिवसेना को इस राजहठ के लिए उकसाया भाजपा के कमज़ोर प्रदर्शन ने। अब प्रश्न यह उठता है कि इसमें मतदाता कहाँ दोषी हैं ? उन्होंने तो भाजपा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के इस स्पष्ट उद्घोष पर ही भाजपा-शिवसेना गठबंधन को स्पष्ट बहुमत दिया था कि देवेन्द्र फडणवीस ही अगले पाँच वर्षों के लिए मुख्यमंत्री होंगे। इसके बावजूद फडणवीस अब पूर्व मुख्यमंत्री बन चुके हैं।

आज हम महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के परिणामों के बाद उत्पन्न स्थिति का नहीं, वरन् मतदान वाले दिन महाराष्ट्र के 8,98,39,600 मतदाताओं के विवेक का विश्लेषण करने जा रहा हैं। जी हाँ, चुनाव आयोग (EC) के अनुसार महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 8,98,39,600 मतदाताओं को वोट डालना था, परंतु यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य रहा कि इनमें से केवल 60.83 प्रतिशत यानी लगभग 6.77 करोड़ लोगों ने ही मतदान किया। इसका अर्थ यह हुआ कि महाराष्ट्र में 24 अक्टूबर को मतदान के दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित होने के बावजूद लगभग 40 प्रतिशत यानी 2.21 करोड़ से अधिक मतदाता गहरी नींद में सोए रहे और अपने घरों से चंद किलोमीटर की दूरी पर स्थित मतदान केन्द्र में जाकर वोट डालने की ‘तक़लीफ़’ नहीं उठाई। प्रश्न यह उठता है कि यदि इन पौने तीन करोड़ लोगों ने भी यदि मतदान के प्रति जागृति दिखाई होती, तो चुनाव परिणाम में बड़ा उलटफेर नहीं हो सकता था ? अक्सर कहा जाता है कि मतदान के प्रतिशत में गिरावट का सीधा नुकसान भाजपा को होता है। यदि यह कथन सत्य मान लिया जाए, तो क्या यह नहीं कहा जा सकता कि यदि इन पौने तीन करोड़ लोगों ने वोट डाला होता, तो कदाचित भाजपा की सीटों की संख्या बहुमत के आँकड़े 145 से अधिक होतीं ? यदि ऐसा होता, तो शिवसेना का राजहठ जन्म ही नहीं लेता और महाराष्ट्र में पुन: देवेन्द्र फडणवीस की सरकार बन चुकी होती। यह केवल भाजपा के पक्ष में ही होता, यह कहने का इरादा नहीं है। यदि इन ‘अमती’ मतदाताओं ने वोट डाला होता, तो संभव था कि शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) और अधिक शक्ति से उभरती और कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार बनाने की स्थिति में होती।

अब बात कर लेते हैं नोटा महारथियों की। चुनाव आयोग ने मतदाताओं के समक्ष कोई भी प्रत्याशी न पसंद हो, तो None of the above (इनमें से कोई नहीं) यानी NOTA मतदान की व्यवस्था की है, परंतु जिस देश में या जिस राज्य में 40 प्रतिशत लोग मतदान करने ही न जाते हों, वहाँ के लोग नोटा की मूल भावना को कितना समझ सकते हैं ? कई लोग तो स्वयं को बुद्धिमान सिद्ध करने की होड़ में ही नोटा का बटन दबा आते हैं। यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि नोटा का बटन दबाना निश्चित रूप प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, परंतु इसके विवेकपूर्ण उपयोग की भी आवश्यकता है। लोकतंत्र में सबसे बड़ा बहुमत होता है। ठीक है नोटा के रूप में नागरिक को किसी सरकार, राजनीतिक दल या उम्मीदवार के प्रति असंतोष या नाराज़गी व्यक्त करने का पूरा अधिकार है, परंतु यदि विवेक दृष्टि से सोचा जाए, तो नोटा किसी भी समस्या का हल तो कदापि नहीं हो सकता। विशेषकर जिस लोकतंत्र में सरकार का आधार बहुमत हो, वहाँ हर मतदाता को नोटा का उपयोग करने की बजाए किसी एक पक्ष में मतदान अवश्य करना चाहिए। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 में 7,42,134 मतदाताओं ने नोटा पर बटन दबाया। कल्पना कीजिए यदि यही वोट किसी के पक्ष या विपक्ष में जाते, तो कदाचित महाराष्ट्र में राजनीतिक स्थिति में बड़ा उलटफेर हो सकता था।

लोकसभा चुनाव 2014 के बाद हमने भारतीय राजनीति में काफी परिवर्तन देखे हैं। अब लोग किसी एक पक्ष में स्पष्ट बहुमत के महत्व को समझने लगे हैं। यद्यपि अभी और जागरूकता की आवश्यकता है। लोगों को यह समझना होगा कि किसी एक दल के पक्ष में एकजुट और धारदार बहुमत ही किसी भी देश या राज्य में राजनीतिक स्थिरता लाता है और वही इसके विकास का ठोस आधार भी बनता है। इसका स्पष्ट उदाहरण देश ने 2014 ही नहीं, अपितु लोकसभा चुनाव 2019 में भी देखा गया, जब जनता ने एक व्यक्ति और एक दल के पक्ष में स्पष्ट जनादेश दिया, जिसके फलस्वरूप आज केन्द्र में एक स्थिर सरकार शासन कर रही है। यह स्थिरता का ही परिणाम है कि सरकार सही नीति, नीयत और लक्ष्य के साथ साहसी निर्णय भी कर रही है, जिसका लाभ देश के सभी 136 करोड़ नागरिकों को मिल रहा है। यही स्पष्ट और धारदार बहुमत का चमत्कार है। महाराष्ट्र का महाबोध हमें यही सीख देता है कि जब भी वोट करें, बहुमत के लिए करें, अन्यथा महाराष्ट्र की तरह नई सरकार के लिए तरसना पड़ेगा। अल्पमत और खंडित जनादेश महाराष्ट्र की तरह ऐसी कुमतियाँ पैदा करेगा, जो परस्पर वैचारिक मतभेदों के बावजूद आज गठबंधन करने को तैयार हैं और वह भी केवल और केवल सत्ता के लिए।

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