ढिंढोरे का ढर्रा ढेर : ‘सबका विश्वास’ की ओर ‘ढैया’ गति से आगे बढ़ रही मोदी सरकार !

* अल्पसंख्यकों की उन्नति के लिए मोदी के मौन प्रयास

* तुष्टीकरण नहीं, विकास की धारा में जोड़ने की नीति

* शासन न सही, प्रशासन में दिखेंगे अल्पसंख्यक

* ग्रेजुएट लड़कियों को 51000 हजार का शादी शगुन

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 12 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। लोकसभा चुनाव 2014 में गुजरात मॉडल को आधार बना कर पूरे देश का प्रचंड विश्वास अर्जित कर पहली बार प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी ने गुजरात मॉडल के सबसे प्रखर नारे ‘सबका साथ-सबका विकास’ के साथ देश में पाँच साल शासन किया। यह एक ऐसा चामत्कारिक मंत्र सिद्ध हुआ, जिसने अतीत में सच्चर समिति को सन्न कर दिया था। सच्चर समिति गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से यह पूछ बैठी, ‘आपकी सरकार ने मुसलमानों के लिए क्या किया ?’ मोदी ने उत्तर दिया, ‘मेरी सरकार ने मुसलमानों के लिए कुछ नहीं किया है और कुछ भी नहीं करेगी। मेरी सरकार ने हिन्दुओं के लिए भी कुछ नहीं किया है और न ही कुछ करेगी भी। मेरी सरकार गुजरात के सभी नागरिकों के लिए काम करती है और काम करेगी। मेरा मंत्र है सबका साथ, सबका विकास।’

26 मई, 2014 से देश के प्रधानमंत्री पद पर आरूढ़ नरेन्द्र मोदी की सरकार में भी अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय है, परंतु मोदी सरकार की लगभग सभी योजनाएँ ऐसी हैं, जिनसे किसी धर्म-जाति-वर्ग विशेष को नहीं, अपितु सबको लाभ होता है। यही कारण है कि भले ही देश के मुसलमानों ने सदैव की तरह लोकसभा चुनाव 2014 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) को वोट नहीं दिया होगा और लोकसभा चुनाव 2019 में भी भाजपा को वोट नहीं देने की परम्परा दोहराई होगी, परंतु मोदी को इस बात का कोई मलाल नहीं है। यद्यपि 2014 और 2019 में एक बड़ा फर्क़ यह अवश्य देखने को मिला कि देश की जनता ने 2014 में जहाँ मोदी के नाम पर जाति-धर्म से ऊपर उठ कर वोट दिया था, तो 2019 में मोदी के काम पर जाति-धर्म से ऊपर उठ कर वोट दिया।

पाँच वर्ष के कार्यकाल के बाद दूसरी बार और वह भी अधिक प्रचंड बहुमत से सरकार बनाना कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है, परंतु इतनी भारी उपलब्धि के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हृदय को कहीं न कहीं एक बात कचोट रही थी और वह यह थी कि उनकी सरकार के पाँच वर्ष के कार्यकाल के दौरान किए गए अनेक कार्यों से हर ग़रीब को फायदा हुआ, फिर वह हिन्दू हो या मुसलमान। इसके बावजूद देश के मुसलमानों का विश्वास जीतने में उनकी सरकार को कदाचित अपेक्षित सफलता नहीं मिली और मोदी के हृदय की यह टीस संसद के सेंट्रल हॉल में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) संसदीय दल की बैठक में भी उभर कर सामने आई।

बस, फिर क्या था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनादेश में खल रही सम्पूर्ण विश्वास की कमी को दूर करने के लिए एक नया नारा दिया, ‘सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास’। इस नारे में जो तीसरे नंबर का ‘सबका’ है, उनमें देश का मुस्लिम समुदाय है, जो भाजपा की कथित कट्टर हिन्दुत्ववादी नीति के चलते सदैव अभाजपाई (NON-BJP) दलों को मन से या बिना मन से वोट देता है, परंतु मोदी सरकार ने अपने नए नारे के साथ अब तय किया है कि लोकसभा चुनाव 2024 से पहले देश के अल्पसंख्यक समुदाय का भी विश्वास अर्जित करने के भरपूर प्रयास किए जाएँगे। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में ऐसा करने के प्रयास नहीं किए। ट्रिपल तलाक़ के विरुद्ध कानून लाकर मोदी सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय की आधी आबादी (महिलाओं) को न्याय दिलाने के लिए जान लगा दी और दूसरे कार्यकाल में जैसे ही राज्यसभा में बहुमत हासिल होगा, ट्रिपल तलाक़ विरोधी कानून संसद से पारित हो जाएगा।

अल्पसंख्यकों को IAS-IPS बनाने का सकारात्मक प्रयास

अब बात करते हैं शीर्षक की। वास्तव में मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में देश के अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने के लिए दुगुनी नहीं, बल्कि शतरंज के घोड़े की ढैया चाल (ढाई गुना) से काम कर रही है। इसका पहला नमूना बजट 2019-20 में देखने को मिला, जब मोदी सरकार ने अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय का कुल बजट भले ही नहीं बढ़ाया, परंतु एक ऐसा निर्णय किया, जिससे भविष्य में देश के प्रशासन में अल्पसंख्यक अधिकारियों की भागीदारी बढ़ेगी। मोदी सरकार ने पूर्व की सरकारों के अल्पसंख्यकों के लिए किए जाने वाले कार्यों का ढिंढोरा पीटने का ढर्रा ढेर करते हुए बजट 2019 में अल्पसंख्यकों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रावधान किया, जिसके तहत संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा में बैठने वाले अल्पसंख्यक परीक्षार्थियों को निःशुल्क प्रशिक्षण (कोचिंग) उपलब्ध कराने की योजना के लिए आवंटित की जाने वाली राशि ढाई गुना बढ़ा दी गई। यूपीएससी, कर्मचारी चयन आयोग (SSC), विभिन्न राज्यों के लोक सेवा आयोग आदि की परीक्षा में प्रीलिम्स क्वॉलीफाई करने वाले अल्पसंख्यक प्रत्याशियों को मुफ्त व सस्ती कोचिंग के लिए पूर्व में 8 करोड़ रुपए की रकम आवंटित की जाती, जो अब 20 करोड़ रुपए कर दी गई है। इसका सीधा प्रभाव यह पड़ेगा कि प्रशासन में अल्पसंख्यक वर्ग से अधिक से अधिक लोग शामिल हो सकेंगे। राजनीतिक रूप से भाजपा को अस्पृश्य मानने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का मोदी शासन में तो अधिक प्रतिनिधित्व नहीं है, परंतु प्रशासन में यह प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने बजट ढाई गुना बढ़ा दिया है। इसे लेकर मोदी सरकार या स्वयं भाजपा ने कोई ढिंढोरा नहीं पीटा। जैसे सभी वर्गों के लिए बजट में आवंटन हुआ, उसी तरह अल्पसंख्यक समुदाय के लिए भी किया गया।

लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए आकर्षक योजना

मोदी सरकार ने एक और महत्वपूर्ण कार्य किया है। अल्पसंख्यक समाज में लड़कियों की शिक्षा पर ज़ोर देने के लिए एक ऐसी योजना आरंभ की है, जिससे हर मुसलमान पिता चाहेगा कि उसकी बेटी कम से कम ग्रेजुएशन (स्नातक की डिग्री) तो अवश्य करे। मोदी सरकार की यह आकर्षक योजना अल्पंख्यक समुदाय में कन्या शिक्षा को बढ़ावा देगी। वास्तव में केन्द्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के अधीनस्थ संस्था मौलाना आज़ाद एजुकेशन फाउंडेशन (MAEF) ने अल्पसंख्यक समुदाय की उन लड़कियों को उनके निकाह के समय 41 हजाररुपए शादी शगुन के रूप में देने का निर्णय किया है, जिन लड़कियों ने ग्रेजुएट तक की पढ़ाई की हो। मोदी सरकार के अधीनस्थ कार्यरत् एमएईएफ 9वीं और 10वीं कक्षा में पढ़ने वाली मुस्लिम लड़कियों को 10 हजार रुपए और 11वीं तथा 12वीं कक्षा में पढ़ाई करने वाली मुस्लिम लड़कियों को 12 हजार रुपए की छात्रवृत्ति दे रहा है। अब मुस्लिम लड़कियाँ उच्च शिक्षा की ओर भी अग्रसर हों, इस उद्देश्य से शादी शगुन या निकाह सगुन योजना के तहत ग्रेजुएट लड़कियों को शादी के समय 51 हजार रुपए दिए जाएँगे।

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