वाराणसी से चुनाव लड़ कर दो इतिहास रचेंगे नरेन्द्र मोदी, जानिए पूरा इतिहास कि कैसे भाजपा ने ढहाया कांग्रेस के इस मजबूत किले को ?

नरेन्द्र मोदी वाराणसी से दूसरी बार लोकसभा का चुनाव लड़ने जा रहे हैं। पहली बार 2014 में उन्होंने वाराणसी और वडोदरा दो लोकसभा सीटों से जीत हासिल की थी, परंतु उन्होंने वडोदरा सीट से त्यागपत्र दे दिया था और फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। नरेन्द्र मोदी इस बार भी वाराणसी से ही चुनाव लड़ने जा रहे हैं और 26 अप्रैल को नामांकन पत्र दाखिल करने वाले हैं। आप सोच रहे होंगे कि इसमें नया क्या है ? परंतु आब ग़लत है। 2014 और 2019 के बीच दो नई बातें इस बार पहली बार होंगी। पहली यह कि नरेन्द्र मोदी एक प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार नामांकन पत्र दाखिल करेंगे। दूसरी बात यह नई होगी कि वाराणसी से पहली बार कोई प्रधानमंत्री चुनाव मैदान में उतरेगा।

कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा वाराणसी

वाराणसी लोकसभा सीट 1952 में अस्तित्व में आई और पहले ही चुनाव में यहाँ कांग्रेस के रघुनाथ सिंह विजयी हुए। इसके बाद 1957 और 1962 के चुनावों में भी कांग्रेस और रघुनाथ सिंह का वाराणसी पर कब्जा रहा, परंतु 1967 के चुनाव में कांग्रेस के इस गढ़ में तब सेंध लग गई, जब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा-CPM) के सत्य नारायण सिंह ने जीत हासिल की। 1971 में राजाराम शास्त्री ने जीत कर पुनः वाराणसी सीट कांग्रेस की झोली में डाल दी, परंतु 1977 में आपातकाल और इंदिरा विरोधी लहर में कांग्रेस का वाराणसी किला फिर ढह गया। भारतीय लोक दल (भालोद-BLD) के चंद्र शेखर वाराणसी से जीते। हालाँकि कांग्रेस का प्रभाव यहाँ कम नहीं हुआ और 1980 में कमलापति त्रिपाठी ने वाराणसी में कांग्रेस की वापसी कराई, तो 1984 में श्यामलाल यादव ने कांग्रेस के लिए यह सीट बनाए रखी, परंतु 1989 में राजीव विरोधी और भाजपा-जनता दल गठबंधन के पक्ष में चली लहर में कांग्रेस वाराणसी पर कब्जा बनाए रखने में विफल रही। पूर्व प्रधानमंत्री व कांग्रेस नेता लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र तथा जनता दल के उम्मीदवार अनिल शास्त्री इस बार वाराणसी फतह करने में सफल हुए।

1991 से वाराणसी बना भाजपा का गढ़

राम मंदिर आंदोलन और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद 1991 में हिन्दुओं की आस्था से जुड़ी काशी (वाराणसी) नगरी ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया और पहली बार यहाँ भाजपा ने वाराणसी में झंडा गाड़ा और शिरीष चंद्र दीक्षित विजयी हुए। 1996, 1998 और 1999 में भी भाजपा को ही वाराणसी के लोगों ने प्यार दिया और तीनों बार शंकर प्रसाद जयसवाल को सांसद के रूप में चुना। हालाँकि 2004 में कांग्रेस ने राजेश कुमार मिश्रा की जीत के साथ फिर एक बार वाराणसी में वापसी की, परंतु 2009 में भाजपा के डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने यह सीट फिर एक बार पार्टी की झोली में डाल दी।

भाजपा से अधिक मोदी को प्रेम दिया वाराणसी ने

लोकसभा चुनाव 2014 में नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी से चुनाव लड़ा और अब वे दूसरी बार चुनाव लड़ने जा रहे हैं, परंतु वाराणसी में भाजपा से जुड़े इतिहास की मोदी से तुलना करने पर पता चलता है कि वाराणसी की जनता ने भाजपा से अधिक मोदी को प्रेम दिया। भाजपा ने 1991 में वाराणसी में पहली जीत हासिल की। इस चुनाव में भाजपा 41.10 प्रतिशत वोट मिले। इसके बाद भाजपा को वाराणसी में 1996 में 44.62, 1998 में 42.98, 1999 में 33.95, 2004 में 23.61 और 2009 में 30.52 प्रतिशत वोट हासिल हुए, परंतु जब 2014 में मोदी ने इस सीट से चुनाव लड़ा, तो जनता ने मोदी के नाम पर भाजपा को 56.37 प्रतिशत वोट दिया, जो 2009 की तुलना में 25.85 प्रतिशत अधिक था।

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