EXCLUSIVE : महा‘राष्ट्र’ में सबने किया ‘विश्वासघात’, जनता करेगी सबका ‘हिसाब’…

* शुद्ध जनादेश के बावज़ूद शिवसेना का राजहठ ‘पाप’ नहीं ?

* एनसीपी-कांग्रेस का शिवसेना को समर्थन देना ‘पाप’ नहीं ?

* भाजपा का रातों-रात फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाना ‘पाप’ नहीं ?

* तीनों ‘पापों’ के बाद बचने-बनने वाली सरकार ‘निष्पाप’ कहलाएगी ?

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 26 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। राष्ट्र आज यानी 26 नवंबर, 2019 को संविधान दिवस मना रहा है, परंतु महाराष्ट्र में संविधान की धज्जियाँ उड़ाने वाला जो ‘पाप कर्म’ पिछले एक महीने से चल रहा है, उसका परिणाम भी ‘पाप’ ही होगा और इस पाप का उत्तरदायी अर्थात् पापी कौन है, इसका चयन महाराष्ट्र की जनता करेगी। महाराष्ट्र की जनता गत 24 अक्टूबर से अपने राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के चाल, चेहरे और चरित्र को बहुत ही सूक्ष्मता से देख रही है और उसे यह सुनिश्चित करने में तनिक भी संशय नहीं होगा कि उसके द्वारा दिए गए शुद्ध जनादेश के बावज़ूद राज्य में सत्ता के लिए संग्राम होने के लिए कौन-कौन उत्तरदायी हैं और किन-किन नेताओं ने किस-किस तरह केवल मुख्यमंत्री पद की प्राप्ति के लिए उसके साथ विश्वासघात किया है।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के लिए 21 अक्टूबर को हुए मतदान में राज्य के लोगों ने शुद्ध, स्पष्ट, सीधा और सरल जनादेश दिया था, जो चुनाव पूर्व गठबंधन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP)-शिवसेना (SS) के पक्ष में था। 24 अक्टूबर को चुनाव परिणाम आने के बाद जनता अपने द्वारा दिए गए शुद्ध जनादेश की फलश्रुति के रूप में महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार देखना चाहती थी, परंतु भारतीय राजनीति में कदाचित ऐसा पहली बार हुआ होगा कि जनता के शुद्ध बहुमत देने के पश्चात् भी वही सरकार का गठन नहीं हो सका, जिसके पक्ष में जनादेश था। आम जनता को यही आशा थी और उसके मन में यह बात भी सीधी लक़ीर की तरह खिंची हुई थी कि भाजपा-शिवसेना गठबंधन को बहुमत मिलने के बाद देवेन्द्र फडणवीस ही मुख्यमंत्री बनेंगे, क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से लेकर सभी ने खुलेआम यही बात कही थी कि यदि भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार बनी, तो फडणवीस ही अगले पाँच साल के लिए मुख्यमंत्री होंगे। दूसरी तरफ शिवसेना ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान कभी भी भाजपा नेताओं की इस खुली उद्घोषणा पर विरोध तो क्या, आपत्ति तक नहीं जताई। इसका सीधा अर्थ यह था कि जनता यह जानती थी कि भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार बनी, तो मुख्यमंत्री फडणवीस ही होंगे।

शिवसेना ने आरंभ की ‘पाप’ की राजनीति

महाराष्ट्र के लोगों द्वारा दिए गए शुद्ध बहुमत के बाद 24 अक्टूबर को ही यह सुनिश्चित हो चुका था कि फडणवीस ही पुन: मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे, परंतु शिवसेना को अचानक वह 50-50 फॉर्मूला याद आ गया, जो कहीं कोई रिकॉर्ड में ही नहीं था। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और उनके सिपहसलार संजय राउत ने 25 अक्टूबर से ही दावा करना शुरू कर दिया कि उद्धव ठाकरे और अमित शाह के बीच हुई बातचीत के दौरान यह तय हुआ था कि नई सरकार 50-50 फॉर्मूला के आधार पर बनेगी अर्थात् भाजपा और शिवसेना ढाई-ढाई साल का मुख्यमंत्री पद मिलेगा। प्रश्न यह उठता है कि यदि ठाकरे व राउत के दावे में सच्चाई थी, तो उन्होंने चुनाव से पहले या प्रचार के दौरान क्यों इस बात का उल्लेख नहीं किया ? परिणाम आने के बाद ही अचानक इस फॉर्मूला की याद कैसे ताज़ा हो गई ? दूसरी तरफ भाजपा ने शिवसेना के इस दावे को निरस्त कर दिया, तब संजय राउत ने कहा, ‘भाजपा ने यदि 50-50 फॉर्मूला पर अमल नहीं किया, तो शिवसेना एनसीपी-कांग्रेस का समर्थन लेकर भी अपना मुख्यमंत्री बनवाने का पाप करने से परहेज नहीं करेगी।’ राउत के वक्तव्य से स्पष्ट है कि शिवसेना यह अच्छी तरह जानती है कि वह एनसीपी-कांग्रेस का समर्थन लेकर पाप कर रही है। ऐसे में जनता को यह सुनिश्चित करने में तनिक भी कठिनाई नहीं होगी कि महाराष्ट्र में शुद्ध जनादेश के बावज़ूद पाप की राजनीति का आरंभ शिवसेना ने किया।

एनसीपी-कांग्रेस बनीं ‘पाप’ की भागीदार

जब भाजपा ने 50-50 फॉर्मूला नकार दिया, तो शिवसेना पाप करने पर आमादा हो गई। अब गेंद एनसीपी और कांग्रेस के पाले में थी कि वह शिवसेना का समर्थन करे या न करे ? कोई भी साधारण और विवेकी व्यक्ति जब भली-भाँति यह जानता हो कि उसके समक्ष खड़े व्यक्ति का लक्ष्य पाप करना है, तो क्या वह उस पाप में भागीदार बनेगा ? इस प्रश्न का उत्तर तो जनता अच्छी तरह जानती है, परंतु एनसीपी-कांग्रेस उत्तर जानते हुए भी शिवसेना के पाप में भागीदार बनने पर सहमत हो गईं। जो शरद पवार कुछ दिन पहले तक यह कह रहे थे कि जनता ने एनसीपी को विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है, वही पवार एनसीपी-कांग्रेस और शिवसेना के बीच पाप की भागीदारी करवाने में जुट गए। सोनिया गांधी को सहमत करने से लेकर विधायकों की परेड करवाने तक शरद पवार एक-एक पाप के प्रमुख कर्ता बने, जबकि राजनीतिक मूल्यों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले कांग्रेस नेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी और शरद पवार यह अच्छी तरह जानते थे कि कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना की विचारधारा किसी भी बिंदु पर मेल नहीं खाती। शिवसेना ने तो राजहठ के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता किया, परंतु एनसीपी-कांग्रेस की क्या मज़बूरी थी कि वह शिवसेना के पाप में भागीदार बनें ? भाजपा को सत्ता से दूर रखने का जो ज़ुनून कर्नाटक में था, वैसा ज़ुनून महाराष्ट्र में न तो कांग्रेस में था और न ही एनसीपी में। फिर एनसीपी-कांग्रेस ने शिवसेना के इस पाप में क्यों भागीदारी की ? यदि यह प्रश्न उचित है, तो जनता शिवसेना ही नहीं, अपितु एनसीपी-कांग्रेस को भी उनके पापों का दुष्परिणाम अवश्य देगी ?

खुल गया भाजपा के ‘निष्पाप’ होने का ढोंग

लगभग 20-25 दिनों तक मौन और शांत रही भाजपा को लेकर महाराष्ट्र की जनता में यही सकारात्मक संदेश जा रहा था कि फडणवीस ने सरकार न बनाने का निर्णय कर अच्छा ही किया। जनता के मन में भाजपा की निष्पाप छवि उभर रही थी कि अचानक भाजपा के निष्पाप होने का ढोंग भी तब उजागर हो गया, जब रातों-रात राष्ट्रपति शासन हटा दिया गया और एनसीपी विधायक दल के नेता अजित पवार के साथ मिल कर देवेन्द्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। जो जनता अब तक एनसीपी-कांग्रेस और शिवसेना के राजनीतिक पापाचार को खुली आँखों से देख रही थी, उसी जनता को जब भाजपा का यह रूप देखने को मिला, तो वह हतप्रभ रह गई। यह सही है कि जनता ने फडणवीस को ही मुख्यमंत्री बनवाने के लिए भाजपा-शिवसेना गठबंधन को शुद्ध बहुमत दिया था, परंतु फडणवीस का एनसीपी को तोड़ कर इस तरह मुख्यमंत्री बनना भी जनता की दृष्टि में एनसीपी-शिवसेना-कांग्रेस के पापाचार से कम नहीं है। यदि भाजपा ने दिल्ली से मिले निर्देशों के अनुसार फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाने का दाव न खेला होता, तो आज उस पर संविधान की हत्या करने जैसे आरोप नहीं लगते। वास्तव में भाजपा को एनसीपी-कांग्रेस-शिवसेना की सरकार बनने देनी चाहिए थी, क्योंकि यह सरकार आपसी वैचारिक मतभेदों के बीच किसी भी सूरत में पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती, परंतु भाजपा ने धैर्य खोकर वही पाप की राह अपनाई, जिसकी शुरुआत शिवसेना ने की और कांग्रेस-एनसीपी भी भागीदार बनीं।

महाराष्ट्र को नहीं मिलेगी ‘निष्पाप’ सरकार

सुप्रीम कोर्ट ने फडणवीस को बुधवार को विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने का निर्देश दिया है। विधानसभा में जो भी उठापटक होगी, वह भविष्य के गर्भ में है, परंतु जो-जो संभावनाएँ दिखाई देती हैं, उससे स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की जनता को अब ‘निष्पाप’ सरकार नहीं मिलेगी। पहली संभावना तो यह है कि फडणवीस बहुमत सिद्ध कर देंगे, परंतु ऐसा दो स्थितियों में संभव होगा। पहला यह कि शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के सार्वजनिक रूप से एकजुट दिखाई दे रहे विधायक क्रॉस वोटिंग करें और दूसरा यह कि विधानसभा अध्यक्ष एनसीपी नेता अजित पवार द्वारा जारी किए जाने वाले व्हिप को मान्यता दें। दोनों ही परिस्थितियों में महाराष्ट्र की जनता द्वारा दिए गए शुद्ध जनादेश के विरुद्ध फडणवीस सरकार बच सकती है। यदि फडणवीस सरकार गिर जाती है, तब भी महाराष्ट्र को निष्पाप सरकार नहीं मिलेगी, क्योंकि ऐसी स्थिति में शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे अगले मुख्यमंत्री बनेंगे, जो महाराष्ट्र की जनता की पसंद नहीं हैं, क्योंकि न चुनाव से पूर्व उद्धव न तो मुख्यमंत्री पद का चेहरा थे और न ही जनता ने शिवसेना को इतनी अधिक सीटें ही दी हैं। इस प्रकार महाराष्ट्र में यदि जनता के मन की, जनता की भलाई करने वाली निष्पाप सरकार चाहिए, तो पुन: चुनाव कराना ही सबसे श्रेष्ठ मार्ग है और यही होगा भी। यदि फडणवीस सरकार बच जाएगी या उद्धव सरकार बन जाएगी, तो भी उनके पाँच वर्ष तक चलने की कोई गारंटी नहीं है और ऐसे में राज्य में मध्यावधि चुनाव अवश्यसंभावी हो जाएँगे।

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