“कमी खुद में ढूंढें , सहायता दूसरों की करें और प्रेम केवल ईश्वर से करें” – श्री विनोद अग्रवाल

विनोद का निनाद : ग्रंथों की गूढ़ता से दूर, संगीत की साधना के सुर, आज भी पहुँचाते हैं कान्हा के अंत:पुर !

महान भजन सम्राट विनोद अग्रवाल की 64वीं जन्म जयंती पर विशेष श्रद्धा-सुमन

आलेख : आई. के. शर्मा (मुख्य सम्पादक, YuvaPress.com)

अहमदाबाद, 6 जून, 2019। विनोद, यह एक क्रिया शब्द है, जिसका अर्थ होता है व्यंग्य, हास्य, उपहास, मज़ाक, मिमिक्री, कॉमेडी, जोक आदि… जिसके माध्यम से लोगों का मनोरंजन किया जा सकता है, परंतु आज हम जिस विनोद की बात कर रहे हैं, वह क्रिया शब्द नहीं, अपितु नाम-रूप-आकार धारी व्यक्ति विशेष है। मैं एक ऐसे विनोद की बात करने जा रहा हूँ, जिनकी गणना आधुनिक युग के ऐसे कृष्ण भक्त और कृष्ण कीर्तक के रूप में होती है, जिन्होंने अपने कन्हैया की साधना के लिए उनके देहावतार का आधार तो लिया, परंतु साधना तो उस कन्हैया और उनके मर्म व मूल तत्व की ही की, जो मोरपंख, मुरली और मूरत यानी देह से परे है।

विभोर विनोद : कन्हैया के ऐसे कीर्तक, जिन्होंने मोरपंख, मुरली और मूरत से परे ‘मर्म व मूल’ की सुरों से की साधना

मैं बात कर रहा हूँ श्री विनोद अग्रवाल जी की, मैंने उन्हें विभोर विनोद के रूप में इसलिए संबोधित किया, क्योंकि वे कृष्ण भक्ति में भाव विभोर हो जाते थे। भजन गाते-गाते उनकी आँखों से अश्रु छलक जाते थे और भजन की ध्वनि अवार गति से चलती रहती थी। सनातन धर्म, संतों और महापुरुषों की भूमि के रूप में विख्यात हमारी भारत भूमि पर द्वापर युग में अवतार लेने वाले भगवान कृष्ण ने जहाँ पूरी दुनिया को महान ग्रंथ गीता के उपदेश के माध्यम से ईश्वर के मूल तत्व से परिचित कराया, वहीं अपनी लीला से करोड़ों लोगों में भक्ति की ऐसी ज्योत प्रज्ज्वलित की, जो सीधे कृष्ण से एकाकार करवा सकती है। कृष्ण को अवतारी पुरुष या देहधारी ईश्वर के रूप में पूजने वालों की तो आज भी दुनिया में कोई कमी नहीं है, परंतु देह से परे परम और निराकार तत्व के रूप में कृष्ण की साधना करने वालों की एक अलग ही मस्ती होती है। ऐसे मतवालों की सूची में महाभारतकालीन विदुर से लेकर उद्धव, प्राचीन-ऐतिहासिक चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, सुरदास, नरसिंह मेहता, मीरा बाई और न जाने कितने महान भक्त-कवि शामिल हैं और इसी कड़ी में जुड़ने के लिए आज से ठीक 64 वर्ष पहले विनोद अग्रवाल का जन्म हुआ था।

विरासत में मिली कृष्ण भक्ति

विख्यात राधा-कृष्ण और कृष्ण भक्त तथा भजन गायक से भजन सम्राट बने विनोद अग्रवाल की आज 64वीं जन्म जयंती है। 6 जून, 1955 को विनोद अग्रवाल का दिल्ली में जन्म हुआ था। वे आज हमारे बीच देह रूप में तो नहीं मगर आज भी भजनो की गुंजमान में अकसर जिस्म को रूह तक जिझोड़ देते हैं । अपने कन्हैया की भक्ति में सराबोर रहते हुए पिछले वर्ष 63वाँ जन्म दिवस मनाने वाले विनोद अग्रवाल का 6 नवम्बर, 2018 को गोलोक में अपने श्यामाश्याम को रिझाने के लिए इस धरा से चले गए, परंतु लाखों कृष्ण प्रेमियों के हृदय में कृष्ण भक्ति और कृष्ण की मूल शक्ति का दीप प्रज्ज्वलित कर देने वाले श्री विनोद अग्रवाल के भजन आज भी न केवल उनकी अमिट, नित्य-निरंतर कृष्ण भक्ति के अमरत्व की गाथा बने हुए हैं, अपितु ये भजन आधुनिक आपाधापी और भौतिक पदार्थों की होड़ के बीच मानव को हरिनाम संकीर्तन करने के लिए प्रेरित भी करते हैं और सदैव करते रहेंगे। वास्तव में श्री विनोद अग्रवाल को कृष्ण भक्ति उत्तराधिकार के रूप में मिली थी और इसीलिए उन्होंने अपने जीवन के 50 वर्ष से अधिक केवल कृष्ण भक्ति को ही समर्पित कर दिए। पिता श्री किशननंद और माता श्रीमती रत्नदेवी अग्रवाल की राधा-कृष्ण में अटूट श्रद्धा थी। दिल्ली में जन्मे विनोद अग्रवाल 1962 में 7 वर्ष की आयु में माता-पिता व भाई-बहनों के साथ मुंबई पहुँचे। यहीं श्री विनोद अग्रवाल ने माता-पिता से मिली प्रेरणा से केवल 12 वर्ष की आयु में भजन गायन आरंभ किया और हार्मोनियम भी सीख लिया। संतों और गुरुओं के सत्संग में उन्होंने अपनी इसी कला को और निखारा और जीवन के अंतिम क्षणों तक वे राधा-कृष्ण के भजनों को अपने सुरों से भक्तों के बीच बिखेरते रहे।

वामन के नहीं, विराट के साधक विनोद

श्री विनोद अग्रवाल को केवल एक संगीतज्ञ, गायक, भजनिक या कृष्ण भक्त के रूप में पहचानना बड़ी भूल होगी। वास्तव में विनोद अग्रवाल मानव का ईश्वर से साक्षात्कार कराने वाले, ईश्वर से एकाकार कराने वाले, निराकार ईश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, नित्य, अनादि, अनंत, सत्य, शाश्वत, अवर्णनीय, निर्गुण-गुणातीत, अवस्थात्रय, अद्वैत, अद्वितीय आदि अनेक विशेषण वाले उस परम तत्व और मुक्ति पद की प्राप्ति में जुटे साधक थे, जिसे पाने के दो महत्वपूर्ण मार्ग हैं। पहला ज्ञान मार्ग और दूसरा भक्ति मार्ग। ज्ञान मार्ग ग्रंथों, ध्यान, योग और समाधि के जरिए निर्गुण-निराकार व नित्य सत्य स्वरूप ईश्वर से साक्षात्कार कराता है, जबकि भक्ति मार्ग सगुण साकार में रहे निर्गुण-निराकार की भक्ति के जरिए सत्य-नित्य स्वरूप ईश्वर से साक्षात्कार कराता है। श्री विनोद अग्रवाल को विरासत में भक्ति मार्ग मिला और उन्होंने वामन रूपी देह-देवी-देवता-मूर्ति आदि से परे ईश्वर की अमूर्त-निराकार और विराट स्वरूप में साधना की। ईश्वर का यह मार्मिक और मूल तत्व बिना गुरु के किसी की समझ में नहीं आता। यही कारण है कि श्री विनोद अग्रवाल भी गुरुधारी साधक थे। उन्होंने 1979 में बठिंडा-पंजाब में श्री मुकुंद हरि महाराज से दीक्षा ग्रहण की थी। गुरु की इच्छा थी कि शिष्य विनोद अग्रवाल पूरी दुनिया में हरि नाम का प्रचार करे। गुरु इच्छा को आदेश मान कर श्री विनोद ने बिना रुके-बिना थके आजीवन अव्यक्त ईश्वर को कृष्ण का आधार लेकर भजनों में व्यक्त करने का प्रयास किया।

अभेद परमात्म भक्ति ने मिटाया भजन-गज़ल का भेद

श्री विनोद अग्रवाल ने भगवान कृष्ण के श्याम सुंदर, कन्हैया, गोविंद, राधा माधव सहित सैकड़ों नामों को आधार बना कर भक्तों के बीच अवर्णनीय परमात्मा का वर्णन करने का प्रयास किया। श्री विनोद अग्रवाल ने भजन गायकी के ऐसे सुर और तार छेड़े कि अभेद परमात्मा की भक्ति में निकली धुनों ने भजन और गज़ल का भेद तक मिटा दिया। श्री विनोद अग्रवाल के भजनों की धुनों के तार जहाँ परम्परागत भारतीय शास्त्रीय और आध्यात्मिक संगीत को छूते हैं, वहीं इस्लामिक सूफियाना अंदाज़ की गज़लों और कव्वालियों में भी कृष्ण भक्ति की साधना करते हैं। उनके भजनों में जहाँ संस्कृत और हिन्दी के विविध रूपों वाले शब्द हैं, वहीं उर्दू के लफ्ज़ों का भी बोलबाला है।श्री विनोद के इसी अंदाज़ ने उन्हें पूरे देश में लोकप्रिय भजन गायक से भजन सम्राट बना दिया।

बिज़नेस छोड़ बाँकेबिहारी से बंधन जोड़ा

श्री विनोद अग्रवाल भक्ति रस में इस तरह डूबे हुए थे कि उन्होंने परिवार से मिली व्यवसाय रूपी विरासत से बहुत जल्दी ही दूरी बना ली। श्री विनोद अग्रवाल व्‍यवसायी परिवार से ताल्‍लुक रखते थे, परंतु भगवान कृष्‍ण की भक्‍ति में वह भजन गायक बन गए। श्री विनोद अग्रवाल के परिवार में पत्नी कुसुम लता के अलावा के दो बच्चे हैं जिनकी शादी हो चुकी है। उनके बेटे का मुंबई में कपड़ों का कारोबार है। इस सबके बावजूद श्री विनोद अग्रवाल ने बिज़नेस छोड़ बाँकेबिहारी से बंधन जोड़ा और भजन गायकी को ही मुख्य बनाया। श्री विनोद ने देश-विदेश में अब तक तीन हजार से भी अधिक कार्यक्रम पेश किए। श्री विनोद अग्रवाल कपड़े के व्यापारी थे। मुंबई तक कारोबार फैला था। कब वे कृष्ण की भक्ति में खो गए पता ही नहीं चला। फिर मुंबई से पत्नी समेत वृंदावन आकर बस गए। बेटा बिजनेस संभाल रहा है।

‘करते हो तुम कन्हैया… मेरा नाम हो रहा है…’

श्री विनोद अग्रवाल के कंठ से निकले भजन और उनके शब्द ऐसे बाण समान होते हैं, जो भक्तों को गृहस्थ संन्यासी बनाने की क्षमता रखते हैं। श्री विनोद के भजन रूपी निनाद (उद्घोष) से निकले कई भजनों में जो मुझे प्रिय और स्मरण भी है, वह है, ‘मेरा आपकी कृपा से… हर काम हो रहा है… करते हो तुम कन्हैया… मेरा नाम हो रहा है…’। इस भजन के जरिए श्री विनोद अग्रवाल निराकार ईश्वर की साधना में लगे साधक को अकर्ता भाव का संदेश देते हैं। यह भजन कहता है कि हर व्यक्ति का हर कार्य केवल और केवल उसकी यानी ईश्वर की इच्छा से हो रहा है। अहंकार और देहाभिमान से पीड़ित व्यक्ति हर कार्य के साथ ‘मैं’ यानी कर्ता भाव जोड़ देता है, परंतु यह भजन कहता है कि काम तो कन्हैया करता है, करने वाला व्यक्ति तो केवल निमित्त होता है। इसी भाव से जीवन का हर व्यवहार किया जाए, तो यह भी निराकार-निरंजन परमात्मा की अकर्ता भाव से की जाने वाली उत्तम साधना बन सकती है, जो साधक को चित्त शुद्धि का फल देती। शुद्ध चित्त में ही परमात्म तत्व का दर्शन किया जा सकता है। एक और भजन जो मुझे याद आ रहा है, वह है, ‘यही हसरतें तलब हैं… यही आरज़ू है दिल में… न हटें मेरी निगाहें… तेरे रुख़ से ज़िंदगी में… फूलों की चांदनी में… तारों की रोशनी में… जो बात देखी तुझमें… देखी नहीं किसी में…’। इस भजन के माध्यम से श्री विनोद अग्रवाल स्वयं और अपने साधकों को संदेश देते हैं कि गृहस्थ जीवन का हर कर्तव्य कर्म करते हुए भी उस परमात्मा की निरंतर साधना जारी रहनी चाहिए।

मेरे आध्यात्मिक गुरु विनोद अग्रवाल

श्री विनोद अग्रवाल और उनका जीवन किसी संत से तनिक भी कमतर नहीं था। उन्होंने केवल भगवा चोला नहीं धारण किया था, परंतु उनके हृदय और चित्त में संतत्व पूर्णतः खिला हुआ था। आज जब पूरी दुनिया में धर्म और भक्ति के नाम पर भव्य मंदिरों के अंबार लगे हैं, आश्रमों, तथाकथित गुरुओं, करोड़ों शिष्यों की भीड़ का चलन है, भौतिक वस्तुओं की मांग के साथ भक्ति के आडंबर का प्रचलन है, ऐसे में श्री विनोद अग्रवाल ने अपने पूरे जीवन में अमूर्त-निराकार परमात्मा का चिंतन किया, जो उन्हें स्वत: एक आध्यात्मिक संत बना देता है। वेदांत के अनुसार, ‘जो यह दावा करता है कि उसने ईश्वर को जान लिया है, वास्तव में वह अज्ञानी है और जो यह कहता है कि उसने ईश्वर को नहीं जाना, वास्तव में वही ज्ञानी है’। इस वेद वाक्य का अर्थ यही है कि ईश्वर को जान लेने वाला उस निराकार परमात्मा का वर्णन नहीं कर सकता। ऐसे में मैं भी किसी के ज्ञानी या अज्ञानी होने का दावा तो नहीं कर सकता, परंतु श्री विनोद अग्रवाल ने मेरे जीवन में मेरे आध्यात्मिक गुरु की भूमिका निभाई है। उनके भजनों ने मुझमें निराकार ईश्वर से साक्षात्कार करने की जिज्ञासा और अभिलाषा को जन्म दिया है। आज भले ही, विनोद अग्रवाल हमारे बीच नहीं हैं, परंतु आज भी विनोद अग्रवाल के निराकार परमात्मा की भक्ति का संदेश देने वाले भजन हमें मानव जीवन के एकमात्र लक्ष्य व पुरुषार्थ आत्म-साक्षात्कार की ओर निरंतर अग्रसर रहने की प्रेरणा देते हैं और देते रहेंगे।

मृत्यु भी आए, तो कन्हैया के आँगन में…

श्री विनोद अग्रवाल ने अपने निधन से पहले एक साक्षात्कार में अपनी अंतिम इच्छा प्रकट की थी। अब भक्त कोई इच्छा प्रकट करे और भगवान उस इच्छा को पूरी न करे, ऐसा कभी हो सकता है ? नहीं न ! यही कारण है कि विनोद की विनती कन्हैया टाल न सके। हमारे शास्त्रों, श्रुतियों और संतों के कथनानुसार जो सच्चे भक्त होते हैं, उनकी दृष्टि भी अपने भगवान की तरह आगे-पीछे सब जगह देख सकती है। यही कारण है कि विनोद को भी अपने ‘कन्हैया से मिलने’ का आभास पहले ही हो गया था। 6 नवम्बर, 2018 को निधन से लगभग एक महीने पहले यानी 7 अक्टूबर, 2018 को विनोद अग्रवाल ने मथुरा में आयोजित राधा माधव नामक कार्यक्रम के दौरान एक अखबार को साक्षात्कार दिया था। इस साक्षात्कार में विनोद अग्रवाल ने कहा था, ‘मैंने सपनों की नगरी मुंबई से किनारा कर भक्ति की नगरी वृंदावन को आशियाना बना लिया है। जीवन भर कान्हा के भजन गाता रहा। अब जीवन के अंतिम पड़ाव पर यही कामना है कि कन्हैया की नगरी में ही चिर निद्रा में सो जाऊँ। जब भी मेरे प्राण निकलें, तो वृंदावन में ही निकलें। मैं कोई समाज सुधारक, उपदेशक या वक्ता नहीं हूँ। मैं तो बस सामान्य व्यक्ति हूँ, जो अपने आराध्य की भक्ति में डूबा रहता है। मेरी हमेशा से इच्छा थी कि ज़िंदगी का एक चौथाई हिस्सा वृंदावन में ही बीते। यदि मृत्यु भी आए, तो वो आंगन भी मेरे कन्हैया का ही हो। अंतिम समय में भी मेरे होठों पर बंसी बजैया का ही नाम हो।’ विनोद की यह इच्छा पूरी भी हुई। उनका निधन भगवान कृष्ण की जन्म-स्थली मथुरा में ही हुआ।

आप भी सुनिए श्री विनोद अग्रवाल की 64वीं जयंती पर उनके कुछ वो भजन, जो मुझे ही नहीं, सभी कृष्ण भक्तों को प्रिय हैं :

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