‘कार्य’ के ‘कर्ता’ कई होते हैं, पर ‘महानायक’ तो भाग्यशाली ही बन पाता है…

* मंगल पांडे ने 1857 में विद्रोह किया, पर महानायक बने महात्मा गांधी

* आडवाणी ने 1990 में राम रथयात्रा निकाली, पर महानायक बने मोदी

अहमदाबाद 21 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। 15 अगस्त, 1947 से पूर्व भी भारत में समस्याओं की कोई कमी नहीं थी, परंतु स्वतंत्रता से पूर्व के उस काल में समस्याओं के उस झुंड में सबसे बड़ी समस्या थी भारत की दासता। करीब 90 वर्षों के लम्बे ऐतिहासिक काल के दौरान भारत ने अपनी अनेक आंतरिक छोटी-बड़ी समस्याओं से जूझते हुए भी भारत की दासता की समस्या को सबसे ऊपर रखा और माँ भारती को दासता की बेड़ियों से मुक्त बनाने को लक्ष्य बनाया। जब लक्ष्य निर्धारित था, कार्य निश्चित था, तो विधाता ने उस कार्य को करने वाले वीरों (कर्ताओं) के अवतरण की भी झड़ी लगा दी। 1857 में मंगल पांडे के विद्रोह और उन्हें दी गई फाँसी के बाद आरंभ हुआ स्वतंत्रता आंदोलन जब 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य तक पहुँचा, तब अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी महानायक बन कर उभरे। ऐसा नहीं है कि भारत की 200 वर्षों की ग़ुलामी के विरुद्ध पूर्व में कोई संघर्ष नहीं हुआ था। 1857 के विद्रोह से लेकर 1942 के निर्णायक भारत छोड़ो आंदोलन तक अनेक शूरवीर मातृभूमि पर बलि चढ़े, परंतु उनके बलिदानों को परिणाम तक पहुँचाने का कार्य विधाता या ईश्वर ने मोहनदास करमचंद गांधी के कर्म में लिखा था और यही कारण है कि वे स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक बने। उस असंभव कार्य के महानायक बने, जो 200 वर्षों के संघर्षों के बावजूद संभव नहीं हो पा रहा था, परंतु महात्मा गांधी ने एक युग पुरुष के रूप में जन्म लिया और अपने काल में स्वतंत्रता प्राप्ति का असंभव दिखाई देने वाला कार्य कर दिखाया, क्योंकि विधाता ने इस कार्य के कर्ता के रूप में उन्हें ही निश्चित किया था।

मंगल पांडे से महात्मा गांधी तक की कहानी स्वतंत्रत भारत में सबसे अधिक मेल खाती है लालकृष्ण आडवाणी और नरेन्द्र मोदी की कहानी के साथ। जी हाँ ! वे आडवाणी ही थी, जिन्होंने चार शताब्दी पुराने राम मंदिर विवाद को हिन्दुओं के पक्ष में उठाते हुए राजनीति की हवा बदल दी थी। भारतीय जनता पार्टी (BJP-बीजेपी) के संस्थापक और वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी 90 के दशक की भारतीय राजनीति का मुखर चेहरा थे। देश में कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के विरुद्ध जहाँ वर्षों तक किसी राजनीतिक दल ने राजनीतिक लाभालाभ को देखते हुए बहुसंख्यक हिन्दुओं की भावनाओं को ताक पर रखा, वहीं 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राम मंदिर का ताला खुलवा कर मात्र 4 वर्ष पुरानी पार्टी भाजपा को बैठे-बिठाए हिन्दुत्व का मुद्दा दे दिया। वैसे भाजपा का पूर्ववर्ती रूप जनसंघ भी हिन्दुत्व की विचारधारा से रंगा हुआ था, परंतु जनसंघ से भाजपा में बदलने के बाद भी हिन्दुत्व की विचारधारा बनी रही। वह भाजपा ही थी, जिसने पहली बार भारतीय राजनीति में हिन्दुओं के पक्ष में खुल कर बातें कहीं और आडवाणी प्रखर हिन्दूवादी नेता के रूप में उभरे।

सारथी मोदी को लेकर राम रथयात्रा पर निकले आडवाणी

भाजपा ने देश में मुस्लिम तुष्टीकरण के विरुद्ध हिन्दुत्ववादी पार्टी के रूप में स्वयं को स्थापित किया और 25 सितंबर, 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की राम रथयात्रा का आरंभ किया। इस रथयात्रा के सारथी तत्कालीन भाजपा महासचिव और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। एक सारथी का कर्तव्य निरंतर अपने रथी को लक्ष्य तक पहुँचान का होता है और मोदी ने अपनी इस भूमिका को बहुत ही श्रेष्ठतम् रूप से निभाया। यह वह दौर था, जब देश में पूर्ण बहुमत वाली सरकारों का अकाल शुरू हुआ था। लोकसभा चुनाव 1984 में 450 से अधिक सीटें जीतने वाली कांग्रेस लोकसभा चुनाव 1989 में बुरी तरह परास्त हुई और वी. पी. सिंह के नेतृत्व में जनता दल-भाजपा गठबंधन की सरकार बनी, परंतु भाजपा ने हिन्दुत्व का मुद्दा नहीं छोड़ा। जनता दल नेता वी. पी. सिंह की राजनीति जाति आधारित थी, वहीं भाजपा ने हिन्दुत्व आधारित राजनीति शुरू की। इसी कारण आडवाणी ने राम रथयात्रा आरंभ की। गुजरात में सोमनाथ से शुरू हुई आडवाणी की रथयात्रा अयोध्या तक नहीं पहुँच सकी, क्योंकि उससे पहले ही बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार ने आडवाणी को ग़िरफ़्तार कर लिया। आडवाणी भले ही ग़िरफ़्तार हो गए हों, परंतु उनकी और सारथी मोदी की राजनीतिक कूटनीति सफल रही, जिसके चलते लोकसभा चुनाव 1991 में भाजपा का जनाधार बढ़ा। जिस भाजपा को लोकसभा चुनाव 1984 में केवल 2 सीटें मिली थीं, उसे 1989 में 85 और आडवाणी की राम रथयात्रा के बाद हुए लोकसभा चुनाव 1991 में 120 सीटें मिलीं। राम मंदिर का मुद्दा भाजपा को निरंतर राजनीतिक लाभ पहुँचाता रहा और भाजपा 1996 में 161, 1998 में 182 तथा 1999 में भी 182 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। इस जीत के नायक आडवाणी थे, परंतु पूर्ण बहुमत का अभाव और उदारवादी चेहरा होने के कारण अटल बिहारी वाजपेयी 1996, 1998 और 1999 में प्रधानमंत्री बने।

कर्ता अनेक, परंतु नायक एक

किसी भी अभियान, आंदोलन या संघर्ष के कर्ता अनेक होते हैं। राम मंदिर आंदोलन के लिए राजनीतिक रूप से जहाँ भाजपा और विशेष रूप से आडवाणी ने विशेष योगदान किया, वहीं सांगठनिक रूप से अनेक विश्व हिन्दू परिषद् सहित अनेक हिन्दू संगठनों ने भी महत्वपूर्ण भमिका निभाई। लाखों कार्यकर्ताओं ने समय-समय पर कारसेवा की। इस दौरान 6 दिसंबर, 1992 को राम मंदिर आंदोलन चरम पर पहुँच गया, जब अयोध्या में लाखों की संख्या में इकट्ठा हुई भीड़ ने विवादास्पद बाबरी मस्जिद का ढाँचा ही ध्वस्त कर दिया। अदालतों में चुनौतियों, कांग्रेस सरकारों की उदासीनता और राजनीति के दावपेच में राम मंदिर आंदोलन मंद पड़ता गया। भाजपा को भी विवादास्पद ढाँचा गिराए जाने के बाद राजनीतिक फायदा अवश्य हुआ, परंतु इतना भी नहीं हुआ कि वह केन्द्र में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना सके और राम मंदिर निर्माण का शासकीय स्तर पर मार्ग प्रशस्त कर सके। वर्षों से चले आ रहे इस आंदोलन में कई कर्ताओं ने भाग लिया और लोकसभा चुनाव 2014 में जब भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला और उस पर भी आडवाणी की राम रथयात्रा के सारथी नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो लोगों विशेषकर हिन्दुओं के बड़े वर्ग को यह लगने लगा कि अब राम मंदिर बन कर ही रहेगा। यद्यपि मोदी ने समाज के सभी वर्गों से मिले समर्थन के पीछे रहे कई महत्वपूर्ण कारणों को प्राथमिकता दी और राम मंदिर मुद्दा पार्टी के घोषणापत्र में होने के बावज़ूद बड़ी ही सूझ-बूझ से देश की ऐसी संवैधानिक संस्था के हवाले कर दिया, जिस पर कोई उंगली नहीं उठा सकता था। मोदी चाहते, तो भाजपा के एजेंडा के अनुरूप लोकसभा चुनाव 2019 में दोबारा जीतने के बाद भी राम मंदिर के लिए पहल कर सकते थे। मोदी के पास पूर्ण बहुमत था। वे ट्रिपल तलाक़ की तरह राम मंदिर के लिए अध्यादेश भी ला सकते थे, जिसके लिए उन पर दबाव भी बनाया गया, परंतु मोदी सरकार ने पूरा मामला संवैधानिक रूप से निपटाने का संकल्प किया। यद्यिप राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने में मोदी सरकार ने अपनी ओर से सुप्रीम कोर्ट में शीघ्रता की पहल की, जो पूर्ववर्ती सरकारें नहीं करती थीं। अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने गत 9 नवंबर को ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर अंतिम मुहर लगा दी और 1990 के सारथी मोदी राम मंदिर निर्माण के नायक बन गए। प्रारब्ध या विधि निर्माता का विधान कदाचित यही था कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हो। इसे ही कहते हैं सौभाग्य।

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