मोदी सुनामी में क्षत-विक्षत हुए क्षेत्रीय क्षत्रप : किंग और किंगमेकर बनने का सपना छिन्न-भिन्न

लोकसभा चुनाव 2019 में नरेन्द्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए समय-समय पर और विभिन्न मंचों पर एकजुटता का प्रदर्शन करने वाले मोदी विरोधी नेता। (फाइल चित्र)

सबसे बड़ी दुर्गति ‘बावले-उतावले’ नायडू की, PM के चक्कर में CM भी नहीं रहे

माया-अखिलेश की बेमेल जोड़ी पर मोदी-शाह-योगी ने जड़ा जोरदार तमाचा

मोदी के विरुद्ध दंगल छेड़ने वाली दीदी का डोलने लगा सिंहासन

फिर PM बनने की चाहत रखने वाले देवेगौड़ा के MP बनने के लाले

केसीआर की किरकिरी, तो केजरीवाल की कुचेष्टा और पवार की पावर धूमिल

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 23 मई, 2019। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाँच वर्षों के शासन काल के बावजूद लोकसभा चुनाव 2019 में ऐतिहासिक विजय हासिल कर अपने तमाम राजनीतिक धुर-विरोधियों की हवा निकाल दी है। मोदी के सामने जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ा चेहरा दिखाई दे रहे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए अपनी परम्परागत सीट पर संघर्ष करने की नौबत आन पड़ी, वहीं अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय दलों के नेताओं की जनता ने बखिया उधेड़ दी है।

उत्तर प्रदेश : बुआ-बबुआ की ‘बदबू’ पर मोदी-शाह-योगी की ट्रिपल बमबारी

सबसे पहले बात करते हैं लोकसभा की 80 सीटों वाले सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की, जहाँ नरेन्द्र मोदी की सुनामी ने बुआ-बबुआ की बदबू वाली राजनीति को नकार दिया है। मोदी, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बमबारी में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी-BSP) सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी (एसपी-SP) नेता अखिलेश यादव की जातिवादी ज़हरीली राजनीति को ध्वस्त कर दिया। लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने 71 सीटें जीती थीं और 2019 में भाजपा को यह प्रदर्शन दोहराने से रोकने के लिए मायावती ने सपा के साथ 25 साल पुरानी दुश्मनी भुला कर जातिवादी गठबंधन किया। बुआ मायावती और बबुआ अखिलेश ने मिल कर सारे राजनीतिक समीकरणों को जातिवाद में बदल कर भाजपा को भारी नुकसान पहुँचाने की कोशिश की, परंतु जनता ने जातिवाद नहीं, अपितु राष्ट्रवाद और विकास के नाम पर वोट दिया और यही कारण है कि दोनों क्षेत्रीय क्षत्रपों अखिलेश-मायावती के गठबंधन सपा-बसपा-आरएलडी को काँटे की टक्कर देते हुए भाजपा ने लगभग 60 सीटों पर बढ़त बनाने में सफलता हासिल की। मोदी की सुनामी ने दोनों क्षेत्रीय क्षत्रपों को करारा झटका देकर जहाँ एक ओर अखिलेश के मुख्यमंत्री, तो मायावती के प्रधानमंत्री बनने या किंगेमकर बनने के सपने को चकनाचूर कर दिया।

पश्चिम बंगाल : कोलकाता से दिल्ली तक ‘धमाल’ मचाने वालीं ममता को तगड़ा सबक

लोकसभा चुनाव 2019 में सबसे ज्यादा चर्चित राज्य पश्चिम बंगाल रहा, जहाँ नरेन्द्र मोदी और अमित शाह सहित पूरी भाजपा तीन वर्षों से मेहनत कर रहे थे और उन्होंने 42 सीटों में से 22 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा था। चुनाव परिणामों में मोदी-शाह की रणनीति रंग लाई और पिछले 8 वर्षों से ममता बैनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) का गढ़ रहे पश्चिम बंगाल में भाजपा ने बड़ी सेंध लगाने में कामयाबी हासिल की। भाजपा ने करीब 19 सीटों पर बढ़त बना रखी है, जबकि 2014 में उसे केवल 2 सीटें ही मिली थीं। एकमात्र मोदी विरोध का एजेंडा लेकर कोलकाता से दिल्ली तक धमाल मचाने वालीं क्षेत्रीय क्षत्रप ममता केन्द्रीय राजनीति में अपना सिक्का जमाने की फिराक में थीं और मौका मिलने पर किंग या किंगमेकर बनना चाहती थीं, परंतु मोदी की सुनामी में टीएमसी 2014 की 34 सीटों के मुकाबले 22 सीटों पर सिमटती नज़र आ रही है और ममता के सारे अरमाँ आँसुओं में बह गए।

आंध्र प्रदेश : दिल्ली में मोदी को हटाने के लिए बावले-उतावले नायडू की अपने ही घर में सर्जिकल स्ट्राइक

मोदी विरोधी एजेंडा लेकर चलने वाले नेताओं में राहुल गांधी और ममता बैनर्जी के बाद सबसे बड़ा कोई नाम था, तो वह था चंद्रबाबू नायडू का। मोदी विरोधी हर मंच पर नज़र आने वाले नायडू पर व्यक्ति विरोध की घृणास्पद राजनीति का ऐसा भूत सवार हुआ कि आंध्र प्रदेश की ज़मीन तक नहीं बचा सके। चले थे दिल्ली में परिवर्तन करने, परंतु जनता ने नायडू के गढ़ आंध्र प्रदेश में ही परिवर्तन की लहर फूँक दी। लोकसभा और विधानसभा चुनाव से गुजरे आंध्र प्रदेश की जनता ने न केवल तेलुगू देशम् पार्टी (तेदेपा-TDP) और मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को सत्ता से बेदखल कर दिया, अपितु लोकसभा की सभी 25 सीटों से नायडू-टीडीपी का सफाया कर दिया। भाजपा-एनडीए को बहुमत हासिल न होने की सूरत में दिल्ली में किंगमेकर की भूमिका निभाने की मंशा रखने वाले नायडू आंध्र प्रदेश की सत्ता भी गँवा बैठे। 2014 में जिस नायडू-टीडीपी को 25 में 15 सीटें मिली थीं, वह 2019 में खाता भी नहीं खोल सकी। हालाँकि आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की लहर थी और उनकी पार्टी वायएसआर कांग्रेस ने सभी 25 सीटें जीत कर भाजपा से भी 2 सीटें जीत छीन लीं। इस तरह रेड्डी जहाँ नए क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में उभरे, वहीं नायडू को दिल्ली में महत्व और आंध्र प्रदेश में सत्ता दोनों गँवानी पड़ी। अब उन्हें पाँच साल के राजनीतिक वनवास पर भेज दिया गया है।

महाराष्ट्र : मोदी की बिजली से पवार की पावर गुल

48 लोकसभा सीटों के साथ देश में दूसरे सबसे बड़े राज्य महाराष्ट्र की जनता में भी नरेन्द्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने का ज़ुनून सवार दिखाई दिया। महाराष्ट्र के परिणामों में भाजपा-शिवसेना गठबंधन 40 सीटों पर भारी बढ़त बनाई है, जबकि कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) गठबंधन को केवल 7 सीटों पर बढ़त हासिल हुई है। महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीबी गठबंधन में भारी अंतर्विरोध था, क्योंकि दोनों ही पार्टियों में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर जहाँ राहुल मन ही मन स्वयं को पीएम पद का दावेदार मानते थे, तो दूसरी तरफ पवार के मन में भी मौका मिलते ही किंग या किंगमेकर बनने की मंशा थी। इस तरह मोदी की बिजली ऐसी कौंधी कि क्षेत्रीय क्षत्रप शरद पवार की पावर गुल हो गई।

तेलंगाना : मोदी ने किरकिरा किया केसीआर का मजा

मोदी विरोधी मंचों पर बार-बार नज़र आने वाले तेलंगना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) के सुप्रीम के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने चुनावी फायदे के लिए देश को आर्थिक नुकसान पहुँचाते हुए छह माह पहले विधानसभा चुनाव तो करा लिए और जीत भी हासिल कर ली, परंतु केसीआर के गढ़ तेलंगाना में भी मोदी लहर ने केसीआर की छह माह पुरानी जीत का मजा किरकिरा कर दिया और एक और क्षेत्रीय क्षत्रप को उसकी असली जगह दिखा दी। जिस तेलंगाना में 2014 में भाजपा को केवल 1 सीट मिली थी, उस तेलंगाना में 2019 में भाजपा की सीटों की संख्या 5 तक पहुँचने की संभावना है। भाजपा की सेंध के चलते 2014 में 11 सीटें हासिल करने वाली केसीआर की टीआरएस 2019 में 7 सीटों पर सिमटने की तैयारी में है। इससे स्पष्ट है कि हैदराबाद से दिल्ली के चक्कर लगा रहे तेलंगाना के क्षेत्रीय क्षत्रप केसीआर की किंगमेकर बनने की मंशा पर मोदी ने ठंडा पानी उड़ेल दिया है।

कर्नाटक : देवगौड़ा पर दनदनाया मोदी का दम

कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 में जनता के मन में एक कसक रह गई थी कि उसने तत्कालीन कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को तो सत्ता से बेदखल कर दिया, परंतु भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं दे सकी। परिणाम यह हुआ कि अवसरवादियों ने मिल कर भाजपा को रोकने के लिए अतार्किक गठबंधन बनाया, जिसका नाम है कांग्रेस और जनता दल ‘सेकुलर’ (जेडीएस-JDS)। कर्नाटक की जनता पर कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार और एच. डी. कुमारस्वामी के रूप में एक मुख्यमंत्री थोपा गया। जनता ने 2018 की कसक लोकसभा चुनाव 2019 में निकाल दी और मोदी के समर्थन में ऐसी आंधी चली कि कर्नाटक की 28 में से 24 सीटें अकेले भाजपा ने जीत ली, जो 2014 की 17 सीटों के मुकाबले 7 सीटें अधिक हैं। कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन का सूपड़ा साफ हो गया और वह केवल 4 सीटें ही हासिल कर सका। 2014 में अलग-अलग लड़ते हुए भी कांग्रेस ने 9 और जेडीएस ने 2 सीटें हासिल की थीं, परंतु मोदी के अंधड़ के चलते जहाँ एक तरफ एक समय के बड़े क्षेत्रीय क्षत्रप, पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस के संस्थापक एच. डी. देवेगौड़ा अपनी सीट पर पीछे चल रहे हैं और कदाचित उनकी हार निश्चित है। इस तरह मोदी की सुनामी ने देवेगौड़ा की न केवल सांसद बनने की, अपितु फिर एक बार मौका मिलने पर प्रधानमंत्री बनने की इच्छा पर भी पानी फेर दिया है।

बिहार : छोटे लालू तेजस्वी के सपने पर मोदी ने फेरा पानी

एक समय था जब बिहार में लालू प्रसाद यादव की तूती बोलती थी और वे किंगमेकर कहलाते थे, परंतु लोकसभा चुनाव 2014 में चली मोदी लहर ने जहाँ लालू की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद-RJD) के इस संस्थापक दिग्गज नेता को जेल में पहुँचा दिया, वहीं लालू की विरासत के दावेदार और खुद को छोटे लालू के रूप स्थापित करने की पुत्र तेजस्वी यादव की कोशिशों को 2019 में चली मोदी सुनामी ने करारा झटका दिया है। मोदी सुनामी ने तेजस्वी यादव को क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में उभरने का अवसर ही नहीं दिया और भाजपा ने यहाँ जनता दल ‘युनाइटेड’ (जदयू-JDU) के साथ मिल कर 40 में से 38 सीटों पर भारी बढ़त बनाने में सफलता हासिल की, तो कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन को केवल 2 सीटें मिल रही हैं। ये 2 सीटें भी आरजेडी को मिल रही हैं, जबकि कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल सका है।

दिल्ली : केजरीवाल की किचकिच पर मोदी की झिड़की

पिछले तीन वर्षों में मोदी विरोधी टोली के हर मंच पर नज़र आने वाले आम आदमी पार्टी (आआपा-AAP) के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर मोदी सुनामी की ऐसी झिड़की पड़ी कि केजरीवाल को अब 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव में दिल्ली की अपनी सरकार की वापसी पर सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। विधानसभा चुनाव 2015 में दिल्ली की 70 में से 67 सीटें हासिल कर ऐतिहासिक जीत पाने वाले केजरीवाल केन्द्र की राजनीति में बड़े क्षेत्रीय क्षत्रप बन कर उभरे तो थे, परंतु 2019 में कांग्रेस से गठबंधन नहीं कर सके केजरीवाल को दिल्ली की सभी सातों सीटों पर मुँह की खानी पड़ी है, तो केजरीवाल से गठबंधन नहीं करके कांग्रेस को भी कुछ हासिल नहीं हुआ। दोनों ही पार्टियों का खाता नहीं खुला और भाजपा सभी सातों सीटों पर जीत गई।

ओडिशा : प्रतिष्ठा में सेंध से नवीन की नवीनता पर प्रश्नचिह्न

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में संभावित नुकसान की भरपाई पश्चिम बंगाल के बाद ओडिशा से करने की रणनीति अपनाई थी, जिसमें उसे सफलता मिली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भारी लोकप्रियता और लहर का ओडिशा में दमदार असर देखने को मिला और एक और क्षेत्रीय क्षत्रप नवीन पटनायक के गढ़ में भाजपा ने सेंध लगा दी। ओडिशा में सत्तारूढ़ नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल (बीजद-BJD) को 2014 में जहाँ 21 में से 20 सीटें मिली थीं, वहीं 2019 में भाजपा ने यहाँ बड़ी सेंध लगाते हुए 6 से 7 सीटों पर बढ़त बनाई है, जहाँ उसे 2014 में एक ही सीट मिली थी। वैसे ओडिशा विधानसभा में बीजेडी ने बहुमत हासिल कर लिया है, परंतु नवीन की एकछत्र नवीनता पर प्रश्नचिह्न अवश्य लग गया है।

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