काश ! भारत के मुसलमान भी ऐसे होते, तो कब का बन चुका होता राम मंदिर

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 19 जून 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। एक तरफ नेपाल है, जहाँ मुसलमान नेपाल को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की माँग का समर्थन कर रहे हैं और धर्म निरपेक्ष राष्ट्र बनाने के विधेयक का विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि वह सनातन हिन्दू संस्कृति के संरक्षण में ज्यादा सुरक्षित अनुभव करते हैं। दूसरी तरफ हमारा भारत है, जिसे धर्म निरपेक्षता के ढकोसले ने खोखला कर दिया है। काश ! भारत में भी ऐसे मुसलमान होते तो हिन्दू-मुसलमान के बीच कोई विवाद ही नहीं होता और अयोध्या में राम मंदिर बन चुका होता।

नेपाल में हिंदू राष्ट्र की माँग कर रहे मुस्लिम

दरअसल हिमालयी देश नेपाल की सरकार देश को धर्म निरपेक्ष देश बनाने की मंशा से अपनी संसद में विधेयक ला रही है। इस विधेयक का पूरे नेपाल में विरोध हो रहा है और नेपाल को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की माँग की जा रही है। सरकार के विधेयक में देश के सभी सार्वजनिक और निजी ट्रस्टों का राष्ट्रीयकरण करने की बात कही गई है। जिसके बाद से ही देश में सनातनी हिंदू संस्कृति को बचाने के लिये विधेयक के विरोध की मुहिम शुरू हुई है। अब इस हिमालयी देश की काठमांडू घाटी में रहने वाले मुसलमान भी स्थानीय नेवार समुदाय की सनातन हिंदू संस्कृति के संरक्षण की मांग के समर्थन में आ गये हैं। स्थानीय मुस्लिम संगठनों ने नेपाली हिंदू संस्कृति को बचाने के लिये एक जलसा भी किया।

धर्मनिरपेक्ष संविधान लाने के विधेयक का विरोध

इन मुसलमानों का कहना है कि यदि राष्ट्रीयकरण वाला विधेयक पारित होता है तो सनातनी संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। इस प्रस्ताव के तहत मंदिर और महत्वपूर्ण हिंदू स्थलों का राष्ट्रीयकरण हो जाएगा। इससे पहले कई मुस्लिम संगठन नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग कर चुके हैं। उनका कहना है कि वह धर्मनिरपेक्ष संविधान की तुलना में हिंदू राज्य में अधिक सुरक्षित अनुभव करते हैं। नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित करने को लेकर जारी अभियान से जुड़े राप्ती मुस्लिम सोसायटी के अध्यक्ष अमजद अली का कहना है कि यह अभियान इस्लाम की रक्षा के लिये है। वह इसलिये नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि उनका लक्ष्य अपने धर्म की रक्षा करना है। सीपीएन-यूएमएल सीए सदस्य अनारकली मियां ने कहा कि उनके मुताबिक नेपाल को धर्मनिरपेक्षता नहीं अपनानी चाहिये, इससे भविष्य में कई दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच नेपालगंज के अध्यक्ष बाबूखान पठान के अनुसार देश को धर्मनिरपेक्ष बनाना हिंदुओं और मुसलमानों के बीच लंबे समय से चली आ रही एकता को तोड़ने की साजिश है। देश के सभी नागरिकों को धार्मिक सौहार्द के साथ रहने का अवसर देने के लिये देश की पुरानी हिंदू राष्ट्र वाली पहचान को वापस लाने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

भारत के मुस्लिमों को नेपाल से सीख लेने की जरूरत

वहीं दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़ने वाला देश भारत है, जहाँ छोटी-छोटी बातों पर समुदायों के बीच बड़े-बड़े विवाद उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसे में भारत के मुसलमानों को नेपाल के मुसलमानों से सीख लेने की आवश्यकता है। हम केवल सोच ही सकते हैं कि यदि भारत में भी नेपाल जैसे मुसलमान होते तो कदाचित भारत भी एक हिंदू राष्ट्र बन सकता और अयोध्या में राम मंदिर जैसे मुद्दे सालों साल तक विलंबित नहीं रहते, अपितु सौहार्दपूर्ण वातावरण में राम मंदिर कब से ही बन चुका होता।

धर्मनिरपेक्षता ने भारतीय संस्कृति को पहुँचाया नुकसान

भारत को धर्मनिरपेक्षता रूपी विकृति ने सबसे अधिक हानि पहुँचाई है। वास्तव में जो देश सर्वधर्म समभाव से प्रेरित और संचालित हो और वसुधैव कुटुम्बकम् जिसका आदर्श हो उस देश को धर्म निरपेक्षता का चोला ओढ़ने की आवश्यकता ही नहीं थी। यह धर्मनिरपेक्षता मूल रूप से विजातीय अवधारणा है जिसका भारत से तो कोई लेना-देना ही नहीं है। यूरोप में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा ने इसलिये स्थान बनाया, क्योंकि वहाँ की नागरिक सत्ता को चर्च के दुष्प्रभाव से बचाने की जरूरत थी। जबकि भारत में ऐसा कोई माहौल था ही नहीं, परंतु दुर्भाग्य से एक आदर्श के रूप में सेक्युलरिज्म को अपनाया गया। इससे भी बुरा तो यह हुआ कि सेक्युलरिज्म को धर्मनिरपेक्षता का पर्याय माना गया। वास्तव में तो धर्म का अर्थ कर्तव्य है, इसलिये उस पर प्रश्न खड़े करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी, सेक्युलरिज्म को पंथनिरपेक्षता की व्याख्या से लेना चाहिये था। परंतु उसे धर्मनिरपेक्षता के रूप में लिया गया, जिसका परिणाम सबके सामने है। देश के दो प्रमुख समुदायों हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच सामंजस्य के स्थान पर खाई और बढ़ती गई, बढ़ती जा रही है। धर्मनिरपेक्षता ने एक समुदाय को बहुसंख्यक तो दूसरे समुदाय को अल्पसंख्यक बना दिया। इस अल्पसंख्यकवाद की राजनीति ने सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया। इस सेक्युलरिज्म की विकृतियों से देश अच्छी तरह से वाकिफ है परंतु इस पर चर्चा के लिये कोई आगे नहीं आता और एक विदेशी अवधारणा को देश के लोगों पर थोप दिया गया है। इस विकृति ने देश को जितना नुकसान पहुँचाया है, उसकी कहीँ और मिसाल मिलना भी मुश्किल है।

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