अब उद्धव होंगे महाराष्ट्र के महाराज : सिर पर होगा काँटो वाला ताज ?

विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 26 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। महाराष्ट्र के सियासी महा-संग्राम में एक बार फिर बाज़ी पलट गई है और सत्ता की चाबी अब पुनः शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस के हाथ में आ गई है। इन तीनों दलों के गठबंधन का नाम ‘महा विकास अघाड़ी’ रखा गया है, जिसकी आज एक बार फिर संयुक्त बैठक हुई, जिसमें शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे को अघाड़ी का नेता और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार चुना गया। अब तीनों दलों के नेता राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी से मिल कर राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। इसके बाद 1 दिसंबर सोमवार को शिवाजी पार्क में उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। उनके साथ एनसीपी के विधायक दल के नेता जयंत पाटिल और कांग्रेस विधायक दल के नेता बालासाहेब थोराट उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। इस प्रकार अब उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के नये महाराज बनने जा रहे हैं। उनके सिर पर मुख्यमंत्री का ताज सजने जा रहा है, परंतु सवाल यह उठता है कि वे जिस गठबंधन के नेता बने हैं, उसमें अभी तक कुछ मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई है, ऐसे में क्या यह ताज उद्धव के लिये काँटों वाला ताज बनने वाला है ? और क्या उद्धव ठाकरे पवार के पावर को झेल पाएँगे ? उद्धव को अब ऐसे कई सवालों के जवाब भी तलाशने पड़ेंगे।

शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस में अभी भी कुछ मुद्दों पर सहमति नहीं

21 अक्टूबर को महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव और उसके बाद 24 अक्टूबर को आए चुनाव परिणामों के बाद से ही शिवसेना ने भाजपा के समक्ष ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री और मंत्रालयों के बँटवारे में फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले की शर्त रख कर अपनी सरकार में भागीदारी बढ़ाने की महत्वाकांक्षा जाहिर कर दी थी। जब भाजपा के साथ बात नहीं बनी तो उद्धव ठाकरे ने उससे गठबंधन तोड़ लिया और अब ऐसे दलों के साथ गठबंधन किया है, जो विचारधारा में शिवसेना से बिल्कुल उलट हैं। इतना ही नहीं, पिछले एक महीने में तीनों दलों की बैठकें कई बार हुई हैं, परंतु तीनों दलों के नेता कभी साथ नज़र नहीं आए, न ही बैठक के बाद तीनों दलों के नेताओं ने संयुक्त रूप से कोई घोषणा की। पिछले सप्ताह शुक्रवार की बैठक की बात करें तो शरद पवार ने बाहर निकलने के बाद जाहिर किया था कि उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद के लिये सर्व सहमति से उम्मीदवार चुन लिया गया है। इसके कुछ देर बाद ही कांग्रेस नेता ने कहा था कि अभी भी कुछ मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई है, जिसके लिये शनिवार को फिर से बैठक होगी। इस बीच देवेन्द्र फडणवीस ने सरकार रचकर सियासी संग्राम में नया दाँव चल दिया, जिससे तीनों दल बौखला गये। अब जब देवेन्द्र फडणवीस ने इस्तीफा दे दिया है और फिर एक बार उद्धव के पास मुख्यमंत्री बनने का मौका आया है, उससे पहले पिछले चार दिन में जो भी सियासी घटनाक्रम हुए, उसमें एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार की भूमिका महत्वपूर्ण रही, जिसने प्रदेश की राजनीति में उनका कद और बढ़ा दिया है।

उद्धव के लिये आसान नहीं आगे की राह

इस बढ़े हुए कद ने ही सोमवार को एक बयान दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी भी शिवसेना से ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री की बातचीत चल रही है। यह बयान किसी और ने नहीं, बल्कि प्रदेश के सबसे वयोवृद्ध राजनीतिकार शरद पवार के मुख से निकला है। यह दर्शाता है कि विधानसभा में शिवसेना की 56 सीटों की तुलना में 54 सीटों के साथ दूसरे नंबर की एनसीपी भी महत्वाकांक्षी है। अब राजनीति के जानकार इस बयान के मायने निकालने में जुटे हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि कांग्रेस के बयान को भी हलके में नहीं लिया जा सकता, जिसमें उसने कहा है कि कुछ मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई है। ऐसे में यह तो तय है कि तीनों दलों ने जल्दबाजी में सरकार बनाने का फैसला तो कर लिया है, परंतु कुछ मुद्दों पर अभी भी उनके बीच पेंच फँसे हुए हैं। ऐसे में सरकार बनने के बाद विभागों के बँटवारे में इनके बीच विवाद उठने की पूरी संभावना है। तीनों दलों में एनसीपी और उसके अध्यक्ष शरद पवार का पावर जिस तरह से बढ़ा है, उसे भी उद्धव ठाकरे नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएँगे। कुल मिला कर तीनों दलों को साथ लेकर चलना और सरकार में भागीदारी से संतुष्ट करना उद्धव के लिये बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा। ऐसे में उद्धव के लिये आगे की राह आसान नहीं होने वाली है, यह स्पष्ट है। बता दें कि राज्यपाल ने देवेन्द्र फडणवीस के इस्तीफे के कुछ समय बाद ही 7 बार विधायक चुने गये भाजपा के सीनियर विधायक कालीदास कोलंबकर को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया है और बुधवार सुबह 8 बजे विधानसभा का सत्र बुलाया है, जिसमें राज्यपाल के संक्षिप्त भाषण के बाद प्रोटेम स्पीकर नवनिर्वाचित विधायकों को शपथ दिलाएँगे।

You may have missed