अब दिल्ली का दंगल : मोदी-शाह के लिए 2020 की पहली और सबसे बड़ी चुनौती !

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 24 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। लोकसभा चुनाव 2019 में 2014 की तुलना में अधिक भारी बहुमत से केन्द्र की सत्ता में वापसी करने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) का जनाधार राज्य प्रति राज्य घटता जा रहा है। भाजपा शासित राज्यों की संख्या घटती जा रही है। भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2019 के बाद जहाँ एकमात्र कर्नाटक में राजनीतिक उठापटक (चुनाव के माध्यम से नहीं) के बाद दोबारा सत्ता हासिल कर ली, परंतु चुनावी घमासान में वह महाराष्ट्र जैसा बड़ा राज्य गँवा चुकी है। हरियाणा में उसे खिसकते जनाधार के बीच बमुश्किल सत्ता बचाने में सफलता मिली, तो सोमवार को एक और राज्य झारखंड में भाजपा के शासन का अंत हो गया।

भाजपा के लिए वर्ष 2019 का आरंभ जहाँ लोकसभा चुनाव में भारी विजय के साथ हुआ, वहीं अंत झारखंड में क़रारी शिकस्त के साथ होने जा रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चाणक्य नीति दोनों पर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानने लगे हैं कि राज्यों में भाजपा के राष्ट्रीय मुद्दे नहीं चल पा रहे हैं और स्थानीय मुद्दों पर ही लोग वोट दे रहे हैं, जिससे भाजपा शासित राज्यों की संख्या घट कर 15 रह गई है। इनमें अधिकांश पूर्वोत्तर के छोटे-छोटे राज्य हैं। बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक जैसे ही राज्य हैं, जहाँ भाजपा-एनडीए का शासन है।

इन सभी विपरीत परिस्थितियों के बीच भाजपा, मोदी और शाह के लिए वर्ष 2020 एक और नई, वर्ष की पहली तथा सबसे बड़ी चुनौती लेकर आ रहा है। जी हाँ ! जनवरी-फरवरी-2020 में अब देश के दिल यानी दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि भाजपा दिल्ली में कोई करिश्मा दिखा पाएगी या एक और राज्य में उसे हार का सामना करना पड़ेगा ? वैसे विधानसभा चुनाव की दृष्टि से देखें, तो दिल्ली में भाजपा के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 में उसे 70 में से केवल 3 सीटें मिली थीं। देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के पश्चात् भी दिल्ली वालों के सिर पर आम आदमी पार्टी (AAP) और उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल का जादू सिर चढ़ कर बोला था और AAP ने 67 सीटें जीत कर इतिहास रच दिया था।

दिल्ली का दिल जीतना आसान नहीं

दिल्ली विधानसभा का इतिहास अत्यंत पुराना है। दिल्ली में 1952 से 1955 के दौरान अंतरिम विधानसभा थी और उस समय कांग्रेस का शासन रहा था। दिल्ली विधानसभा चुनाव 1952 में कांग्रेस को जीत मिली थी। चार वर्षों में चौधरी ब्रह्म प्रकाश यादव पहले मुख्यमंत्री बने और उनके बाद गुरमुख निहाल सिंह मुख्यमंत्री बने। इसके बाद दिल्ली विधानसभा रहित केन्द्र शासित प्रदेश बन गई। 1993 में पुन: दिल्ली विधानसभा अस्तित्व में आई। नई विधानसभा के लिए 1993 में हुए पहले चुनाव में भाजपा ने जीत के साथ आरंभ किया और मदनलाल खुराना मुख्यमंत्री बने। भाजपा की सरकार तो 5 वर्ष चली, परंतु खुराना पाँच वर्ष तक मुख्यमंत्री नहीं रह सके। भाजपा ने बाद में साहिब सिंह वर्मा को सीएम बनाया। जब दिल्ली विधानसभा चुनाव 1998 निकट आ गए, तो भाजपा ने अक्टूबर-1998 में सुषमा स्वराज को दिल्ली का मुख्यमंत्री बना दिया। भाजपा को आशा थी कि सुषमा के नेतृत्व में भाजपा पुन: वापसी करेगी, परंतु ऐसा हुआ नहीं और कांग्रेस जीत गई।

शीला के नाम 15 वर्ष शासन का रिकॉर्ड

दिल्ली विधानसभा चुनाव 1998 में कांग्रेस ने भाजपा के हाथों से सत्ता छीन ली और शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। शीला के नेतृत्व में कांग्रेस ने 2003 और 2008 के चुनाव में भी जीत हासिल की। शीला दीक्षित 15 वर्षों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। भाजपा तीनों ही चुनावों में शीला सरकार को सत्ता से हटाने में विफल रही। राष्ट्रीय स्तर पर लगातार और तेजी से आगे बढ़ रही भाजपा को दिल्ली की जनता भाव देने को तैयार नहीं थी।

AAP का उदय, भाजपा-कांग्रेस संकट में

निर्भया सामूहिक बलात्कार और लोकपाल आंदोलन के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल एक नए नेता के रूप में उभरे और उन्होंने AAP का गठन कर दिल्ली के मैदान में छलांग लगा दी। केजरीवाल की लोकलुभावन बातों ने दिल्ली की जनता को ख़ूब आकर्षित किया और इसीलिए दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में पहली बार चुनाव मैदान में उतरी AAP को 28 सीटें मिलीं, परंतु यह 70 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के आँकड़े से 6 कम थीं। भाजपा 31 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, परंतु उसे कोई समर्थन देने को तैयार नहीं था। 8 सीटों वाली कांग्रेस व कुछ निर्दलीयों ने AAP का समर्थन किया और केजरीवाल पहली बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए, परंतु वे इस मिलीजुली सरकार को अधिक दिनों तक नहीं चला सके। अंतत: दिल्ली में 2015 में मध्यावधि चुनाव हुए और केजरीवाल के नेतृत्व में AAP को 67 सीटों का भारी बहुमत मिला।

भाजपा के लिए उलटफेर बड़ी चुनौती

2013 तक भाजपा की केन्द्र में सरकार नहीं थी, परंतु लोकसभा चुनाव 2014 में देश ने मोदी के नेतृत्व में भाजपा को पूर्ण बहुमत दिया। इसमें दिल्ली ने भी दिल खोल कर भाजपा का साथ दिया और सभी 6 लोकसभा सीटों पर भाजपा को जीत मिली, परंतु 8 महीनों के बाद ही 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल 3 विधानसभा सीटें मिलीं। लोकसभा चुनाव 2019 में भी भाजपा को दिल्ली की सभी 6 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई, परंतु प्रश्न यही उठता है कि भाजपा 2014 बनाम 2015 वाले उलटफेर को 2019 बनाम 2019 में दोहराए जाने से रोक पाएगी ? यदि भाजपा ने लोकसभा की सभी 6 सीटें जीती हैं, तो स्वाभाविक है कि उसे विधानसभा में पूर्ण बहुमत मिलना चाहिए, परंतु भाजपा, मोदी और शाह के समक्ष दिल्ली का दिल जीतने की सबसे बड़ी चुनौती है। 2019 की सफलता को बनाए रखते हुए भाजपा को दिल्ली में 21 वर्ष से चला आ रहा सत्ता का वनवास दूर करना है। इसके लिए उसे ठोस रणनीति की आवश्यकता होगी। मोदी ने दो दिन पहले ही दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली करके दिल्ली चुनाव के लिए शंखनाद कर दिया है, परंतु राष्ट्रीय नागरिकता चार्ट (NRC) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों की चुनौतियाँ भी भाजपा को परेशान करेंगी। यद्यपि भाजपा के पास सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने का विकल्प है, परंतु केजरीवाल के लोकलुभावन एजेंडा के सामने भाजपा को कोई मज़बूत आधार प्रस्तुत करना होगा। भाजपा की हार-जीत बहुत कुछ AAP और कांग्रेस के बीच तालमेल होने या न होने पर भी निर्भर करेगी।

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