महाराष्ट्र : आँकड़ों से समझिए क्यों फडणवीस ही हैं मुख्यमंत्री पद के अधिकारी ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 2 नवम्बर, 2019 (युवाPRESS)। महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) और शिवसेना (SHS) के बीच जिस तरह तलवारें खिंची हैं, उससे महाराष्ट्र की जनता सदमे में है। महाराष्ट्र की जनता ने मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के नेतृत्व वाले भाजपा-शिवसेना गठबंधन को पूर्ण बहुमत दिया है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा-शिवसेना के बीच जारी मतभेद के कारण राज्य में 10 दिनों के बाद भी नई सरकार का गठन नहीं हो सका है।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के लिए गत 21 अक्टूबर को मतदान हुआ था और 24 अक्टूबर को घोषित परिणामों में जनता ने भाजपा (105)-शिवसेना (56) गठबंधन को 161 सीटों पर भव्य जीत देकर विपक्ष कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस (NCP-राकांपा) को विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया था, परंतु स्पष्ट जनादेश के बावजूद भाजपा-शिवसेना के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर शुरू हुई खींचतान से आम जनता दिग्मूढ़ है। भाजपा-शिवसेना के बीच तल्खी का मुख्य कारण विधानसभा चुनाव 2014 की तुलना में भाजपा की सीटों में कमी आना है। शिवसेना भाजपा की स्थिति कमज़ोर होने का उपयोग अपने खोए हुए रुतबे को पुन: हासिल करने के लिए करना चाहती है, जबकि शिवसेना यह भूल जाती है कि 2014 की तुलना में उसे भी कम सीटें मिली हैं। यहाँ आपको याद दिला दें कि 2014 में भाजपा-शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था और भाजपा को 122, तो शिवसेना को 63 सीटें मिली थीं, परंतु 2019 में दोनों ने साथ मिल कर चुनाव लड़ा। इसके बावजूद भाजपा की सीटें घट कर 105 पर आ गईं, तो शिवसेना की सीटों का ग्राफ भी 56 पर सिमट गया।

आँकड़े बताते हैं कि फडणवीस ही मुख्यमंत्री पद के अधिकारी

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 में भाजपा की स्थिति कमज़ोर होने के कारण शिवसेना हावी होना चाहती है, परंतु चुनाव परिणामों की तह में जाने पर पता चलता है कि राज्य की जनता ने शिवसेना के सहयोग से देवेन्द्र फडणवीस को ही पुन: मुख्यमंत्री बनाने का जनादेश दिया है। 288 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव में भाजपा-शिवसेना ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, जिसके अनुसार भाजपा ने 150 सीटों पर, तो शिवसेना ने 124 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। भाजपा ने 150 सीटों में से 105 पर जीत हासिल की। इस तरह भाजपा की जीत का प्रतिशत 70 जितना ऊँचा है, जबकि शिवसेना ने 124 सीटों पर चुनाव लड़ कर केवल 56 पर जीत हासिल की, जो केवल 45 प्रतिशत जीत दर्शाता है। बात प्राप्त मतों की करें, तो उसमें भी शिवसेना की तुलना में भाजपा का पलड़ा भारी है। भाजपा को 25.75 प्रतिशत वोट हासिल हुए हैं, जबकि शिवसेना को मात्र 16.41 प्रतिशत वोट ही प्राप्त हुए हैं। कुल मिला कर महाराष्ट्र का जनादेश भाजपा-शिवसेना गठबंधन के पक्ष में, शिवसेना के सहयोग से देवेन्द्र फडणवीस को पुन: मुख्यमंत्री बनाने के लिए है।

अहंकार-प्रतिशोध की आग में सब झुलसेंगे

शिवसेना के ढाई वर्ष के लिए मुख्यमंत्री पद मांगने की जिद के कारण महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन में गतिरोध पैदा हुआ है। शिवसेना और भाजपा दोनों एक-दूसरे पर अहंकार का आरोप लगा रही हैं। वास्तव में लोकसभा चुनाव 2014 के बाद भाजपा ने महाराष्ट्र में अपनी ताक़त लगातार बढ़ाई और वर्षों से महाराष्ट्र में शिवसेना की जूनियर पार्टी बने रहने की स्थिति से स्वयं को बाहर निकाला। विधानसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने अकेले दम पर चुनाव लड़ कर सरकार भी बनाई, जिसके साथ ही शिवसेना की ताक़त घटने लगी। अब जबकि 2019 में भाजपा की स्थिति थोड़ी कमज़ोर हुई, तो शिवसेना भाजपा पर हावी होने का राजनीतिक खेल खेल रही है। शिवसेना को पुन: वही बड़े भाई वाला रुतबा चाहिए, जो कभी बाला साहब ठाकरे के जीवनकाल में उसे मिला हुआ था, परंतु चुनाव परिणामों के आँकड़े स्पष्ट कहते हैं कि जनता ने शिवसेना इतना बहुमत नहीं दिया है कि वह ढाई साल का मुख्यमंत्री पद मांग सके। यदि ऐसा ही है, तो अन्य उम्मीदवारों को 18 प्रतिशत और एनसीपी को भी 16 प्रतिशत से अधिक मत मिले हैं। शिवसेना यदि 16 प्रतिशत मत पाकर मुख्यमंत्री पद पाना चाहती है, तो फिर शरद पवार भी मुख्यमंत्री पद के दावेदावर कहे जा सकते हैं। वास्तव में शिवसेना प्रतिशोध की आग में जल रही है। अहंकार-प्रतिशोध की इस लड़ाई में अंतत: हानि भाजपा और शिवसेना दोनों को ही होगी, लाभ किसी को भी नहीं होगा।

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