इनके सुर में स्वयं राम और कृष्ण बसते थे : जब घर-घर गूंजता था ‘मंगल भवन…’ और ‘मैं हर पाप से मुक्ति दूँगा…’

* संगीत प्रेम के चलते नहीं कराया आँखों का उपचार

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 9 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।। यह श्लोक है श्रीमद् भगवद गीता के अध्याय 18 का श्लोक 66।। इसका अर्थ है : सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़ कर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा ? चिंता मत कर, सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ? मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा ? तुम शोक मत
करो ।

गीता के ऐसे ही कई श्लोक हम सभी ने पढ़े-सुने होंगे, परंतु गीता के प्रत्येक श्लोक को एक धुन, स्वर और नए गीत के रूप में प्रस्तुत कर रवीन्द्र जैन अमर हो गए। उनकी भावपूर्ण आवाज़ में आज भी हम जब रामानंद सागर कृत धारावाहिक रामायण और श्री कृष्ण के गीत सुनते हैं, तो क्षण भर के लिए ऐसा लगता है कि रवीन्द्र जैन के सुर में स्वयं भगवान श्री राम और श्री कृष्ण विराजमान होकर अपनी वाणी हमें सुना रहे हैं। 32 वर्ष पूर्व यानी 1987 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुए रामायण धारावाहिक से रवीन्द्र जैन ने जो ख्याति प्राप्त की, वैसी ख्याति उन्हें अपने फिल्मी कैरियर में भी नहीं मिली। इसके बाद आज से 26 वर्ष पूर्व यानी 1993 में दूरदर्शन पर ही प्रसारित हुए रामानंद सागर निर्देशित धारावाहिक ‘श्री कृष्णा’ के 156 एपिसोड में गीता के उपदेशों को गायन के माध्यम से रवीन्द्र जैन ने अभिव्यक्त किया, जिसकी कभी न मिटने वाली छाप सभी श्रोताओं पर आज भी देखने को मिलती है।

श्री कृष्ण धारावाहिक के एक दृश्य में दिखाया गया कि जब कुरुक्षेत्र के मैदान में हताश अर्जुन ने अपने परिजनों का वध न करने की ठानी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसे धर्म का पाठ पढ़ाने के लिए गीता में लिखे अध्याय 18 के श्लोक 66 के माध्यम से गा कर समझाया कि वह युद्ध करे और इस युद्ध में वह जितने भी पाप करेगा, उन सभी से भगवान श्रीकृष्ण उसे मुक्त कर देंगे, बस वह उनकी शरण में आ जाए। “श्रीकृष्ण” धारावाहिक में भले ही सर्वदमन बनर्जी ने श्री कृष्ण का पात्र निभाया था, परंतु उस श्लोक को गाने वाले सर्वदमन नहीं, अपितु रवीन्द्र जैन थे, जिन्होंने गीता के उपदेशों यानी श्लोक को पुनः अपने शब्दों में लिखा ही नहीं, अपितु उसे संगीतबद्ध और गाया भी। आज भी जिसे सुनकर साक्षात भगवान श्रीकृष्ण की अनुभूति होती है। रवींद्र जैन के ऊँचे और भाव भरे स्वर ने भगवान श्रीकृष्ण को श्रोताओं के सामने साक्षात् लाकर खड़ा कर दिया। उनकी रचना इस प्रकार थी..

आप भी सुनिए रवीन्द्र जैन के उच्च भाव भरे सुर :

आज रवीन्द्र जैन की चौथी पुण्यतिथि है। रवींद्र जैन हिन्दी फिल्म जगत के जाने माने संगीतकार और गीतकार थे। उनके स्वर की खनक प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करती है। उनका संगीत के प्रति प्रेम इस कदर बढ़ चुका था कि उन्होंने अपनी आँखों का उपचार सिर्फ इसलिए कर नहीं कराया कि कहीं आँखों के आने से उनका संगीत उनसे छिन न जाए। 9 अक्टूबर, 2015 को रवींद्र जैन संगीत की दुनिया को छोड़ परमात्मा में विलीन हो गए थे। आइए जानते हैं, उनकी संगीत यात्रा की मधुरम् कहानी।

रवीन्द्र जैन का जन्म 28 फरवरी 1944 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। वे सात भाई-बहन थे। उनके पिता ईन्द्रमणी जैन संस्कृत के बड़े पण्डित और आयुर्वेदाचार्य थे। माता का नाम किरन जैन था। रवींद्र जैन बचपन से ही दृष्टि हीन थे, जिस कारण उन्होंने अपनी पढ़ाई अलीगढ़ विश्वविद्यालय के ब्लाइंड स्कूल से की। 4 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने जैन समुदाय से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी और मंदिरों में भजन गाने लगे। संगीत में महारथ प्राप्त करने के बाद वे कोलकाता चले गए और एक संगीत शिक्षक के रुप में कोलाकात के एक स्कूल में शिक्षा देने लगे। बच्चों को संगीत की शिक्षा देने के साथ-साथ वे स्वयं को एक गायक के रूप में स्थापित करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने पाँच रेडियो स्टेशन में ऑडिशन भी दिया, परंतु असफलता हाथ आई, उसी दौरान उनकी भेंट फिल्मकार राधेश्याम झुनझुनवाला से हुई, उन्होंने रवींद्र जैन को मुंबई आने की सलाह दी। 1969 में रवींद्र जैन मुंबई चले गए और झुनझुनवाला से मिले। वहाँ रवींद्र ने झुनझुनवाला की एक फिल्म के पाँच गानों का संगीत निर्देशन किया, जिसे मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और आशा भोसले ने स्वरबद्ध किया, परंतु वह फिल्म रिलीज़ नहीं हो सकी। 1972 में रवींद जैन के संगीत निर्देशन में उनकी पहली फिल्म ‘कांच और हीरा’ रिलीज हुई, जिसके गीत मोहम्मद रफी ने गाये, परंतु फिल्म फ्लॉप रही। 1973 में उन्हें फिल्म सौदागर के गीतों को संगीत बद्ध करने का अवसर मिला और इसी के साथ शुरू हुआ उनका फिल्मी करियर। इस में मुख्य भूमिका में अमिताभ बच्चन और नूतन थे। 26 अक्टूबर, 1973 को प्रकाशित हुई इस फिल्म से रवींद्र को काफी प्रसिद्धी मिली, हालाँकि जिस समय रवींद्र फिल्म सौदागर की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, तभी उन्हें अपने पिता के मरने की सूचना मिला, परंतु अपने काम के प्रति समर्पित रहने वाले रवींद्र ने रिकॉर्डिंग पूरी की और उसके बाद पिता के अंतिम दर्शन के लिए गए। पिता के जाने के बाद रवींद्र जैन ने स्वयं को संगीत के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने कई फिल्मों को अपने संगीत और स्वर से सजाया, परंतु कुछ खास सफलता न मिल सकी। इसी दौरान उनकी शादी दिव्या जैन से हो गई, जिससे उन्हें एक पुत्र की प्राप्ती हुई, जिसका नाम आयुष्मान जैन है।

रवींद्र जैन की प्रसद्धि का सितारा तब चमका जब उनका भेंट दक्षिण भारत के सुप्रसिद्द गीतकार के.जे. येसुदास (काट्टश्शेरि जोसफ़ येसुदास) से हुई। 1970 और 1980 के दशक में दोनों ने मिलकर हिट फिल्मों के संगीत का निर्माण किया। केरल के येसुदास प्लेबैक सिंगिग में एक जाना पहचाना चेहरा हैं। इन के गाए गीतों में “गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा” गाना बहुत ही खूबसूरत और सुप्रसिद्ध गाना है। येसुदास को 2002 में भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया, वे पाँच बार सर्वश्रेष्ठ पाश्वगायक की श्रेणी में सरहतरिया फ़िल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किए जा चुके हैं। रवींद्र जैन ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि “यदि मुझे कभी दृष्टि प्राप्त हुई, तो मैं सबसे पहले येसुदास का चेहरा देखना चाहता हूँ।” रवींद्र जैन इसके बाद कहाँ रुकने वाले थे, उन्होंने फिल्म चोर मचाए शोर, चितचोर, तपस्या, दुल्हन वही जो पिया मन भाए, अंखियों के झरोखों से, राम तेरी गंगा मैली, हिना, इंसाफ का तराजू, प्रतिशोध जैसी कई फिल्मों में संगीत दिया। ले तो आए हो हमें सपनों के गांव में, ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए, एक राधा एक मीरा, सजना है मुझे सजना के लिए और हर हसीं चीज का मैं तलबगार हूं जैसे सैकड़ों गाने हैं जिसे उन्होंने अपनी धुन से सजाया।

फिल्मों के साथ-साथ रवींद्र जैन ने टीवी जगत में भी सराहनीय कार्य किया। ‘रामायण’, ‘श्रीकृष्णा’, ‘लवकुश’, ‘जय माँ दुर्गा’, ‘साई बाबा’ जैसे मशहूर धारावाहिक को रवींद्र जैन ने अपने संगीत से चमकाया है। “मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी, राम सिया राम सिया राम जय जय राम” आज से लगभग 30-31 वर्ष पूर्व रामचरित मानस में लिखी ये चौपाई भी घर-घर में गूँजा करती थी। रविवार का दिन आते ही लोग अपना सारा कामकाज छोड़ टीवी के सामने बैठ जाया करते थे, इतना ही नहीं जिनके घरों में टीवी नहीं होते थे, वे पड़ोसियों के घर जाकर इस धारावाहिक को देखते थे। समाचार पत्रिका इण्डिया टुडे ने उस समय इसे “रामायण फ़ीवर” का नाम भी दिया था, जी हाँ हम बात कर रहे हैं दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक रामायण की। इस धारावाहिक के प्रत्येक कलाकार ने अपने अभिनय से रामायण के सभी पात्रों को जीवित कर दिया था। रामायण का प्रसारण 25 जनवरी, 1987 को दूरदर्शन पर शुरू किया गया, जो 31 जुलाई 1988 तक चला। यह प्रत्येक रविवार को 9:30 बजे प्रसारित होता था और ‘मंगल भवन अमंगल हारी…’ की जिस धुन से यह धारावाहिक आरंभ होता था, वह धुन और ध्वनि रवीन्द्र जैन के थे। रामायण, भारत और विश्व टेलिविज़न इतिहास में सबसे अधिक देखा जाने वाला कार्यक्रम था, जिसे जून 2003 में लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में “विश्व के सर्वाधिक देखे जाने वाले पौराणिक धारावाहिक” के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। रामायण एक बहुत ही सफल टीवी धारावाहिक था, जिसकी रचना, निर्देशन और लेखन भले ही रामानन्द सागर ने किया था, परंतु इसके सफल होने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी रवींद्र जैन ने, जिन्होंने न सिर्फ रामायण का टाईटल सॉन्ग गाया, अपितु उसे संगीत बद्ध भी किया। उन्होंने अपने बुलंद स्वर में “मंगल भवन अमंगल हारी” गीत को एक अलग ही अंदाज में गाया, जो सीधे लोगों के दिल में उतर गया।

संगीत में अपने अतुल्य योगदान के लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया है। 1985 में फिल्म राम तेरी गंगा मैली के लिए उन्होंने फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2015 में उनके मरणोप्रांत पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 9 अक्टूबर, 2015 को 71 वर्ष की आयु में किडनी की बीमारी की वजह से मुंबई के लीलावती अस्पलात में उनका निधन हो गया। रविंद्र जैन को भारतीय सिनेमा जगत में कुछ सबसे खूबसूरत, कर्णप्रिय और भावपूर्ण गीतों के लिए उन्हें सदैव याद किया जाएगा।

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