नरेन्द्र, नीयत और नियति : शताब्दियों पश्चात बना ऐसा ‘सौभाग्यशाली संयोग’, जो तोड़ रहा ‘दुर्योग’

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 15 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। उर्दू साहित्य के महान शायर मुहम्मद इक़बाल (अल्लामा इक़बाल) का एक शेर है, ‘हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। आप सोच रहे होंगे आज न तो इक़बाल की जयंती और न ही पुण्यतिथि, फिर अचानक हम इस महान शायर को क्यों याद कर रहे हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में छिपी है भारत में पिछले कुछ वर्षों में घटी कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ। ऐसी घटनाएँ, जिन्हें लेकर साधारण जनमानस में यह जड़तापूर्ण ग्रंथि थी कि भारत को विरासत में मिली कुछ समस्याओं का क़िला इतना मज़बूत है, जिसे तोड़ा नहीं जा सकता, परंतु इन महत्वपूर्ण घटनाओं ने समस्याओं के मज़बूत क़िले की कई दीवारों को ध्वस्त किया है।

कदाचित अब भी आपको इक़बाल के शेर और पिछले कुछ वर्षों में घटी घटनाओं के बीच का संबंध समझ में नहीं आया होगा। सबसे पहले तो आपको इक़बाल के शेर का अर्थ समझा देते हैं। इक़बाल अपने इस शेर में जिस नर्गिस की बात कर रहे हैं, वह एक पौधा है, जिसमें फूल साधारण पौधों की अपेक्षा देरी से आते हैं। इक़बाल ने इस देरी को ‘हज़ारों साल’ बता कर एक कालखंड की ओर इशारा किया है कि एक अच्छे फूल या फल को पाने के लिए हज़ारों वर्षों की प्रतीक्षा करनी होती है, जैसे कि नर्गिस करती है। जब तक फूल नहीं आता, तब तक नर्गिस बेनूर (कांतिहीन) कहलाती है। अपनी बेनूरी पर हज़ारों वर्ष (बहुत लम्बे समय तक) रोने के बाद नर्गिस पर फूल आता है। नर्गिस का फूल देखने में इंसानी आँख की तरह होता है। नर्गिस की हज़ारों साल की प्रतीक्षा के बाद चमन में बड़ी मुश्किल से दीदावर यानी दृष्टा पैदा होता है। यह सारी चीजें इशारा करती हैं संयोग की।

अब आते हैं शीर्षक पर। भारत भी आज इक़बाल के शेर में बताए गए ‘हज़ारों साल’ की प्रतीक्षा के बाद बेनूरी से उबरता हुआ दिखाई दे रहा है और इसका कारण है ‘नरेन्द्र, नीयत और नियति’ के त्रिवेणी संगम से बना सौभाग्यपूर्ण संयोग। यहाँ नरेन्द्र से तात्पर्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, नीयत से तात्पर्य इच्छाशक्ति-संकल्प शक्ति और नियति से तात्पर्य है भाग्य, किस्मत, प्रारब्ध या नसीब। भारत में वैसे तो समय-समय पर महापुरुषों-युगपुरुषों ने जन्म लिया और महान कार्य किए, परंतु जहाँ तक राजनीतिक परिदृश्य की बात है, तो वर्षों बाद ‘नरेन्द्र, नीयत और नियति’ का ऐसा सुगम संयोग बना है, जो भारत को ऐसी-ऐसी समस्याओं से सदा-सदा के लिए मुक्ति दिला रहा है, जिनके बारे में पुरानी पीढ़ी के लोग यह कह रहे हैं, ‘हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हमारे जीते-जी यह समस्या सुलझ जाएगी।’ संकेत साफ है कि ‘नरेन्द्र, नीयत और नियति’ के इस सौभाग्यशाली संयोग ने भारत को समस्याओं के दुर्योग से उबारना आरंभ कर दिया है और एक-एक दीवारें गिरती जा रही हैं। यदि ‘नरेन्द्र, नीयत और नियति’ का यह संयोग यूँ ही बना रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब भारत समस्याओं और दुर्योगों के पूरे दुर्ग को ध्वस्त कर देगा।

जड़वत् समस्याएँ जड़ से उखड़ रहीं

यह ‘नरेन्द्र, नीयत और नियति’ के सौभाग्यपूर्ण संयोग का ही परिणाम है कि आज भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ विरासत में मिलीं और जड़वत् हो चुकी समस्याएँ एक-एक कर जड़ से उखड़ रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की प्रबल व निर्मल इच्छाशक्ति (नीयत) के साथ किए गए निर्णयों पर जिस तरह सर्वोच्च विधायिका यानी संसद और सर्वोच्च न्यायपालिका यानी सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर लगती गई, उसका सीधा संकेत यह है कि नरेन्द्र और नीयत को नियति का भी पूरा समर्थन मिल रहा है। यहाँ नियति से तात्पर्य संसद और सुप्रीम कोर्ट भी किया जा सकता है, क्योंकि भारत में किसी भी निर्णय को पूरी तरह लागू करने के लिए अंतिम मुहर इन्हीं दो संवैधानिक संस्थानों से लगती है। नरेन्द्र-नीयत-नियति के त्रिवेणी संगम के चलते भारत निरंतर उसे परेशान करने वाली और विकास में बाधा बनने वाली जड़वत् हो चुकी समस्याओं से मुक्त होता जा रहा है।

ट्रिपल तलाक़ की बुराई को देशनिकाला

सबसे पहले बात ट्रिपल तलाक़ की करें, तो अल्पसंख्यक समाज में व्याप्त यह एक ऐसी सामाजिक बुराई थी, जिसे धर्म और धर्म आधारित राजनीति करने वालों ने अपने निहित स्वार्थ के कारण वर्षों से समाज में फैलने-पनपने दिया, परंतु मोदी सरकार ने न केवल स्वयं पहल की, अपितु सुप्रीम कोर्ट से सकारात्मक संकेत मिलने के बाद मज़बूती से इस बुराई को दूर करके दिखाया। मुस्लिम समाज की महिलाओं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि भारत की सरकार और भारत की सबसे बड़ी अदालत उनके साथ वर्षों से पुरुषों द्वारा ‘तलाक़ तलाक़ तलाक़’ यानी तीन बार तलाक़ बोल कर किए जा रहे अन्याय को दूर कर देगी। यह एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा था, जिसमें सरकार-क़ानून को धर्म की कठिन परीक्षा से गुज़रना पड़ा, परंतु नरेन्द्र और नीयत को नियति का साथ मिला और ट्रिपल तलाक़ अवैध घोषित हो गया। मोदी सरकार ने इस पूरे मसले को एक सामाजिक समस्या के रूप में देखा और राजनीतिक या दलगत स्वार्थ से ऊपर उठ कर अपनी नीयत को न्याय की कसौटी पर भी पास करवाया और संसद से क़ानून बनवाने में भी सफलता हासिल की। यह असंभव दिखाई देने वाला कार्य कैसे संभव हुआ ? उत्तर है ‘नरेन्द्र, नीयत और नियति’ का सौभाग्यशाली संयोग।

कश्मीर समस्या का समाधान

कुछ यही धारण जम्मू-कश्मीर को लेकर थी कि इस समस्या का कभी कोई समाधान नहीं निकलेगा, परंतु दूसरी बार अधिक मज़बूती से बहुमत मिलते ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेक-नीयत से कश्मीर समस्या को हाथ पर लिया। अमित शाह को गृह मंत्री बनाया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) को प्रमुख सिपहसलार बनाया और 5 अगस्त, 2019 को ऐतिहासिक निर्णय करते हुए जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनने से रोकने में सबसे बड़ी बाधा धारा 370 (साथ ही 35ए) को जड़ से उखाड़ फेंका। मोदी सरकार ने पूरी तैयारी के साथ यह कार्य किया। बाक़ायदा संसद के माध्यम से धारा 370 का उन्मूलन कराया, जिस पर कोई सवाल उठाने का साहस नहीं कर सकता, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में संसद सर्वोपरि है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर का विभाजन कर लद्दाख को अलग केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया। इसे लेकर कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है, परंतु सुप्रीम कोर्ट भी संसद और संविधान के दायरे में काम करता है और निश्चित रूप से इस मामले में भी नरेन्द्र-नीयत को नियति (न्यायालय) का फिर एक बार समर्थन मिलेगा। धारा 370 के हटते ही देश में कई लोगों की यही प्रतिक्रिया आई, ‘हमने नहीं सोचा था कि हम जीते-जी कश्मीर से धारा 370 हटते देख सकेंगे।’ मोदी सरकार ने धारा 370 हटा कर कश्मीर समस्या का काफी हद तक समाधान कर दिखाया। यह असंभव दिखाई देने वाला कार्य कैसे संभव हुआ ? उत्तर है ‘नरेन्द्र, नीयत और नियति’ का सौभाग्यशाली संयोग।

राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त

अब बात 491 वर्ष पुराने राम जन्म भूमि विवाद की करते हैं। भारत सहित विश्व के 150 करोड़ हिन्दुओं की इच्छा थी कि अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बने। पुरानी सरकारों ने भारत के बहुसंख्यकों की इस इच्छा को केवल एक वर्ग विशेष के वोट बैंक के लिए वर्षों तक नज़रअंदाज़ किया, परंतु मोदी सरकार और उनकी पार्टी की नीति और नीयत हिन्दुओं की आस्था के साथ थे। यह नीति या नीयत किसी वर्ग विशेष के विरुद्ध नहीं थी। यही कारण है कि नियति ने फिर नरेन्द्र और नीयत का साथ दिया और देश की सबसे बड़ी अदालत में यह सिद्ध हो गया कि विवादास्पद राम जन्म भूमि पर पहले मंदिर था और राम मंदिर वहीं बनेगा। करोड़ों हिन्दुओं सहित बुद्धिशाली मुस्लिम समाज के लोगों को भी यही लगता था कि राम मंदिर मुद्दे का कभी कोई हल नहीं निकलेगा, परंतु यह असंभव दिखाई देने वाला कार्य भी संभव हुआ और इसका कारण है ‘नरेन्द्र, नीयत और नियति’ का सौभाग्यशाली संयोग। जो लोग राजनीतिक चश्मे से देखते हैं, उन्हें यह लगता है कि भाजपा का एजेंडा पूरी तरह लागू हो रहा है, परंतु नरेन्द्र और नीयत में खोट नहीं होने तथा नियति (न्यायालय) की भी संवैधानिक मुहर के कारण कोई भी व्यक्ति न तो ट्रिपल तलाक़, न धारा 370 और न ही राम मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा या सरकार पर किसी तरह का राजनीतिक आरोप लगाने का साहस नहीं कर सकता।

राफेल पर मिली क्लीन चिट

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार नीति तथा नीयत साफ है। यह फिर एक बार गुरुवार को तब सिद्ध हो गई, जब सुप्रीम कोर्ट ने भारत और फ्रांस के बीच हुए राफेल सौदे में किसी तरह की जाँच की आवश्यकता को नकार दिया। राफेल डील पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर है’ का नारा देते हुए सीधे तौर पर मोदी के दामन पर छींटे उड़ाने का प्रयास किया, परंतु मोदी बेदाग निकल कर आए। सुप्रीम कोर्ट रूपी नियति ने राफेल मुद्दे पर भी नरेन्द्र-नीयत का साथ दिया और राहुल गांधी के सभी आरोपों को निरस्त कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों ने सर्वसंमति से कहा कि राफेल डील में किसी तरह की जाँच की आवश्यकता नहीं है। यह मोदी सरकार की ही नहीं, राजनीतिक दल के रूप में भाजपा की ही नहीं, अपितु स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत नैतिक विजय है।

तो समान नागरिक संहिता भी होगी लागू

अब चर्चा हो रही है समान नागरिक संहिता (CCC) की। यह भी भाजपा के एजेंडा का एक मुद्दा है। दिल्ली उच्च न्यायालय में समान नागरिक संहिता की न्यायिक कसौटी होने जा रही है। स्वाभाविक है कि यह मुद्दा अभी सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा। फिर संसद में भी आएगा। भाजपा ने राष्ट्रवाद के प्रखर सिद्धांत के साथ और उच्चतम् न्यायालय के इच्छा के अनुरूप ही समान नागरिक संहिता को अपने एजेंडा में शामिल किया है। नरेन्द्र और नीयत हैं, तो नियति यानी न्यायालय और संसद दोनों की ही कसौटियों पर समान नागरिक संहिता का मुद्दा ख़रा उतरेगा। असंभव दिखाई देने वाला समान नागरिक संहिता क़ानून भी एक दिन देश में सभी कसौटियों से गुज़र कर लागू होगा, क्योंकि ‘नरेन्द्र-नीयत-नियति’ के त्रिवेणी संगम में हर असंभव को संभव बनाने का सामर्थ्य है।

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