भारत का नया नक्शा : क्या POK की कसक दूर करने की हो रही तैयारी ?

विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 4 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, पीएम नरेन्द्र मोदी ने धारा 370 हटने के बाद पहली दीपावली 27 अक्टूबर रविवार को जम्मू कश्मीर के राजौरी में लाइन ऑफ कंट्रोल (LOC) के पास भारतीय सैनिकों के साथ मनाई थी। इसी दिन इन्फेंट्री डे यानी पैदल सेना दिवस भी था। पीएम मोदी ने भारतीय पैदल सेना के शौर्य को याद करते हुए कहा था कि भारत की आज़ादी के बाद पाकिस्तान की नीयत कश्मीर पर बिगड़ी थी और उस पर कब्जा करने के इरादे से उसने कबाइलियों के भेष में अपने सैनिकों की घुसपैठ करवाई थी, तब भारतीय पैदल सेना ने उन कबाइलियों को खदेड़ कर कश्मीर की रक्षा की थी, अब वही कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। हालाँकि पाकिस्तान ने कश्मीर के एक हिस्से पर अवैध रूप से कब्जा कर रखा है, जिसकी कसक हमारे दिलों में आज भी है। अब इसके ठीक एक सप्ताह बाद ही भारत का नया पॉलिटिकल नक्शा जाहिर हुआ है। शनिवार को जारी हुए नये भारतीय नक्शे में पीओके को जम्मू कश्मीर और उत्तरी कश्मीर यानी गिलगिट-बाल्टिस्तान को नवगठित केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख में दर्शाया गया है। इससे राजनीतिक विश्लेषकों और सामरिक मामलों के जानकारों में एक नई चर्चा शुरू हो गई है। इस चर्चा में नये नक्शे को लेकर तरह-तरह के अनुमान लगाये जा रहे हैं। कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि मोदी सरकार पीओके और गिलगिट-बाल्टिस्तान को भारत में लाने की ब्लूप्रिंट तैयार कर चुकी है और आने वाले दिनों में इस पर एक्शन भी देखने को मिल सकता है। कुछ लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि हर वर्ष अलग-अलग जगहों पर सैनिकों के साथ दीपावली मनाने वाले पीएम मोदी ने अगली दीवाली पीओके में मनाने की तैयारी कर ली है।

धारा 370 हटने के बाद से ही पीओके पर चर्चा

दरअसल जब से मोदी सरकार ने पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य से धारा 370 को समाप्त करने की सफलता अर्जित की है, तब से ही पीओके को लेकर पुरजोर चर्चा शुरू हो चुकी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी अपने बयानों में कह चुके हैं कि जम्मू कश्मीर के स्टेटस में बदलाव भारत का आंतरिक मामला है और पाकिस्तान से अब जब भी बातचीत होगी तो वह जम्मू कश्मीर को लेकर नहीं, अपितु पीओके को लेकर ही होगी। जयशंकर ने तो एक कदम आगे बढ़ कर कहा था कि एक दिन पीओके भारत का हिस्सा होगा। इससे भी जाहिर होता है कि मोदी सरकार के एजेंडे में अब पीओके को लेकर प्राथमिकता दी जा रही है।

परेशान पाकिस्तान, चीन भी बेचैन

जब से भारत ने जम्मू कश्मीर का स्टेट्स बदला है और पुनर्गठन करके जम्मू कश्मीर व लद्दाख नाम के दो केन्द्र शासित प्रदेश बनाये हैं, तब से एक तरफ पाकिस्तान परेशान है, वहीं दूसरी ओर चीन की बेचैनी भी बढ़ गई है। पाकिस्तान तो 5 अगस्त 2019 को भारतीय संसद में जम्मू कश्मीर से धारा 370 खत्म करके प्रदेश का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने के समय से ही बौखलाया हुआ है और दुनिया में भारत को लेकर दुष्प्रचार कर रहा है। ये और बात है कि उसे इसमें कोई कामयाबी नहीं मिली। संयुक्त राष्ट्र परिषद में उसने अपने बयान में कश्मीर को इस्लामिक साख का मुद्दा बनाने का प्रयास भी किया, परंतु तुर्की और मलेशिया के अतिरिक्त उसे किसी अन्य इस्लामिक देश का समर्थन नहीं मिला। बल्कि जब से राजनाथ सिंह ने अपने बयान में पीओके का जिक्र किया है, तब से ही पाकिस्तान पीओके को बचाने की मुद्रा में आ गया है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने भी अपने एक बयान में कहा है कि पाकिस्तान पहले कश्मीर की बात करता था, अब हम मुज़फ्फराबाद (पीओके) को बचाने की योजना बनाने लग गये हैं। पाकिस्तान के कई मंत्री भी मान रहे हैं कि अब भारत पीओके में कुछ बड़ा करने वाला है, इसलिये वे युद्ध की गीदड़भभकी दे रहे हैं। पाकिस्तानी पीएम इमरान खान खुद भी कह चुके हैं कि भारत पीओके में बालाकोट से भी खौफनाक कुछ करने की योजना बना रहा है। ये दर्शाता है कि पाकिस्तान को पीओके भी उसके हाथ से फिसलता दिखाई देने लगा है। उसके बाद तीन बार पीओके का दौरा कर चुके हैं, जो कि इससे पहले पीओके की ओर देखते भी नहीं थे। इतना ही नहीं, भारत का नया नक्शा जारी होने के बाद भी पाकिस्तान की बौखलाहट सामने आई है और उसके विदेश मंत्रालय ने बयान जारी करके भारतीय नक्शे को मानने से इनकार किया है। पाक विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत का नया मानचित्र कानूनी रूप से अपुष्ट और गलत है। यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रासंगिक प्रस्तावों के भी खिलाफ है। पाकिस्तान इस राजनीतिक मानचित्र को खारिज करता है, जो संयुक्त राष्ट्र के नक्शों के अनुरूप नहीं है। साथ में उसने यह भी कहा कि भारत का कोई भी कदम जम्मू और कश्मीर की विवादित स्थिति को नहीं बदल सकता है, जिसे संयुक्त राष्ट्र (UN) से मान्यता प्राप्त है। उसने कहा कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुसार स्वनिर्णय के अपने अधिकार का प्रयोग करने के लिये भारतीय जम्मू कश्मीर के लोगों के संघर्ष का समर्थन करना जारी रखेगा। पाकिस्तान के इस बयान में उसकी हताशा और बौखलाहट साफ झलकती है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान जिस चीन के दम पर आँखें तरेरता है, वह चीन भी भारत के कदम से बेचैन है। 31 अक्टूबर 2019 की मध्य रात्रि को जैसे ही जम्मू कश्मीर पुनर्गठन बिल लागू हुआ और जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख दो नये केन्द्र शासित प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आये, उसी दिन चीन की बेचैनी तब जाहिर हो गई, जब बीजिंग ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उसने भी भारत द्वारा जम्मू कश्मीर के स्टेटस में किये गये बदलाव को मानने से इनकार किया। हालाँकि उसे भारत की ओर से तत्काल यह कह कर रोक दिया गया कि यह भारत का आंतरिक मामला है और उसे इस पर टिप्पणी करने से बचना चाहिये। दोनों देशों की बेचैनी दर्शाती है कि वे पीओके और अक्साई चिन को लेकर भारत के रुख से चिंतित हैं। चीन ने भी लद्दाख के ठीक पूर्व में स्थित अक्साई चिन पर अवैध कब्जा किया हुआ है, जिसे भारत ने अपने नये नक्शे में लद्दाख में दर्शाया है। चूंकि लद्दाख और जम्मू कश्मीर अब केन्द्र के शासन में हैं, इसलिये अब दोनों ही प्रदेशों को केन्द्र सरकार सीधे तौर पर देखेगी, जो इन दोनों देशों के लिये परेशानी का सबब बन गया है।

बीते दिन रविवार को अपने 80वें जन्मदिन के मौके पर भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा है कि भारत का नक्शा ठीक करना आवश्यक हो गया है। कश्मीर को लेकर अभी तक राजनीति होती रही, परंतु अब पूरी दुनिया भारत के साथ है। ऐसे में अगले एक साल में ही पीओके भी भारत का हिस्सा होगा और बलूचिस्तान भी पाकिस्तान से मुक्त होकर भारत के साथ विलय चाहता है।

पीओके पर क्या है भारत की रणनीति

1994 में पहली बार भारतीय संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें माँग की गई थी कि पाकिस्तान भारतीय राज्य जम्मू कश्मीर के उस क्षेत्र को खाली करे, जिस पर उसने अतिक्रमण कर लिया है। हालाँकि इसके बाद किसी भी सरकार ने इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ने का प्रयास नहीं किया और केवल राजनीति होती रही। इसके लंबे अर्से के बाद पीएम नरेन्द्र मोदी और उनके तीन मंत्री गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यह बात बार-बार दोहराई कि पीओके और अक्साई चिन जम्मू कश्मीर का हिस्सा हैं। ये तीनों ही मोदी मंत्रीमंडल के शक्तिशाली मंत्री हैं और शक्तिशाली कैबिनेट कमेटी के सदस्य हैं, जो देश की राष्ट्रीय सुरक्षा पर अंतिम फैसला लेती है। इतना ही नहीं, राजनाथ सिंह ने यह भी साफ कर दिया है कि भारत परमाणु हथियार पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति पर भी दोबारा विचार कर सकता है। भारत ही नहीं, पाकिस्तान समेत दुनिया के कई लोग भी यह मान रहे हैं कि पीएम मोदी पाकिस्तान को लेकर एक मजबूत नीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

बीते दिनों की कई मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि भारतीय मंत्रियों के पीओके को लेकर दिये गये बयानों को राजनीति से प्रेरित नहीं मानना चाहिये, बल्कि इन्हें गंभीरता से लेना चाहिये। ये रिपोर्ट्स उप महाद्वीप में बढ़ते विवाद का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों के बयानों पर आधारित हैं।

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में डिप्लोमेसी और डिसार्ममेंट के एक प्रोफेसर हैपीमन जैकब के हवाले से बीबीसी में छपी रिपोर्ट के अनुसार भारत को पीओके पर नियंत्रण पाने के लिये सैन्य विकल्प को ही अपनाना पड़ेगा। पाकिस्तान ऐसे इस पर कब्जा नहीं छोड़ेगा और न ही किसी बाहरी दबाव में ऐसा हो सकता है। कश्मीर पर किताब लिखने वाले एक लेखक क्रिस्टोफर स्नेडन का कहना है कि भारत को पीओके हासिल करने के लिये पाकिस्तान को पहला हमला करने के लिये उकसाना पड़ेगा और फिर वह अपने जवाबी हमले को सही ठहरा सकेगा। एक रणनीतिकार अजय शुक्ला के अनुसार पीओके को लेकर भारत के पास रणनीति में तीन विकल्प हैं। पहला ये कि कश्मीर घाटी से ध्यान हटा कर दुनिया का ध्यान पीओके पर केन्द्रित करना, दूसरा कश्मीर पर दुनिया के नज़रिये को बदलते हुए पाकिस्तान को अस्थिर करना और तीसरा भारतीय कश्मीरियों के मन में भारतीय शासन प्रशासन के प्रति विश्वास पैदा करना। भारत तीनों ही चरणों पर अमल करते हुए दिख रहा है।

पूर्व थलसेना प्रमुख दीपक कपूर के अनुसार पीओके में यूएन का कोई लेना देना नहीं है। शिमला समझौते के अनुसार दोनों देशों को ही इस मसले को हल करना है। ऐसी स्थिति में भारत के पास एक ही रास्ता है और वह है जंग, परंतु यह जंग अब भयंकर हो सकती है, क्योंकि दोनों ही देश अब परमाणु सम्पन्न हैं। इस जंग के लिये भारत मजबूत तो है, परंतु उसे और भी मजबूत होने की आवश्यकता है। यदि इसी पीढ़ी की आँखों के सामने पीओके को भारत में लाना है तो यह सबसे उत्तम समय है, क्योंकि अभी वैश्विक माहौल भी भारत के पक्ष में है। भारत की सेना भी सक्षम है और मौजूदा सरकार भी कड़े फैसले लेने के लिये सक्षम है, जो कि इससे पहले की सरकारें नहीं थी।

संविधान विशेषज्ञ विराग गुप्ता के अनुसार भारत के हिस्सों पर पाकिस्तान और चीन ने भी सैन्य बल से ही कब्जा किया था। इन हिस्सों को वापस पाने के लिये भारत को भी सैन्य बल का ही प्रयोग करना होगा। इसमें कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यूएन में 1947 में पंडित नेहरू द्वारा दायर प्रस्ताव को वापस लेने भर से पीओके भारत का हिस्सा नहीं बन जाएगा, परंतु यह प्रस्ताव वापस लेना केवल एक संकेत मात्र होगा कि भारत पीओके हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

क्या है शिमला समझौता

भारत और पाकिस्तान के बीच 3 जुलाई 1972 को शिमला समझौता हुआ था। इस समझौते पर भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के हस्ताक्षर हैं। 1971 की जंग के बाद हुए इस समझौते में दोनों देशों ने तय किया था कि हर विवाद का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से द्विपक्षीय बातचीत के जरिये हल किया जाएगा। साथ ही आपसी रिश्तों की ऐसी नींव तैयार की जाएगी, जिसमें दोनों तरफ के लोगों के बीच आपसी संपर्क पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। समझौते में नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बरकरार रखने पर भी सहमति हुई थी। 17 दिसंबर 1971 के संघर्ष विराम से बनी नियंत्रण रेखा का सम्मान दोनों पक्षों की ओर से बिना किसी पूर्वाग्रह के किया जाएगा। आपसी मतभेदों और कानूनी व्याख्याओं के बावजूद कोई भी पक्ष इसे इकतरफा बदलने की कोशिश नहीं करेगा। इस रेखा के उल्लंघन के लिये बल प्रयोग या धमकी देने से दोनों पक्ष खुद को दूर रखेंगे।

You may have missed