महाराष्ट्र : पवार की ‘प्योरिटी’ ही फडणवीस सरकार की ‘स्योरिटी’ !

* शिवसेना की स्थिति, ‘एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय’

* कांग्रेस की दुर्गति, ‘जो नहीं करना चाहिए था, वो करके कराई किरकिरी’

* भाजपा की रणनीति, ‘उस पवार को साधा, जो सरकार बनवा सके’

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 23 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के परिणाम आने को एक माह पूरा होने से 24 घण्टे पहले अंतत: जनता को नई सरकार मिल ही गई। देवेन्द्र फडणवीस मुख्यमंत्री बन गए और जनता को बोनस में अजित पवार के रूप में एक उप मुख्यमंत्री भी मिल गया। अब फडणवीस को 30 नवंबर, 2019 तक विधानसभा में बहुमत सिद्ध करना है।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) के नेता देवेन्द्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) अध्यक्ष शरद पवार के सगे भतीजे और समाचार लिखे जाने तक एनसीपी के ही नेता अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली, परंतु पिछले एक महीने से चल रहा शह-मात के खेल का पटाक्षेप अब 30 नवंबर, 2019 से पूर्व समाप्त नहीं होने वाला, क्योंकि भाजपा ने एनसीपी नेता अजित पवार को साध कर सरकार तो बना ली, परंतु अब फडणवीस के समक्ष विधानसभा में बहुमत के लिए आवश्यक 145 विधायकों का समर्थन सिद्ध करने की सबसे बड़ी चुनौती है।

मोदी-शाह का काम कच्चा नहीं हो सकता !

तथाकथित और पुराने पड़ चुके राजनीतिक पंडित अब भी उसी दौर की राजनीति में जी रहे हैं, जब कोई राजनीतिक दल या उसका नेता केवल मुख्यमंत्री बनने के लिए आनन-फानन में सरकार तो बना लेता था, परंतु विधानसभा में बहुमत सिद्ध नहीं कर पाता था। यही कारण है कि फडणवीस सरकार के गठन की भनक या अनुमान तक नहीं लगा पाने वाले राजनीतिक पंडित अब इस गणितबाज़ी में जुट गए हैं कि फडणवीस बहुमत कैसे सिद्ध करेंगे ? यद्यपि यह प्रश्न सिरे से नकार दिए जाने लायक नहीं है, परंतु जो लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की धारदार रणनीति और कूटनीति को जानते हैं, वे यह दावे के साथ कह रहे हैं कि मोदी-शाह ने यदि अजित पवार को साध कर महाराष्ट्र में सरकार का गठन किया है, तो वह कोई कच्चा या गच्चा खाने वाला काम नहीं हो सकता। शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के बीच चर्चाओं के दौर के बीच भाजपा यदि शांत और मूकप्रेक्षक थी, तो निश्चित रूप से मोदी-शाह महाराष्ट्र के लिए कोई बड़ा प्लान तैयार कर रहे थे और यदि भाजपा हाईकमान ने फडणवीस सरकार का गठन करवाया है, तो निश्चित रूप से वह इस बात से पूरी तरह आश्वस्त होगा कि विधानसभा में बहुमत के लिए आवश्यक 145 विधायकों का समर्थन हासिल हो जाएगा।

‘पाप’ की बात करने वालों के ‘शिवाजी’ अब जागे

फडणवीस सरकार के गठन से सबसे बड़ा झटका शिवसेना को लगा, जो चंद घण्टे पहले ही मुख्यमंत्री के रूप में उद्धव ठाकरे के नाम की घोषणा एनसीपी प्रमुख शरद पवार के मुख से सुन चुकी थी। शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन की समग्र प्रक्रिया के दौरान उद्धव ठाकरे के सिपहसलार और शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत लगातार बड़बोलापन दिखाते रहे। भाजपा से 50-50 फॉर्मूला पर बात नहीं बनते देख संजय राउत ने कहा था, ‘शिवसेना कांग्रेस-एनसीपी से गठबंधन का पाप नहीं करना चाहती, परंतु यदि भाजपा नहीं मानी, तो हम यह पाप करेंगे।’ राउत खुलेआम जिस बात को पाप बता रहे थे, वह पाप शिवसेना ने किया भी, परंतु जब सफलता नहीं मिली और फडणवीस मुख्यमंत्री बन गए, तो संजय राउत ने इसे भाजपा का पाप करार दिया। राउत को छत्रपति शिवाजी की भी याद आ गई, जिनके नाम पर राजनीति करते हुए शिवसेना ने हज़ारों बार कांग्रेस और एनसीपी को कोसा। इस पूरे खेल में यदि सबसे बड़ा किसी का नुकसान हुआ है, तो वह शिवसेना ही है। हिन्दी में एक कहावत है, ‘एक साधे सब सधे-सब साधे सब जाय’। यह कहावत शिवसेना पर ख़री उतरी है। यदि उसने एक भाजपा को साध लिया होता, तो आज उसका उप मुख्यमंत्री होता और महत्वपूर्ण मंत्रालय भी उसके पास होते, परंतु शिवसेना ने एक भाजपा की बजाए कांग्रेस-एनसीपी, जिनमें आपसी विरोधाभास है, उन्हें साधने की कोशिश की और उसके हाथ खाली रह गए।

राजनीतिक अपरिपक्वता का शिकार कांग्रेस

महाराष्ट्र की पूरी महाभारत में कांग्रेस एक ऐतिहासिक व सबसे पुरानी पार्टी होने के बावज़ूद राजनीतिक अपरिपक्वता का शिकार दिखाई दी। वैसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तत्काल शिवसेना का समर्थन करने को तैयार नहीं हुईं, क्योंकि कदाचित उनकी अंतरात्मा की आवाज़ उन्हें ऐसा करने से रोक रही थी, परंतु बातचीत की लंबी प्रक्रिया के दौरान जब सोनिया को लगा कि शिवसेना सभी सैद्धांतिक मूल्यों को ताक पर रखने को तैयार है और एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने भी सोनिया के गले यह बात अच्छी तरह उतार दी, तब सोनिया और कांग्रेस तैयार हुईं, परंतु यह पूरी प्रक्रिया करने में दोनों पार्टियों ने बहुत देर कर दी। वास्तव में कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक अपरिवक्वता का ही परिचय दिया। कांग्रेस को चाहिए था कि वह एक राष्ट्रीय पार्टी की तरह सोचती और इस पूरे खेल से स्वयं को दूर रखती, परंतु सोनिया गांधी उस शरद पवार के बहकावे में आ गईं, जिन्होंने स्वयं उनके विदेशी मूल के विरुद्ध एनसीपी बनाई थी।

भाजपा ने दिखा दिया दम

आज देश में सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी भाजपा ने महाराष्ट्र के सत्ता संग्राम में पंद्रह दिनों तक मौन रहने के बाद अचानक राजभवन में पत्ते खोले, तो सभी दंग रह गए, परंतु भाजपा ने दिखा दिया कि वह शांत अवश्य थी, परंतु निष्क्रिय नहीं थी। मोदी-शाह दिल्ली से निरंतर महाराष्ट्र के राजनीतिक घटनाक्रमों पर नज़र बनाए हुए थे, तो साथ ही शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के बिना भी सरकार के गठन की संभावना पर रिसर्च कर रहे थे और उसी रिसर्च में उन्होंने उस पवार (शरद नहीं, अपितु अजित) को साधा, जो सरकार बनवा सकते थे। मोदी-शाह की रणनीति रंग लाई और देवेन्द्र फडणवीस मुख्यमंत्री बन गए।

पवार के पास अब दो ही विकल्प

महाराष्ट्र की राजनीति में धुरंधर माने जाने वाले शरद पवार पिछले 20 दिनों से किंगमेकर की भूमिका में थे, परंतु अब पवार के समक्ष दो ही विकल्प हैं। पहला विकल्प यह है कि वे अपने भतीजे अजित पवार को एनसीपी से निष्कासित करें और फडणवीस सरकार को बहुमत सिद्ध करने से रोकें, जबकि दूसरा विकल्प यह है कि वे अजित पवार का साथ दें और 2014 की तरह फडणवीस सरकार को बनाए रखने के लिए विधानसभा से वॉकआउट सहित जो भी दावपेच खेले जा सकते हैं, वह खेलें। यदि पवार भतीजे अजित का साथ नहीं देंगे, तो एनसीपी में फूट पड़ना निश्चित है, क्योंकि कई विधायक सत्ता पक्ष की ओर जा सकते हैं। यदि पवार अजित का साथ देते हैं, तो उन्हें न केवल राज्य सरकार में भागीदारी मिलेगी, अपितु उनकी पुत्री सुप्रिया सुळे को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में स्थान मिलने के द्वार भी खुल सकते हैं। ऐसे में अब पवार की प्योरिटी ही फडणवीस सरकार की स्योरिटी बन गई है। प्रश्न यह रह जाता है कि पवार अपनी प्योरिटी किस विकल्प को चुन कर सिद्ध करते हैं।

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