निर्विकल्प मोदी : गांधीनगर से दिल्ली तक धुरविरोधी धुरंधरों की भीड़, परंतु कोई न कर सका चुनौती देने का साहस

1. चुनाव से पहले विकल्प देने की भाजपा की रणनीति जनता को हमेशा रास आई

2. गुटबाजी से ग्रस्त कांग्रेस का ‘चुनाव के बाद चयन’ का मंत्र बार-बार घातक सिद्ध हुआ

3. भाजपा की दल विरोधी राजनीति के सामने कांग्रेस-विपक्ष की व्यक्ति विरोधी राजनीति फ्लॉप

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 20 मई, 2019। नरेन्द्र मोदी निर्विकल्प हैं अर्थात् उनका कोई विकल्प नहीं है। मोदी पिछले 18 वर्षों से अजेय हैं। गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक नरेन्द्र मोदी का सामना कांग्रेस सहित अनेक राजनीतिक दलों के झुंडों तक से हो गया, परंतु सत्तालोलूपों की भीड़ इतनी दल-दल वाली थी कि मोदी के सामने विकल्प के रूप में पेश करने के लिए इन झुंडों के पास मौजूद बीसियों तथाकथित दमदार नेताओं में से एक भी नेता नहीं था। परिणाम यह है कि नरेन्द्र मोदी पिछले 18 वर्षों से चुनावी राजनीति में अजेय राजनेता बन कर उभरने जा रहे हैं।

लोकसभा चुनाव 2019 के सभी EXIT POLL चीख-चीख कर कह रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी फिर से भारी बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रहे हैं। पिछले तीन वर्षों से मोदी को रोकने के लिए रणनीति या यूँ कहें कि कुटिल नीति अपना रहे कांग्रेस सहित तमाम विरोधी दलों के सामने एक लक्ष्य तो स्पष्ट था कि मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनने देना है, परंतु इस मोदी विरोधी टोली के पास इतना साहस नहीं था कि वे मोदी के विकल्प के रूप में भारत की सवा सौ करोड़ जनता को एक नाम दे सकें। जहाँ नीयत में खोट हो, वहाँ नाम कैसे दिया जा सकता था। मोदी विरोधी टोली के स्वयंभू सरदार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पूरे चुनाव अभियान में मोदी के विकल्प के रूप में स्वयं को स्वयंभू और अघोषित तरीके से प्रस्तुत कर रहे थे, परंतु अंतर्विरोधों से भरी मोदी विरोधी टोली में स्वयं को मोदी का विकल्प बनाने की कोशिश करने वाले और मानने वाले नेताओं की दबी और खुली ज़ुबान से राहुल के नेतृत्व को नकार देने के कारण राहुल जीवन में केवल एक बार ही यह कह सके कि हाँ वे प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे। दोबारा ऐसा कहने का वे साहस ही नहीं कर सके, क्योंकि उनके नेतृत्व को मानने को न तो मायावती तैयार थीं, न ममता बैनर्जी तैयार थीं और न ही अखिलेश या शरद पवार को राहुल का नेतृत्व मंजूर था। इस तरह लोकसभा चुनाव 2019 में मोदी के सामने मंचों पर एकजुट दिखाने वाला विपक्ष चुनावी ज़मीन पर कोई विकल्प पेश नहीं कर सका।

इसे मोदी का सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य ?

नरेन्द्र मोदी ने जब से चुनावी राजनीति में कदम रखा है, तब से उनका जिस विपक्ष से सामना हुआ, वह हमेशा उनके सामने कमज़ोर साबित हुआ। कई राजनीतिक विश्लेषक अनेक बार मोदी की चुनावी जीत को यह कह कर हल्के में आँकने की भूल कर बैठते हैं कि मोदी का सामना कमज़ोर विपक्ष से होता है, इसलिए वे जीत जाते हैं। इस तरह का कुतर्क देने वाले राजनीतिक विश्लेषक कभी उस विपक्ष से यह सवाल नहीं करते कि वे मोदी के सामने मज़बूत विकल्प क्यों नहीं पेश कर पाते ? क्यों मोदी की रणनीति के समक्ष विपक्ष भी ज़मीनी स्तर पर अपना जनाधार नहीं बनाता ? क्यों नहीं विपक्ष में इतने सारे नेताओं के होने के बावज़ूद कोई एक नेता ऐसा नहीं उभर कर सामने आता, जो मोदी को टक्कर दे सके। क्यों नहीं विपक्षा का कोई एक नेता मोदी की तरह काम नहीं करता, ताकि वह जनता के दिल में जगह बना सके ? लोकतंत्र है, सबको मोदी की तरह रणनीति-कार्यशैली अपनाने की पूरी स्वतंत्रता है। विपक्ष यदि मोदी विरोध का एक एकसूत्री एजेंडा अपनाए और जनता के सामने न कोई दृष्टिकोण रखे और न ही कोई विकल्प, तो जनता क्या करे ? मोदी की किसी भी चुनावी जीत के पीछे विपक्ष की कमज़ोरी नहीं, अपितु मोदी की मेहनत होती है, क्योंकि मोदी प्रारब्ध पर नहीं, पुरुषार्थ पर विश्वास करते हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में जहाँ कांग्रेस 2004 में प्रारब्धवश मिली सत्ता जैसे चमत्कार के सपने देख रही थी, वहीं बाकी के विपक्षी दल मोदी विरोध के नाम पर कांग्रेस के साथ खड़े रहने का केवल दिखावा कर रहे थे, परंतु वे अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को उभरने नहीं देना चाहते थे। मोदी ने विपक्षी खेमेबंदी पर कभी कोई आपत्ति नहीं जताई, परंतु विपक्ष केवल खेमेबंदी में रह गया और मोदी उस तरह अपनी मदमस्त चाल और दृढ़ मनोबल-मनोविश्वास से आगे बढ़ते रहे, जैसे कि कुत्तों के भौंकने के बावजूद एक हाथी विचलित नहीं होता।

विकल्प के मामले में भाजपा का रिकॉर्ड सबसे ऊँचा

Karnataka Election 2018

भाजपा की स्थापना 6 अप्रैल, 1980 को हुई और उसने पहला चुनाव 1984 का लोकसभा चुनाव लड़ा। केवल 2 सीटें ही भाजपा को मिलीं, लेकिन उसके बाद भाजपा लगातार मजबूत हुई। भाजपा ने देश ही नहीं, हर राज्य में कांग्रेस को हराने के लिए चुनाव से पहले हमेशा एक मजबूत विकल्प पेश किया। भाजपा ने देश में या राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए सत्तारूढ़ दल को लक्ष्य बना कर राजनीति की, परंतु कांग्रेस और उसके चेले-चपाटे विपक्षी दलों ने मोदी के राजनीति में आने के बाद हमेशा व्यक्ति विरोध की राजनीति की, जो कांग्रेस और विपक्षी दलों के लिए घातक सिद्ध हुई। भाजपा के 1980 से 2019 तक के इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं, जब उसने देश के सामने अपना प्रधानमंत्री पद का, तो राज्यों में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार चुनाव से पहले घोषित किया। दूसरी तरफ कांग्रेस ने देश में भी अपने निवर्तमान प्रधानमंत्री या राज्यों में भी निवर्तमान मुख्यमंत्री को चुनाव से पहले दोबारा मुख्यमंत्री बनाने की कभी शत प्रतिशत गारंटी जनता को नहीं दी। एक तरफ भाजपा जो विपक्ष में रह कर सत्ता के लक्ष्य के साथ पीएम या सीएम का चेहरा भी पेश करती रही, वहीं कांग्रेस सत्ता में रह कर भी मौजूदा पीएम-सीएम को लेकर भी यही कह कर कोई गारंटी नहीं दे सकी कि नए प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चयन संसदीय दल या विधायक दल करेगा। यह बड़ा फर्क ही भाजपा को कांग्रेस से अलग बनाता है और यही कारण है कि आज भाजपा की अनेक राज्यों में सरकारें हैं और लगभग सभी मुख्यमंत्रियों के नाम चुनाव से पहले ही घोषित किए गए।

गुजरात में भाजपा ने मजबूत विकल्प घोषित कर 29 वर्षों से जमी कांग्रेस की चूलें हिलाईं

फिलहाल देश में नरेन्द्र मोदी की चर्चा है, तो गुजरात की भी बात करना प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि मोदी गुजरात से ही तो दिल्ली पहुँचे हैं। गुजरात में 29 वर्षों तक जातिवाद और मुस्लिम तुष्टीकरण जैसे समीकरणों के आधार पर सत्ता सुख भोगने वाली कांग्रेस की चूलें भाजपा के कट्टर हिन्दुत्व के सामने लोकसभा चुनाव 1989 से ऐसी हिलीं कि दोबारा पटरी पर नहीं लौटीं। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव 1990 में भाजपा ने जनता दल के साथ चुनाव लड़ने के बावजूद जनता दल के चिमनभाई पटेल को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया और कांग्रेस को सबसे बड़ी ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी भाजपा ने विधानसभा चुनाव 1995 और 1998 में केशूभाई पटेल को सीएम पद का प्रत्याशी घोषित किया। जनादेश भाजपा को मिला।

गुजरात में मोदी का विकल्प नहीं खड़ा कर सकी कांग्रेस

वडनगर से लेकर देश के कोने-कोने और हिमालय तक खाक़ छान चुके नरेन्द्र मोदी का चुनावी राजनीति में प्रवेश 7 अक्टूबर, 2001 को हुआ, जब उन्होंने केशूभाई पटेल के स्थान पर गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। भाजपा के ध्रुवीकरण और राज्य में अच्छे शासन के चलते पहले से ही पस्त कांग्रेस मोदी के आते ही ध्वस्त हो गई। मोदी ने राजकोट 2 विधानसभा क्षेत्र से जीवन का पहला उप चुनाव लड़ा, तब भी कांग्रेस ने मजबूत उम्मीदवार नहीं उतारा। इसके बाद गोधरा कांड और गुजरात दंगों ने गुजरात की पहले से ही ध्रुवीकृत राजनीति को और अधिक ध्रुवीकृत कर दिया। 2002 के गुजरात दंगों के बाद कांग्रेस ने व्यक्ति विरोध का एजेंडा शुरू किया, जो उसे आज तक भारी पड़ा और उसका साथ देने वाले हर राजनीतिक दलों के लिए 23 मई को सिर फोड़ने की नौबत आने के आसार हैं। कांग्रेस ने पूरे देश में मोदी विरोधी आलोचनाओं की बरसात में खुद को जोड़ लिया और गुजरात की जनता की नब्ज को छोड़ दिया। मोदी का देशव्यापी प्रचंड विरोध हो रहा था। ऐसे में कांग्रेस के पास पहला अवसर था कि वह गुजरात विधानसभा चुनाव 2002 में मुख्यमंत्री के रूप में कोई एक सशक्त चेहरा प्रस्तुत करती, परंतु गुटबाजी के लिए कुख्यात कांग्रेस मोदी का विकल्प प्रस्तुत करने से हिचकिचाई और मोदी चुनाव जीत गए। एक तरफ मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अच्छा काम कर रही थी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में एसी कमरों में प्रेस कॉन्फ्रेंसें कर केवल सरकार की आलोचना करती रही। पाँच वर्षों में कांग्रेस में कोई एक चेहरा उभर कर सामने नहीं आया और गुजरात विधानसभा चुनाव 2007 में भी मोदी के सामने कांग्रेस की तरफ से कोई चेहरा नहीं था। जनता को यह तो पता था कि भाजपा को वोट देने से मोदी मुख्यमंत्री बनेंगे, परंतु जनता यह नहीं जानती थी कि भाजपा को वोट नहीं देने से कौन मुख्यमंत्री बनेगा ? यही हालात गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 में भी रहे, जब मोदी निर्विकल्प थे। कांग्रेस ने चुनाव से पहले लगातार मोदी के सामने कोई विकल्प प्रस्तुत नहीं करने की भयभीत परम्परा जारी रखी और 2012 की चुनावी जीत मोदी को केन्द्र की राजनीति में ले आई। कांग्रेस देखती ही रह गई।

देश को भी धोखे में रखा कांग्रेस ने

लोकसभा चुनाव 2014 में एक तरफ जहाँ कांग्रेस नीत यूपीए सरकार और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के विकल्प के रूप में भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, वहीं कांग्रेस ने पूरे चुनावी अभियान में कभी यह ताल ठोक कर नहीं कहा कि यदि वह चुनाव जीती, तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही रहेंगे। वंशवाद की राजनीति में आकंठ डूबी कांग्रेस तो यह सपने संजो रही थी कि यदि 2014 के चुनाव में जीत मिली और मौका मिला, तो राहुल गांधी की प्रधानमंत्री के रूप में ताजपोशी कर दी जाएगी। इस तरह विकल्प के मामले में कांग्रेस ने हमेशा देश को धोखे में रखा। 2014 में तो फिर भी जनता के एक वर्ग ने यह मान कर कांग्रेस को वोट दिया कि यदि कांग्रेस-यूपीए सत्ता में लौटे, तो मनमोहन सिंह या फिर राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे, परंतु लोकसभा चुनाव 2019 में तो कांग्रेस ने विकल्प के मामले में सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। ऐसे में जबकि 2014 की सत्ता विरोधी लहर के विपरीत 2019 में मोदी सरकार के विरुद्ध बोलने-करने को बहुत कुछ था, कांग्रेस को देश के सामने मोदी के विकल्प के रूप में चेहरा सामने रखना था, परंतु कांग्रेस-राहुल गांधी की अपरिपक्वता, सहयोगी दलों के अंतर्विरोध के कारण देश को धोखे में रखा गया। आपसी अंतर्विरोध के चलते मोदी विरोधी झुंड मोदी के विकल्प के रूप में बीसियों धुरंधर नेताओं में से किसी एक को भी प्रस्तुत नहीं कर सका। इस तरह 2001 से लेकर 2019 यानी पिछले 18 वर्षों से मोदी निर्विकल्प रहे हैं और आने वाले भविष्य में भी कहीं कोई आसार नहीं दिखाई देते कि मोदी से टक्कर लेने का किसी विपक्षी नेता में साहस होगा।

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