‘बेकार इंजन’ से तौबा कर रहे युवा : पाँच वर्षों में 7,248 छात्रों ने छोड़ी इंजीनियरिंग की पढ़ाई…

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 9 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। जब कोई इंजन गाड़ी को चला न सके, तो उस इंजन को कोई गाड़ी में रखेगा ही क्यों ? कुछ यही स्थिति देश में इन दिनों इंजीनियरिंग शिक्षा के क्षेत्र की है। देश में कभी डॉक्टर के रूप में अपने नाम से पहले Dr. लगाने को प्रतिष्ठासूचक माना जाता था, उसी तरह इंजीनियर के रूप में लोग अपने नाम से पहले Er. लगा कर डॉक्टर के समकक्ष स्वयं को मानने का संतोष प्राप्त करते थे, परंतु समय इतना तेजी से बदला कि अब इंजीनियरिंग की शिक्षा के दिन लदते दिखाई दे रहे हैं और इस प्रमुख कारण है डिग्री प्राप्ति के बाद रोजगार का उचित अवसर न मिल पाना।

भारत में वैसे तो इंजीनियरिंग की शिक्षा देने वाले अनेक विश्वविद्यालय (UNIVERSITIES) और महाविद्यालय (COLLEGES) हैं, परंतु इंजीनियरिंग शिक्षा का गढ़ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) को माना जाता है, परंतु आश्चर्य की बात यह है कि अत्यंत कठिन परिश्रम के बाद आईआईटी में प्रवेश प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों ने इंजीनियरिंग से तौबा करना शुरू कर दिया है। देश के अन्य विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों की तो छोड़िए, अकेले देश के 22 आईआईटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या 7,428 है। यह अधिकृत आँकड़ा है, जो केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से लोकसभा में प्रस्तुत किया गया है। सरकार ने लोकसभा में आईआईटी में एग्ज़िट ऑप्शन की सुविधा देने को लेकर बयान देते हुए यह आँकड़ा प्रस्तुत किया, जो वास्तव में चौंकाने वाला है।

ऑप्शन मिलते ही एग्ज़िट !

वास्तव में विद्यार्थी उत्साह में आकर आईआईटी से इंजीनियरिंग करने के लिए प्रवेश तो ले लेते हैं, परंतु दबाव नहीं झेल पाते। यही कारण है कि हज़ारों विद्यार्थी इस दबाव को न झेल पाने के कारण इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में ही छोड़ रहे हैं और कई नए छात्र अब इंजीनियरिंग के क्षेत्र में आना ही नहीं चाहते। सरकार ने जैसे ही आईआईटी में एग्ज़िट ऑप्शन की सुविधा दी, कई विद्यार्थियों ने तुरंत उसे लपक लिया। एग्ज़िट ऑप्शन के अंतर्गत छात्रों को दूसरे सेमेस्टर के बाद अपना कोर्स बदल कर बीटेक से बीएससी करने की अनुमति दी जाती है। सरकार के एग्ज़िट ऑप्शन देने के बाद बड़ी संख्या में छात्रों ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई से एग्ज़िट कर ली और नए कोर्स में दाखिला ले लिया।

प्रति वर्ष 15 लाख युवा बनते हैं इंजीनियर

भारत में हर साल लगभग 15 लाख इंजीनियर कॉलेजों से डिग्री लेकर निकलते हैं। इतने इंजीनियर अमेरिका और चीन मिल कर भी पैदा नहीं करते हैं और भारत के इन इंजीनियरों की संख्या आइसलैंड की कुल आबादी से भी दुगुनी है। हालांकि ऑल इंडिया कौंसिल फॉर टेक्नीकल एजूकेशन (AICTE) के अनुसार इस वर्ष यानी 2019-20 में देश के 3,122 विश्व विद्यालयों और उनसे संबद्ध कॉलेजों में स्नातक और परास्नातक की 14,66,114 सीटों को दाखिले के लिये खोला गया है, जबकि पिछले साल यानी 2018-19 में 3,241 विश्व विद्यालयों व उनसे संबद्ध कॉलेजों ने 15,87,097 सीटें दाखिले के लिये खोली थीं। इस साल यूजी और पीजी इंजीनियरिंग संस्थानों की कुल सीटों में से 1.20 लाख सीटें घटा दी गई हैं। इंजीनियरिंग की कुछ स्ट्रीमों में हालाँकि कौंसिल ने 54,618 नई सीटों को भी मंजूरी दी है, परंतु कुछ स्ट्रीम्स को छोड़ कर कॉलेजों ने उन पाठ्यक्रमों के लिये कक्षाएँ जारी रखने से इनकार कर दिया है, जो अब माँग में नहीं हैं। इसलिये महाराष्ट्र सहित 6 राज्यों को तकनीकी शिक्षा निदेशालय ने एआईसीटीई से अनुरोध किया है कि उनके राज्यों में किसी भी नये संस्थान को मंजूरी न दी जाए। ज्ञात हो कि पिछले सत्र में इंजीनियरिंग संस्थानों में 49.30 प्रतिशत सीटें खाली रही थी। इसलिये दिसंबर-2018 में एक नव नियुक्त विशेष समिति ने नये इंजीनियरिंग कॉलेजों के एफिलिएशन पर दो साल का प्रतिबंध लगा दिया है, जो 2020 से शुरू होगा। 2020 के शैक्षणिक सत्र में नये इंजीनियरिंग कॉलेजों में बीटेक में दाखिले नहीं होंगे। अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय बाजार में इंजीनियरिंग की माँग घटने से केन्द्रीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह सिफारिश की है। ऐसे में पारंपरिक कोर्स मेकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, सिविल व इलेक्ट्रॉनिक्स के बजाय कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग, एयरोस्पेस तथा मेकाट्रॉनिक्स जैसे डिमांड वाले कोर्स की पढ़ाई पर जोर देने की बात कही जा रही है। साथ ही पारंपरिक कोर्स की सीटों को नये रोजगार देने वाले कोर्स से जोड़ने की भी सिफारिश की गई है। समिति ने हर दो वर्ष में इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम, परीक्षा व कोर्स को रिव्यू करने का भी सरकार को सुझाव दिया है। इतना ही नहीं, इंजीनियरिंग कॉलेजों में अब शिक्षक एमटेक के बाद सीधे पढ़ाई नहीं करवा सकेंगे। समिति ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवाने वाले शिक्षकों को बीएड, यूजीसी-नेट की तर्ज पर एजूकेशन में डिग्री, सर्टिफिकेट या डिप्लोमा की पढ़ाई करवाने की भी सिफारिश की है।

भारत के 80 प्रतिशत इंजीनियर बेरोजगार

रोजगार का आकलन करने वाली कंपनी ‘एस्पायरिंग माइंड्स’ की रिपोर्ट के अनुसार देश के 80 प्रतिशत से भी अधिक भारतीय इंजीनियरों को नौकरी नहीं मिलती है और वह बेरोजगारी के शिकार हैं। कंपनी की यह रिपोर्ट भारत, अमेरिका और चीन के इंजीनियरिंग छात्रों पर की गई एक रिसर्च पर आधारित है। कंपनी की रिसर्च में बेरोजगार रह जाने का यह तथ्य सामने आया है कि इंजीनियरिंग संस्थानों से निकलने वाले छात्र रोजगार पाने के लिये तैयार नहीं होते हैं। कंपनियों की प्रायः यह शिकायत होती है कि उनमें रोजगार के लिये आवश्यक कुशलता और प्रतिभा नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार 3.84 प्रतिशत इंजीनियरों के पास स्टार्ट-अप में सॉफ्टवेयर से सम्बंधित नौकरियों के लिये आवश्यक तकनीकी, संज्ञानात्मक और भाषाई स्किल होती है, जबकि मात्र 3 प्रतिशत इंजीनियरों के पास उन क्षेत्रों में नये-पुराने तकनीकी कौशल की जानकारी होती है, जो अब फलफूल रहे हैं। जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, डेटा साइंस और मोबाइल डेवलपमेंट। इस प्रकार मात्र 1.7 प्रतिशत इंजीनियरों के पास ही नये दौर की नौकरियों का काम करने के लिये आवश्यक कौशल होता है। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय इंजीनियरों के बेरोजगार रहने का एक और बड़ा कारण यह भी है कि केवल 40 प्रतिशत इंजीनियरिंग छात्र एक इंटर्नशिप करते हैं, जबकि मात्र 7 प्रतिशत छात्र ही कई इंटर्नशिप करते हैं। इंटर्नशिप की कमी के अलावा केवल 36 प्रतिशत इंजीनियरिंग छात्र ही अपने कोर्स से परे प्रोजेक्ट करते हैं। इस प्रकार वे विभिन्न स्थितियों में समस्याओं को हल करने के योग्य नहीं हो पाते हैं। इसके अलावा एक कारण यह भी कि कॉलेजों में बहुत ही सैद्धांतिक तरीके से इस विषय को पढ़ाया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत की तुलना में अमेरिका और चीन में 3 से 4 गुना अधिक इंजीनियर हैं।

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