व्हिप में बहुमत : अजित या जयंत की ‘वैधता’ तय करेगी फडणवीस सरकार का भविष्य

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 26 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। महाराष्ट्र में नवगठित देवेन्द्र फडणवीस सरकार का भविष्य विधानसभा सदन में निर्धारित होने वाला है। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी या सुप्रीम कोर्ट (SC) की ओर से निर्देशित तिथि पर जब महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत परीक्षण होगा, तभी यह निर्धारित होगा कि महाराष्ट्र में बहुमत का आँकड़ा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) नेता व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के पास है या शिवसेना (SS), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) और कांग्रेस (CONGRESS) अर्थात् SNC की ओर से दिखाई गई एकजुटता के पास है।

पिछले 24 घण्टों में घटे घटनाक्रमों को केवल राजनीतिक तमाशे की तरह ही देखा जा सकता है, क्योंकि यह सब जानते हैं या कोई नहीं जानता कि सार्वजनिक रूप से एकजुट दिखाई दे रहे 160 से अधिक विधायकों की एकजुटता विधानसभा में बनी रहेगी या नहीं ? सोमवार के घटनाक्रम से मोटी तसवीर यह उभर कर सामने आती है कि एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार की धारदार कवायद के बाद भाजपा के साथ जा चुके एनसीपी नेता अजित पवार खाली हाथ हैं और फडणवीस के लिए विधानसभा में बहुमत सिद्ध करना लोहे के चने चबाने जैसा कठिन कार्य हो गया है, परंतु यह केवल माना ही जा सकता है, क्योंकि जब तक विधानसभा में एसएनसी की विधायकों की एकजुटता साकार नहीं होती, तब तक यह मान लेना भी अनुचित होगा कि फडणवीस ने अजित पवार के साथ मिल कर सरकार बना कर कोई बड़ी चूक कर दी है।

विधानसभा में शह-मात के खेल में जीत महत्वपूर्ण

जिस दिन भी विधानसभा सत्र बुलाया जाएगा, उस दिन विधानसभा के भीतर जो शह-मात का खेल होगा, वह सबसे महत्वपूर्ण होगा। यह खेल ही फडणवीस सरकार के भविष्य और भाजपा के विरुद्ध एकजुट हुई शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की रणनीति की सटीकता सिद्ध करेगा। विधानसभा की कार्यवाही पूर्णत: संवैधानिक नियमों के अनुसार होती है और इन नियमों के अंतर्गत नवगठित विधानसभा में सबसे पहले कार्यवाहक अध्यक्ष (प्रोटेम स्पीकर) की नियुक्ति की जाती है, जिसका दायित्व नए विधायकों को विधायक पद की शपथ दिलाना होता है। यहीं से भाजपा और एसएनसी के बीच शह-मात का खेल आरंभ होगा। परंपरा के अनुसार निर्वाचित विधायकों में सर्वाधिक वरिष्ठ विधायक को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाता है और यदि ऐसा हुआ, तो कांग्रेस के बाबासाहेब थोराट प्रोटेम स्पीकर बन सकते हैं, परंतु संवैधानिक रूप से ऐसा करना अनिवार्य नहीं है। यदि भाजपा ने विरोध किया, तो कोई और भी प्रोटेम स्पीकर बन सकता है। सरकार और विरोधियों की असली परीक्षा विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव के समय होगी। संवैधानिक परंपरा के अनुसार विधानसभा अध्यक्ष सत्तारूढ़ दल के विधायक को बनाया जाता है। एसएनसी के विरोध के बावज़ूद यदि भाजपा अपना विधानसभा अध्यक्ष बनवाने में सफल रही, तो फडणवीस सरकार को 50 प्रतिशत जीत इसी सफलता के साथ मिल जाएगी।

व्हिप बनेगा चीफ : अजित में फडणवीस, जयंत में उद्धव

विधानसभा में अध्यक्ष के चुनाव के बाद ही फडणवीस सरकार विश्वास मत प्रस्ताव प्रस्तुत करेगी, परंतु उस पर मतदान की दिशा, दशा और परिणाम का निर्धारण व्हिप के माध्यम से होगा। सदन में प्रस्तुत होने वाले किसी भी प्रस्ताव से पूर्व प्रत्येक राजनीतिक दल के विधायक दल का नेता (Leader Of Legislative Party) अर्थात् LLP व्हिप जारी करता है, जिसमें वह अपने विधायकों को प्रस्ताव के पक्ष में या विपक्ष में मतदान करने का आदेश देता है और जो इस आदेश का उल्लंघन करता है, वह आगे चल कर विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित हो जाता है। महाराष्ट्र विधानसभा में भाजपा, शिवसेना और कांग्रेस विधायक दल के नेताओं को लेकर स्थिति स्पष्ट है, परंतु एनसीपी विधायक दल के नेता को लेकर संशयपूर्ण स्थिति है। चुनाव परिणामों के बाद शरद पवार ने अजित पवार को एनसीपी विधायक दल का नेता चुना था, परंतु अजित के भाजपा के साथ चले जाने के बाद पवार ने अजित को हटा कर जयंत पाटिल को एलएलपी यानी पार्टी विधायक दल का नेता बना दिया है। यद्यपि शरद पवार ने अभी तक अजित पवार को एनसीपी से निलंबित या निष्कासित नहीं किया है। यही सबसे बड़ा प्लस पॉइंट बन सकता है फडणवीस के लिए। संवैधानिक मामलों के जानकारों का भी कहना है कि यदि बहुमत परीक्षण के दौरान अजित पवार और जयंत पाटिल दोनों ने व्हिप जारी किया, तो अध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण बन जाएगी। अध्यक्ष ने यदि अजित पवार के व्हिप को मान्यता दी, तो इस व्हिप के विरुद्ध जाकर मतदान करने वाले एनसीपी के विधायक सदन की सदस्यता के अयोग्य घोषित कर दिए जा सकते हैं। अध्यक्ष अजित पवार को मान्यता इस आधार पर दे सकते हैं, क्योंकि शरद पवार ने अजित को एनसीपी विधायक दल के नेता पद से हटाया है, परंतु पार्टी से नहीं हटाया। ऐसे में यदि अजित पवार के व्हिप को मान्यता मिली और एनसीपी के साथ खड़े दिखाए जा रहे 53 विधायकों ने फडणवीस सरकार के विश्वास मत प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया, तो वे उनके वोट निरस्त हो जाएँगे। ऐसे में बहुमत का आँकड़ा 118 पर आ जाएगा, जिसका प्रबंध फडणवीस सरकार आसानी से कर लेगी, क्योंकि अकेले भाजपा के पास 105 विधायक हैं और उसे आवश्यकता पड़ेगी केवल 13 विधायकों की।

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