क्या कहते हैं मतदान के आँकड़े और इतिहास ? : अमित बनेंगे ‘शाह’ और अहमद बनेंगे ‘पटेल’ ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

लोकसभा चुनाव 2014 में पूरे देश में गुजरात की चर्चा थी। पूरे देश की नज़रें गुजरात पर थीं। पूरे चुनाव अभियान के दौरान गुजरात-गुजरात की गूँज थी, क्योंकि भाजपा-एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इतना ही नहीं, मोदी स्वयं भी गुजरात की वडोदरा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे थे। इतना ही नहीं, मोदी तब केवल एक मुख्यमंत्री ही थे। उनके पास सांसद का भी अनुभव नहीं था। इसलिए वे चुनाव प्रचार में भी गुजरात को गुंजायमान कर रहे थे। गुजरात में किए विकास कार्यों को मॉडल के रूप में पूरे देश में प्रचारित कर रहे थे। मोदी के हर भाषण में गुजरात का कई बार उल्लेख होता था, परंतु लोकसभा चुनाव 2019 में नज़ारा बदला हुआ है।

इस बार न तो नरेन्द्र मोदी अकेले गुजरात के प्रधानमंत्री हैं और न ही वे गुजरात में किसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। उनके पास देश को बताने के लिए केन्द्र में अपनी सरकार की ओर से किए गए कार्यों का पूरा चिट्ठा है। इसके बावजूद वे यदा-कदा गुजरात का नाम लेने से नहीं चूकते, परंतु 2014 जैसी चर्चा गुजरात की इस बार नहीं है। इसके बावजूद गुजरात इस बार दो मुख्य कारणों से चर्चा के केन्द्र में रहा और 23 मई तक गुजरात इन दो कारणों से चर्चा में बना रहेगा और ये दो कारण हैं देश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों के चाणक्यों का गुजरात के चुनावी मैदान से उतरना।

जी हाँ। एक तरफ सत्तारूढ़ और देश व दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के अध्यक्ष और चुनावी रणनीति के चाणक्य अमित शाह पहली बार गांधीनगर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सबसे पुराने वफादार, रणनीतिकार, सलाहकार और दिग्गज नेता अहमद पटेल 35 वर्षों बाद भरूच लोकसभा सीट से चौथी बार चुनावी मैदान में कूदे। इसके साथ ही गुजरात की 26 लोकसभा सीटों में गांधीनगर और भरूच देश की प्रमुख और गुजरात की 2 सबसे बड़ी हॉट सीटों में शामिल हो गईं। एक हैं शाह, तो दूसरे हैं पटेल। ये दोनों ही उपनाम अपने आप में नेतृत्व के द्योतक है। शाह वो कहलाते हैं, जो विजयी होते हैं। पटेल का एक अर्थ व्यक्तियों के एक समुदाय का नेतृत्व करना भी होता है। ऐसे में ये दोनों चाणक्य यानी अमित वास्तव में शाह और अहमद वास्तव में पटेल सिद्ध होंगे या नहीं ? यह देखना दिलचस्प रहेगा।

बढ़ा मतदान शाह को दिलाएगा रिकॉर्ड जीत ?

चुनाव आयोग (EC) की ओर से जारी किए गए मतदान के अधिकृत आँकड़ों के अनुसार गांधीनगर लोकसभा सीट के लिए 65.57 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 2014 में मोदी लहर में हुए मतदान से 0.47 प्रतिशत अधिक है। 2014 में मोदी लहर में भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने यह सीट 4,83,121 मतों से जीती थी। भाजपा ने 1991 से 2014 के दौरान छह बार चुनाव जीतने वाले आडवाणी की जगह इस बार अमित शाह को चुनावी मैदान में उतार कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अनुपस्थिति के प्रभाव को कम करने की रणनीति अपनाई। मतदान में हुई वृद्धि यह दर्शाता है कि भाजपा के इस गढ़ में लोगों ने कदाचित अमित शाह के पक्ष में भारी मतदान किया होगा। यदि ऐसा ही हुआ हो, तो संभव है कि अमित शाह गांधीनगर सीट रिकॉर्ड मतों से जीत जाएँ। वैसे भी शाह की जीत तो तय ही मानी जा रही है। भाजपा का ज़ोर तो, पिछली बार से अधिक मतों से शाह की जीत सुनिश्चित करने पर ही था। अब शाह केवल जीतते हैं या रिकॉर्ड मतों से जीतते हैं, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा।

घटा मतदान अहमद को देगा चौथी जीत ?

चुनाव आयोग (EC) की ओर से जारी किए गए मतदान के अधिकृत आँकड़ों के अनुसार भरूच लोकसभा सीट के लिए 73.22 प्रतिशत भारी मतदान हुआ, परंतु यह 2014 के मुकाबले 1.31 प्रतिशत कम है। 2014 में मोदी लहर में बह कर भरूच के मतदाताओं ने भाजपा के मनसुख वसावा को 1,53,273 मतों के भारी अंतर से जीत दिलाई थी। वैसे भाजपा इस सीट पर 1989 से 2014 के दौरान हुए लोकसभा के सभी चुनाव-उप चुनाव जीतती आई है, परंतु एक समय भरूच सीट कांग्रेस का गढ़ थी। 1951, 1957 और 1962 के चुनाव में कांग्रेस यहाँ आसानी से जीती, परंतु 1977 में जब पूरे देश में इंदिरा विरोधी लहर थी, तब कांग्रेस ने पहली बार अहमद पटेल को भरूच से चुनाव मैदान में उतारा। विपरीत परिस्थितियों में भी अहमद पहली बार जीत कर भरूच सीट पार्टी के लिए बचाए रखने में सफल रहे। इसके बाद अहमद ने 1980 और 1984 में भी जीत दर्ज कर हैट्रिक जमाई, परंतु इसके बाद वे केन्द्र की राजनीति में चले गए। 1991 से भरूच सीट भाजपा का गढ़ बन गई। अब अहमद पटेल 35 वर्षों बाद यहाँ से चौथी बार मैदान में हैं। वैसे मतदान में कमी आना कांग्रेस के लिए फायदेमंद रहता है। इस लिहाज से अहमद की राह आसान भी हो सकती है, परंतु यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 73.22 प्रतिशत भारी मतदान होने का मतलब यह है कि मतदाताओं ने संभवतः केन्द्रीय मुद्दों को विशेष रूप से ध्यान में रखा हो। इतना ही नहीं, अहमद पूरे 35 साल बाद भरूच की राजनीति में लौटे हैं। ऐसे में इतने लंबे समय बाद पुनः 35 साल पुरानी लोकप्रियता पाना कितना आसान रहा होगा उनके लिए, यह भी सवाल है। यदि व्यक्तिकेन्द्री चयन की बात हो, तो भी लोकप्रियता के मामले में अहमद पटेल पर मोदी ही भारी पड़ते हैं। ऐसे में भरूच के मतदाताओं ने भारी, परंतु 2014 के मुकाबले कम मतदान किसके पक्ष में किया है, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा।

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