EXCLUSIVE : देश के बाद अब ‘दिल’ की बारी, पूरब से पश्चिमोत्तर तक भाजपा भारी !

* सबसे महत्वपूर्ण होगा जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव

* तीन राज्यों में भाजपा, दो राज्यों में एनडीए सरकार

* दिल्ली के दिल में रहेगी AAP या पड़ेगी मोदी की छाप ?

* दुर्दिनों से गुज़र रही कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 7 जून, 2019 (युवाप्रेस.कॉम)। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और अभी-अभी देश ने अपने लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव मनाया है, परंतु इस लोकतंत्र का चुनावों के साथ ऐसा चोली-दामन का नाता है कि हर छह महीने में कहीं न कहीं चुनाव होते ही रहते हैं। देश की जनता कई स्तर के शासकों और प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए वोट करती रहती है और नए-नए परिमाण और मानदंड स्थापित करती रहती है।

बात यदि सबसे बड़े उत्सव की करें, तो उसे सामान्य चुनाव कहते हं, जो हर पाँच वर्ष में होता है। उसे लोकसभा चुनाव भी कहा जाता है, जो हाल ही में कई नए मानदंड स्थापित करते हुए सम्पन्न हुआ है। लोकसभा चुनाव 2019 जहाँ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) पर दोबारा मुहर लगा गया, वहीं मोदी के नेतृत्व पर देश की जनता ने दूसरी बार अधिक विश्वास व्यक्त कर यह भी सिद्ध कर दिया कि देश अब जाति-धर्म के नाम पर नहीं, अपितु काम पर वोट देता है। देश का कोई भी धर्म, कोई भी जाति किसी पार्टी विशेष की बपौती या वोट बैंक नहीं है।

यह तो हुई लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व की बात, परंतु दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में हर दो-चार महीने में चुनावी दंगल आते ही रहते हैं। अभी लोकसभा चुनाव पूरे ही हुए थे कि पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में निकाय चुनावों की ख़बरें आईं। लोकतंत्र की विशेषता और सुंदरता देखिए कि एक तरफ तो पश्चिम बंगाल में मतदाताओं ने लोकसभा की तर्ज पर ही निकाय चुनाव में वोट कर भाजपा का समर्थन किया, वहीं इसके ठीक विपरीत कर्नाटक में भाजपा ने जहाँ लोकसभा की 28 में से 25 सीटें जीतीं, वहीं निकाय चुनावों में सबसे आगे रही कांग्रेस, दूसरे स्थान पर जेडीएस और तीसरे स्थान पर भाजपा रही।

कश्मीर में पहली बार ‘शाही’ चुनाव

ख़ैर, यह तो सबसे बड़े लोकसभा चुनाव और सबसे निचले स्तर के निकाय चुनावों की बात हुई। अब बात करते हैं दूसरे नंबर के महत्वपूर्ण राज्य विधानसभा चुनावों की। लोकसभा चुनाव 2019 के साथ ही आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम विधानसभा चुनाव भी हुए, परंतु अलग-अलग राज्यों के विधानसभा कार्यकाल को देखते हुए स्पष्ट कहा जा सकता है कि अगले 18 महीनों में देश के 6 राज्यों में नई सरकारें चुनने के लिए विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। इन 6 राज्यों में सबसे महत्वपूर्ण है जम्मू-कश्मीर, जहाँ इस समय राष्ट्रपति शासन है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद जम्मू-कश्मीर सबसे चर्चित राज्य बन गया है, जहाँ शाह विधानसभा चुनाव से पहले परिसीमन कराने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। यदि परिसीमन के बाद ही विधानसभा चुनाव हुए, तो निश्चित रूप से परिणामों में बड़ा उलटफेर होगा। चुनाव आयोग (EC) कह चुका है कि अमरनाथ यात्रा की समाप्ति के बाद वह जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव कराने को तैयार है। ऐसे में मोदी सरकार और शाह को नवम्बर-2019 से पहले परिसीमन कार्य सम्पन्न करा लेना होगा। जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव नवम्बर-दिसम्बर-2014 में हुए थे, जिसमें उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) सरकार परास्त हुई थी। 87 सदस्यीय विधानसभा में किसी को बहुमत नहीं मिला था। 28 सीटों के साथ मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व वाली पीपल्स डेमोक्रैकिटक पार्टी (PDP) सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि भाजपा पहली बार 25 सीटें जीत कर दूसरे स्थान पर रही थी, जबकि सत्तारूढ़ एनसी 15 सीटों पर सिमट गई थी। त्रिशंकु विधानसभा के चलते राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। दो महीने बाद 1 मार्च को भाजपा-पीडीपी ने मिल कर सरकार बनाई और सईद मुख्यमंत्री बने। एक साल पूरा करने से पहले ही सईद का निधन हो गया और राज्य में फिर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। तीन महीने बाद भाजपा ने सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती को सीएम बनाते हुए सरकार बनाई, परंतु 2 साल 2 महीने में भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया। राज्य में 20 जून, 2018 से राष्ट्रपति शासन लागू है। अब यदि जम्मू-कश्मीर में इस साल के अंत में चुनाव हुए, तो भाजपा और अमित शाह जहाँ लोकसभा चुनाव 2019 की तर्ज पर, अपितु परिसीमन के जरिए राज्य में पहली बार पूर्ण बहुमत के लिए आवश्यक 44 सीटें जीतने का जुगाड़ करने का प्रयास करेंगे। दूसरी तरफ कांग्रेस-एनसी गठबंधन और तीसरी तरफ पीडीपी होगी।

महाराष्ट्र में फडणवीस हैं बोनस फैक्टर

महाराष्ट्र में सितम्बर-अक्टूबर-2019 में चुनाव होने हैं। हाल में यहाँ भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार है, जिसका नेतृत्व देवेन्द्र फडणवीस कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति के चलते लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना ने जहाँ कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) गठबंधन को चारों खाने चित्त कर दिया, वहीं अब विधानसभा चुनाव में मोदी-शाह, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के उपरांत मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस का शासन बोनस फैक्टर के रूप में काम करेगा। 288 सदस्यीय विधानसभा के लिए 2014 में हुए चुनाव में भाजपा ने अकेले दम पर 122 सीटें हासिल की थीं, जबकि शिवसेना को भाजपा से युति तोड़ने का नुकसान हुआ था और वह 63 सीटें ही जीत पाई थी। कांग्रेस को 42 व एनसीपी को 41 सीटें मिली थीं। चुनाव के बाद शिवसेना ने भाजपा को समर्थन दे दिया और भाजपा नेता फडणवीस मुख्यमंत्री बन गए। 2019 आने तक भाजपा-शिवसेना की दुश्मनी फिर दोस्ती में बदल गई। ऐसे में विधानसभा चुनाव में फडवणीस की वापसी निश्चित लगती है। कांग्रेस-एनसीपी लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारी हैं। ऐसे में दोनों पार्टियों के सामने तो 2014 का प्रदर्शन दोहराना भी बड़ी चुनौती होगा।

हरियाणा में हर-हर मनोहर

सितम्बर-अक्टूबर-2019 में ही दूसरे बड़े राज्य हरियाणा में विधानसभा चुनाव होगा, जहाँ मनोहरलाल खट्टर के नेतृत्व में भाजपा सरकार सत्तारूढ़ है। पिछले चुनाव 2014 में भाजपा ने कांग्रेस की भूपिंदर सिंह हुड्डा को बेदखल करते हुए 90 में से 47 सीटें जीत कर सरकार बनाई थी। भाजपा ने चुनाव से पहले CM का चेहरा घोषित नहीं किया था, परंतु जीत के बाद अचानक संघ के प्रचारक खट्टर बड़ा चेहरा बन कर उभरे। खट्टर ने अपने कामकाज से उन्हें नौसीखिया बताने वालों को करार जवाब दिया। इतना ही नहीं, निकाय चुनावों भाजपा के शानदार प्रदर्शन से खट्टर ने विरोधियों के मुँह पर ताला लगा दिया। खट्टर ने रही-सही कसर लोकसभा चुनाव में मोदी-शाह के सहयोग से सभी 10 सीटें जीत कर निकाल दी। ऐसे में यह तय है कि भाजपा इस बार खट्टर के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। 2014 में इंडियन नेशनल लोक दल (INLD) को 19, कांग्रेस को 15 व अन्य को 9 सीटें मिली थीं, परंतु 2019 में जिस कदर मोदी-शाह-खट्टर का जादू हरियाणा के सिर चढ़ कर बोला, उससे लगता है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को 90 में से तीन चौथाई से अधिक सीटें मिल जाएँ, तो आश्चर्य नहीं होगा।

झारखंड में अबकी बार 60 के पार का नारा

82 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में 81 सीटों के लिए चुनाव होते हैं। भाजपा ने इस बार अबकी बार 60 के पार का नारा दिया है, क्योंकि लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा ने 14 में से 11 सीटें जीती हैं। पिछले पाँच वर्षों में परिस्थितियाँ बदली हैं। 2014 में भाजपा को 81 में से 37 सीटें ही मिली थीं। भाजपा ने आजसू पार्टी (AJSUP) के (5 विधायकों) समर्थन से सरकार बनाई और रघुवर दास मुख्यमंत्री बने। बाद में झारखंड विकास मोर्चा (JVM) के 6 विधायक भाजपा में शामिल हो गए, जिससे बहुमत की चिंता समाप्त हो गई। 2014 में शिबू सोरेन के नेतृत्व वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) को 19, जबकि झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) (JVMP) को 8 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं, परंतु 2019 में भाजपा-मोदी-शाहकी सुनामी में कांग्रेस-जेवीएम गठबंधन सहित सारे विरोधी झड़ गए। यही कारण है कि भाजपा के हौसले बुलंद है और वह विधानसभा चुनाव में 81 में से 60 सीटें जीतने का दावा कर रही है।

देश के दिल दिल्ली की दिलचस्प कहानी

डेढ़ वर्ष यानी जून-2019 से दिस्बर-2020 तक की अवधि में होने वाले छह में से चार राज्यों के बारे में तो हमने आपको बता दिया, परंतु सबसे दिलचस्प चुनाव होंगे देश की राजधानी, देश का दिल कहे जाने वाले दिल्ली के। दिल्ली की कहानी बड़ी घुमावदार रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 जनवरी में होने वाले हैं, परंतु उनके संभावित परिणामों पर प्रकाश डालने से पहले हम आपको दिल्ली विधानसभा के इतिहास की यात्रा कराते हैं। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि दिल्ली विधानसभा के लिए पहला चुनाव 1952 में हुआ था। 48 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस ने 39 सीटों के साथ सत्ता हासिल की थी। यद्यपि बाद में 1956 में दिल्ली का पार्ट C राज्य का दर्जा वापस ले लिया गया। 37 वर्ष बाद 1993 में पुनः दिल्ली को केन्द्र शासित राज्य के रूप में घोषित कर विधानसभा अस्तित्व में लाई गई। इस दूसरी विधानसभा के चुनाव में जनता ने भाजपा को बहुमत दिया, परंतु इस दौरान दिल्ली ने मदन लाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और सुषमा स्वराज के रूप में तीन-तीन मुख्यमंत्री देखे। इससे तंग आकर जनता ने 1998 में कांग्रेस को सत्ता सौंपी। शीला दीक्षित ने फिर दिल्ली पर 15 वर्षों तक एकछत्र शासन किया, परंतु अण्णा हज़ारे के लोकपाल आंदोलन के चलते दिल्ली में सत्तारूढ़ केन्द्र की कांग्रेस नीत यूपीए-मनमोहन सरकार और दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार दोनों के विरुद्ध हवा बनी। यही कारण था कि अण्णा आंदोलन से नेता के रूप में निकले अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी (आप-AAP) बना कर विधानसभा चुनाव 2013 में सत्तारूढ़ कांग्रेस और मुख्य विपक्ष भाजपा के विकल्प के रूप में दावेदारी की। त्रिकोणीय मुकाबले में दिल्ली की जनता ने खंडित जनादेश दिया और भाजपा 70 में से 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन कर भी केवल इसलिए सरकार नहीं बना सकी, क्योंकि 28 सीटों वाली AAP, 8 सीटों वाली कांग्रेस से या 2 निर्दलीयों से समर्थन लेना या मिलना असंभव था। ऐसे में पहले ही चुनाव में सीधे 28 सीटें जीतने वाले केजरीवाल को कांग्रेस ने समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनवा दिया। इसी बीच लोकसभा चुनाव 2014 आए। दिल्ली से आगे राष्ट्रीय स्तर पर छा जाने की केजरीवाल की ललक ने AAP की लुटिया डुबो दी और दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटों पर मोदी लहर के सहारे भाजपा जीत गई। 2013 के मुकाबले 2014 में दिल्ली का मूड बदल गया। इसके बाद कांग्रेस से मतभेद के चलते केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया और दिल्ली में जनवरी-2015 में फिर एक बार विधानसभा चुनाव आन पड़े। दिल्ली का मूड फिर बदला, परंतु इस बार जैसा मूड बदला, वैसा इतिहास में कभी नहीं बदला। दिल्ली की जनता ने राज्य के लिए शासक के रूप में न अनुभवी व 15 वर्ष तक शासन करने वाली कांग्रेस नेता शीला दीक्षित पर मुहर लगाई और न ही देश में सफल नेतृत्व दे रहे नरेन्द्र मोदी व देश की प्रथम महिला IPS अधिकारी किरण बेदी के नाम पर भाजपा को ही वोट दिया। दिल्ली के लोगों ने केजरीवाल की AAP को 70 में से ऐतिहासिक रूप से 67 सीटें देकर दिल्ली की कमान सौंपी। भाजपा 2013 में मिली 32 सीटों से सिमट कर 3 पर आ गई, वहीं 2013 में 8 सीटें ही पा सकने वाली कांग्रेस खाता भी नहीं खोल सकी।

कौन-सा इतिहास दोहराएगी दिल्ली ?

अब बात वर्तमान की करते हैं। दिल्ली में विधानसभा चुनावों के बीच अब मुश्किल से छह महीने शेष हैं। ऐसे में AAP और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वही मुफ्त वाले हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए हैं, जिनके बल पर वे 0 से 28 और फिर 67 सीटों तक पहुँचे, परंतु जितन भारी बहुमत-उतनी भारी अपेक्षाएँ। इस लिहाज़ से प्रश्न यह उठता है कि क्या केजरीवाल सरकार 2015 में किए गए सभी वायदों को पूरा करने में सफल रही है ? दिल्ली की जनता अब जनवरी-2020 में होने वाले चुनावों में AAP, भाजपा और कांग्रेस के त्रिकोणीय संघर्ष में तीनों को अलग-अलग पैमाने पर मापेगी और राज्य के लिए सरकार चुनेगी। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि दिल्ली की जनता कौन-सा इतिहास दोहराना पसंद करेगी ? लोकसभा चुनाव 2014 में लोकसभा की सभी 7 सीटें भाजपा को देने के बावजूद विधानसभा चुनाव 2015 में AAP पर 67 सीटें न्यौछावर करने वाला इतिहास यदि दोहराया जाता है, तो यह निश्चित है कि 2019 में लोकसभा की सभी 7 सीटें भाजपा को दे देने वाली दिल्ली 2020 में फिर एक बार केजरीवाल को ही मुख्यमंत्री के रूप में श्रेष्ठ चेहरे के रूप में पसंद करेगी, परंतु राजनीतिक प्रवाहों और धाराओं का अध्ययन करने के बाद कहा जा सकता है कि 2015 और 2020 के चुनाव में कई फर्क हैं। पहला और बड़ा फर्क यह है कि 2015 में केजरीवाल नए और सुधारवादी नेता के रूप में उभरे थे। कांग्रेस-भाजपा की ‘चलत’ राजनीति से इतर नए विचारों के साथ केजरीवाल ने एंट्री की थी, परंतु 2020 में केजरीवाल को पाँच वर्षों के कामकाज की कसौटी पर कसा जाएगा। 2015 में केजरीवाल के विरुद्ध बोलने के लिए भाजपा के पास कुछ खास नहीं था, तो कांग्रेस की औक़ात नहीं थी, परंतु 2020 में केजरीवाल को घेरने के लिए भाजपा के पास कई मुद्दे हैं और उस पर कांग्रेस की ओर से भी चुनौती मिलने के कारण केजरीवाल की AAP की नैया त्रिकोणीय मुकाबले में फँस कर डूब भी सकती है। त्रिकोणीय मुकाबले के कारण ही AAP को लोकसभा चुनाव में 7 में से 1 भी सीट नहीं मिली। दिल्ली में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही AAP और कांग्रेस के पास एक विकल्प गठबंधन का है, जो उन्होंने 2019 में नहीं किया और पछताए। 2020 में उन्हें यह गठबंधन कर लेना चाहिए। इससे केजरीवाल को अपनी सत्ता बचाने में मदद मिल सकती है।

बिहार में परिवर्तनशील नीतिश बने रहेंगे सहनशील ?

इन डेढ़ वर्षों में सबसे अंत में होंगे बिहार विधानसभा चुनाव। अक्टूबर-नवम्बर-2020 में होने वाले चुनावों में जनता दल ‘युनाइटेड’ (जदयू-JDU) और भाजपा गठबंधन सरकार की कसौटी होगी। जेडीयू नेता नीतिश कुमार की ‘परिवर्तनशील’ राजनीति के बावजूद जनता उनके प्रति सहनशील रही है। बिहार में वैसे भाजपा-जेडीयू के बीच प्रारंभिक 17 वर्षों तक अटूट रहे गठबंधन में 2014 से 2019 तक टूटने से लेकर बनने और मनभेद से लेकर मतभेद तक कई उतार-चढ़ाव आए। बिहार की बात करने के लिए हमें 2014 में जाना होगा, जब भाजपा ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था। मोदी जब तक गुजरात में थे, नीतिश को पटना-बिहार से लेकर दिल्ली तक भाजपा से कोई आपत्ति नहीं थी। वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री के रूप में नीतिश गुजरात आकर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर प्रशंसा के फूल भी बरसा चुके थे, परंतु गुजरात दंगों को लेकर मोदी की कथित मुस्लिम विरोधी छवि से नीतिश को बिहार में जेडीयू के मुस्लिम वोट बैंक सरकने की आशंका थी। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव 2014 से जब भाजपा में मोदी का कद राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ने लगा, तो जून-2013 में नीतिश ने 17 वर्ष पुराने भाजपा-जेडीयू गठबंधन को तोड़ दिया। हालाँकि नीतिश अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद-आरजेडी-RJD) के समर्थन से राज्य की अपनी सत्ता बचाने में सफल रहे, परंतु 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी का विरोध करने का खामियाजा नीतिश को ही भुगतना पड़ा, क्योंकि बिहार के लोगों ने 2014 में पीएम के रूप में मोदी पर ही मुहर लगाते हुए भाजपा को 40 में से 22, सहयोगी लोक जनश्कित पार्टी (लोजपा-एलजेपी-LJP) को 6 और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा-आरएलएसपी-RLSP) को 3 यानी एनडीए को कुल 31 सीटें दीं, जबकि भाजपा-एनडीए से अलग होकर अकेले चुनाव में जाने वाले नीतिश के जेडीयू को सिर्फ 2 सीटें मिली थीं। बिहार में आरजेडी के समर्थन से सत्ता चला रहे नीतिश-जेडीयू लोकसभा चुनाव 2014 तक यूपीए का हिस्सा नहीं बने थे, परंतु लोकसभा चुनाव 2014 में मिली जोरदार पटखनी ने नीतिश को फिर एक बार परिवर्तनशील बनाया। उन्होंने 2015 में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक ज़मीन बचाने के लिए अपने धुर-विरोधी लालू प्रसाद यादव और उनके पुत्र तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले आरजेडी के साथ महागठबंधन बना लिया, जिसमें कांग्रेस भी शामिल थी। नीतिश को सफलता भी मिली। बिहार की जनता ने राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए 2014 में जिस ज़ुनून के साथ मोदी को पीएम बनाया, 2015 में उसी जज़्बे के साथ नीतिश के नेतृत्व पर विश्वास व्यक्त करते हुए महागठबंधन को भारी बहुमत से जीत दिलाई, परंतु 2 ही वर्षों में नीतिश के परिवर्तनशील मन ने फिर पल्टी मारी। जुलाई-2017 में नीतिश ने आरजेडी के साथ महागठबंधन तोड़ दिया और नरेन्द्र मोदी से ताम गिलवे-शिकवे दूर करते हुए पुनः भाजपा-एनडीए से नाता जोड़ लिया। बिहार की जनता ने 2019 में भी मोदी पर मुहर लगाते हुए भाजपा-एनडीए को 40 में से 39 सीटें दीं, परंतु बात यदि विधानसभा चुनावों की करें, तो 2015 और 2020 में फर्क है भी और नहीं भी है। फर्क यह है कि 2015 में मुकाबला जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस महागठबंधन और भाजपा-एलजेपी-आरएलएसपी के बीच था, जबकि 2020 में मुकाबला जेडीयू-भाजपा-एलजेपी-आरएलएसपी (एनडीए) और आरजेडी-कांग्रेस-एचएएम के बीच होगा। यदि फर्क नहीं होने की बात करें, तो 2015 में भी बिहार की जनता ने नीतिश के नाम पर मुहर लगाने के लिए 2014 का फ़ैसला पलटते हुए जेडीयू और उसके सहयोगी आरजेडी को ही वोट दिया था, तो 2020 में भी नीतिश पर मुहर लगाने के लिए जनता ने जेडीयू-भाजपा-एलजेपी-आरएलएसपी यानी एनडीए को ही वोट दे सकती है। भाजपा बिहार में 23 वर्षों से नंबर 2 पार्टी रही है और उसे हमेशा उप मुख्यमंत्री पद मिलता रहा है। 2020 में भी नीतिश के नाम पर वोट पड़े, तो बिहार में एनडीए सरकार बनी रहेगी। इसीलिए भाजपा नीतिश और जेडीयू को केन्द्र की राजनीति में भले ही नज़रअंदाज़ करती रहती है, परंतु बिहार में भाजपा को छोटे भाई के रूप में ही रहना पड़ता है और यही भाजपा-एनडीए की जीत की गारंटी भी है।

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