न्याय, नारा और नादानी : राहुल के राजनीतिक कैरियर पर ग्रहण तो नहीं लगा देंगे ये 3 N ?

लोकसभा चुनाव 2019 में सभी राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी है, परंतु सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP) की प्रतिष्ठा, तो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का अस्तित्व इस चुनाव में दाँव पर लगा हुआ है।

भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो जनता पर सीधा प्रभाव डालने वाले चुनावी नारे बनाने, राजनीतिक परिपक्वता और संगठन शक्ति का सुनियोजित उपयोग करने में निपुण हैं, परंतु दूसरी तरफ किसी भी मूल्य पर केन्द्र की सत्ता से भाजपा और मोदी को उखाड़ फेंकने की धुन लेकर चल रहे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की ओर से चुनाव जीतने के लिए अब तक फेंके गए अनेक पासे सवालों के घेरे में हैं। इन पासों में अंग्रेजी अक्षर N से बने तीन मुद्दे शामिल हैं, जो राहुल के लिए मुसीबत का सबब बने हुए हैं या बन सकते हैं। ये ट्रिपल एन हैं न्याय, नारा और नादानी। आइए आपको बताते हैं कि ये ट्रिपल एन किस तरह कांग्रेस को लाभ की जगह हानि पहुँचा सकते हैं और जो कांग्रेस 23 मई को विजय हासिल करने की उम्मीद लगाए बैठी है, उसे निराशा हाथ लग सकती है ?

न्याय ने कैसे भटकाया कांग्रेस को ?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब देश के प्रत्येक नागरिक की मासिक न्यूनतम् आय 12 हजार रुपए निर्धारित करने वाली न्यूनतम आय योजना (NYAY) की घोषणा की, तो कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता और कई राजनीतिक विश्लेषक इसे मास्टर स्ट्रोक बता रहे थे। अब तक के पूरे चुनावी अभियान में भी कांग्रेस और राहुल ने पूरा ध्यान न्याय पर ही केन्द्रित कर रखा है। न्याय योजना केवल 25 करोड़ ग़रीबों के लिए ही है, परंतु इस योजना के नाम को आगे रख कर अन्य मुद्दों के साथ भी न्याय करने की बात कह रही है, परंतु कदाचित कांग्रेस का यह निशाना सटीक नहीं बैठेगा, क्योंकि सरकारी धन की आशा रखने वाले मतदाता केवल उस 12,000 रुपए पर ही ध्यान दे रहे हैं। न्याय के चलते कांग्रेस जिस बेरोजगारी, नोटबंदी और राफेल जैसे मुद्दों को मोदी के खिलाफ उठा रही थी, वे तमाम मुद्दे चुनावी पराकाष्ठा के बीच लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। इस तरह न्याय ने कांग्रेस को कहीं न कहीं असली मुद्दों से भटका दिया है। यदि 23 मई को परिणाम कांग्रेस के पक्ष में नहीं आए, तो यह बात सिद्ध भी हो जाएगी कि न्याय मास्टर स्ट्रोक नहीं, बल्कि डिज़ास्टर स्ट्रोक थी।

नारा बन गया बोझ

अक्सर चुनावों में राजनीतिक दलों के जनता के मन पर सीधा प्रभाव डालने वाले नारे ही काम कर जाते हैं। राहुल गांधी ने भी इस बार नारों की राजनीति शुरू की। उन्होंने सबसे पहला और मजबूत नारा दिया, ‘चौकीदार चोर है’। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राफेल डील में सीधे-सीधे चोर बता कर राहुल गांधी ने तीन राज्यों में विधानसभा चुनावों में जीत भी हासिल कर ली, परंतु यह नारा धीरे-धीरे कमजोर होता गया, क्योंकि पुलवामा आतंकी हमले के बाद एयर स्ट्राइक करके मोदी ने राष्ट्रवाद का मजबूत नारा दिया और यह संदेश देने में वे सफल रहे कि मोदी के हाथों में ही देश सुरक्षित है। अब चुनावी घमासान के बीच जब सुप्रीम कोर्ट का राफेल डील पर एक फैसला आया, तब भी राहुल ने इस नारे को जोर-शोर से उठाया, परंतु बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का निचोड़ लोगों के सामने आया, उससे स्वयं राहुल की ही फज़ीहत हो गई।

नादानी डुबो सकती है नैया

कांग्रेस उपाध्यक्ष से अध्यक्ष बनने तक की राजनीतिक यात्रा में राहुल गांधी ने कई बार राजनीतिक अपरिक्वता यानी नादानी के प्रमाण और दृष्टांत दिए हैं। बहुत पीछे जाने की आवश्यकता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट (SC) ने गत 10 अप्रैल को राफेल डील पर जो फैसला दिया, उसका अपनी मरजी से अर्थघटन करते हुए राहुल ने कह दिया, ‘सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चौकीदार चोर है, चौकीदार ने चोरी कराई है’। यहीं राहुल की नादानी उजागर हो गई और अब उन्हें सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है। अभी तो राहुल को अपनी इस नादानी के दुष्परिणाम का अंदेशा भी नहीं हुआ था कि राहुल पर उनकी दूसरी नादानी मुसीबत बन कर सामने आ गई। राहुल ने मोदी पर राजनीतिक हमला करते हुए नीरव मोदी और ललित मोदी का नाम जोड़ कर जो वक्तव्य दिया, उसका सीधा संदेश ये गया कि जैसे राहुल ये कहना चाहते हैं कि सारे मोदी चोर हैं। इसी बात को लेकर जहाँ एक तरफ उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में स्थित प्रतिष्ठित और कांग्रेस समर्थक गाँव मोदीनगर के लोग राहुल के प्रति रुष्ट हैं, तो दूसरी तरफ अब राहुल पर एक और मुकदमा दर्ज करा दिया गया है। बिहार के उप मुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने पटना के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में मुकदमा दर्ज कराते हुए कहा, ‘राहुल के वक्तव्य से मोदी टाइटल वाले व्यक्ति हैं, उनको चोर बताया गया है। इससे समाज में उनकी छवि धूमि हुई है। यह आपराधिक कृत्य है, जिसकी सजा राहुल को जरूर मिलनी चाहिए।’

क्या राहुल लेंगे सबक ?

इन तीनों N के विश्लेषण के बाद प्रश्न यही उठता है कि राहुल गांधी इन नादानियों से सबक लेंगे ? क्या राहुल को लगता है कि केवल न्याय के जरिए वे देश की सत्ता हासिल कर पाएँगे ? यदि नहीं, तो अब भी समय है। लोकसभा चुनाव 2019 में अभी 19 मई तक मतदान होने वाला है। राहुल को अपनी रणनीति, राजनीति और परिपक्वता पर पुनर्विचार करने की महती आवश्यकता है।

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