‘लहर’ में न बहने वाले ‘लहेरी लाला’ ने क्या तोड़ दिया 52 वर्ष पुराना RECORD, पर क्यों ? ‘शांत पानी के तूफ़ान’ में किसे मिला वोट और किसे पड़ी चोट ? : पढ़िए गुजरात के मतदान का सटीक विश्लेषण

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

गुजरात में पिछले कुछ वर्षों से एक गुजराती आलबम गीत ‘‘अमे गुजराती ले’री लाला…’’ बहुत विख्यात और लोकप्रिय बना हुआ है। इस गीत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर अदाणी-अंबाणी तक का उल्लेख कर यह बताया गया है कि ये सभी गुजराती हैं, जिन्होंने भारत सहित पूरे विश्व में गुजरातियों को गौरव दिलाया है।

वैसे इस गीत का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, परंतु इस गीत में गुजरातियों को जो ले’री (शुद्ध गुजराती में लहेरी) यानी लहरी लाला कहा गया है, जिसका अर्थ है कि गुजरात के लोग हमेशा मौज़ में रहते हैं, बिंदास्त होते हैं, निश्चिंत होते हैं। आज इस गीत के इस लहरी लाला शब्द का उपयोग इसलिए करना पड़ा, क्योंकि गुजरातियों ने मंगलवार को लोकसभा चुनाव 2019 के तीसरे चरण में 26 सीटों के लिए मतदान करने में वास्तव में लहेरी लाला होने का प्रमाण दिया और लगभग 52 वर्ष पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। यद्यपि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, परंतु 63.73 प्रतिशत मतदान के प्राथमिक आँकड़े जो संकेत दे रहे हैं, उससे यही लगता है कि गुजरात में इस बार मतदान का प्रतिशत 64 तक पहुँच ही जाएगा और यदि ऐसा हुआ, तो 1967 में हुए सर्वाधिक 63.77 प्रतिशत मतदान का 52 वर्ष पुराना रिकॉर्ड ध्वस्त हो जाएगा। अब यह शांत पानी में उठे तूफ़ान जैसे इस भारी मतदान से किसे मिला वोट और किस पर हुई चोट ? इसका उत्तर तो 23 मई को ही मिलेगा, परंतु हम आपको 23 मई से पहले गुजरातियों की लोकसभा चुनावों के दौरान मानसिकता के आधार पर परिणाम का संकेत बताने का प्रयास कर रहे हैं।

गुजरातियों ने पहले ही बांध ली थी गाँठ ?

अब प्रश्न यह उठता है कि 1977 की इंदिरा विरोधी लहर, 1980 की इंदिरा के प्रति लहर, 1989 की राजीव विरोधी लहर और हिन्दुत्व की लहर और 2014 की मोदी लहर में भी मतदान का 1967 का रिकॉर्ड नहीं तोड़ने वाले गुजराती लहेरी लालाओं ने इस बार भीषण तपन के बीच मतदान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा क्यों लिया ? मतदान से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सहित अनेक राष्ट्रीय व क्षेत्रीय नेताओं ने जगह-जगह तूफानी प्रचार किया, परंतु अन्य राज्यों की तुलना में गुजरात की चुनावी सभाओं में लोगों की भीड़ बहुत कम देखने को मिली। इसका अर्थ यह है कि चुनाव प्रचार का मतदाताओं पर बहुत व्यापक प्रभाव नहीं हुआ होगा। तो क्या गुजरात के मतदाताओं ने चुनाव की घोषणा के बाद और मतदान से पहले ही यह गाँठ बांध ली थी कि वे किसे मत देने वाले हैं ?

गुजरातियों ने ‘ठंडे कलेजे’ से किसका किया ‘क़त्ल’ ?

प्रश्न यह भी उठता है कि जब गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान कहीं कोई लहर नहीं दिखाई दे रही थी, तो गुजरातियों ने भारी संख्या में मतदान करके ठंडे कलेजे से किसका क़त्ल किया है ? भारी मतदान से प्राय: भाजपा को लाभ होता है, परंतु ऐसा आवश्यक नहीं है, तो कांग्रेस के लिए भी ख़ुश होने वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि गुजरात का चुनावी इतिहास यह भी नहीं कहता कि अधिक मतदान हमेशा सत्ता विरोधी होता है। चुनाव प्रचार और अख़बारों और न्यूज़ चैनलों पर छाए मुद्दों के बीच गुजराती मतदाताओं ने क्या स्थानीय मुद्दों पर वोट किया ? यदि ऐसा हुआ है, तो भी यह कयास लगाना मुश्किल है कि लोगों ने मुहर कांग्रेस पर ही लगाई हो, क्योंकि लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले यानी पाँच वर्षों के दौरान मोदी सरकार ने गुजरात के लिए नर्मदा बांध को स्वीकृति से पूर्ण कराने तक, बुलेट ट्रेन और स्टैच्यू ऑफ युनिटी, आयुष्मान भारत, किसान सम्मान निधि जैसे कई महत्वपूर्ण कार्य किए। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि गुजरात में केन्द्र की मोदी सरकार के विरुद्ध कोई लहर थी। दूसरी तरफ अधिक मतदान मोदी और भाजपा के पक्ष में होने की संभावना इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि गुजरात की नसों में हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद सबसे ऊपर रहा है। जब गुजरात सहित पूरे देश में मोदी के विरुद्ध अभियान चल रहा था, तब गुजरात में भी भाजपा का जनाधार खिसकता नजर आ रहा था, परंतु एयर स्ट्राइक ने गुजरात सहित पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ा दी। इस चुनाव में हिन्दुत्व तो बड़ा मुद्दा नहीं था, परंतु भाजपा ने राष्ट्रवाद का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। संभव है कि गुजरातियों ने यह समझ कर भाजपा के पक्ष में ही मतदान किया हो कि देश मोदी के हाथों में ही सुरक्षित है।

2017 बनाम 2019 : कांग्रेस के लिए क्यों खतरे की घंटी ?

लोकसभा चुनाव 2014 में सभी 26 सीटें जीतने वाली भाजपा ने विधानसभावार आकलन कर गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में 150+ सीटों का लक्ष्य रखा था, परंतु मोदी-शाह और भाजपा के लक्ष्य पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की आक्रामकता और गुजरात में नरेन्द्र मोदी की अनुपस्थिति के चलते पानी फिर गया। गुजरातियों ने 2017 में भाजपा को 99 सीटों पर समेट दिया। ऐसे में कांग्रेस ने भी वही भूल की, जो भाजपा ने की थी। कांग्रेस ने भी 2017 के विधानसभा चुनाव परिणामों का लोकसभावार आकलन कर कम से कम 7 सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया, परंतु कांग्रेस यह बात भूल गई कि 2017 और 2019 के चुनावों में जमीन-आसमान का फ़र्क था। 2017 में जहाँ राहुल गांधी को केवल गुजरात में ही प्रचार करना था, वहीं तीन बड़े समुदायों का नेतृत्व करने वाले पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर और दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने मोदी-शाह-भाजपा के विरुद्ध माहौल बनाया था। कांग्रेस यदि 2017 में अच्छा प्रदर्शन कर सकी, तो उसके पीछे राहुल की मेहनत के साथ-साथ इन तीन युवा नेताओं की तिकड़ी की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी, परंतु 2019 में तसवीर पूरी तरह बदल चुकी थी। एक समय लाखों पाटीदारों के लिए आदर्श बन कर उभरे हार्दिक पटेल ने कांग्रेस जॉइन कर उन्हीं पाटीदारों के कई धड़ों की नाराज़गी मोल ले ली थी, तो दूसरी तरफ अल्पेश ठाकोर प्रचार से पहले ही कांग्रेस से किनारा कर चुके थे। रही बात जिग्नेश की, तो उन्होंने 2017 में कांग्रेस का परोक्ष रूप से साथ तो दिया, परंतु कांग्रेस में शामिल नहीं हुए। निर्दलीय विधायक के रूप में जीते मेवाणी 2019 में गुजरात में कहीं भी चुनाव प्रचार के दौरान नज़र नहीं आए, जो कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हो सकता था। मेवाणी तो गुजरात के चुनावी अभियान से दूर बिहार के बेगूसराय में कन्हैया कुमार के चुनाव प्रचार में लगे रहे। इन सब परिस्थितियों के बावजूद कांग्रेस यदि यह अनुमान लगाए कि गुजरात का वोटिंग ट्रेंड 2017 वाला रहा होगा, तो यह उसकी भूल होगी, क्योंकि 2017 में राहुल और युवा नेताओं की तिकड़ी ने गुजरात में जो मोदी-विरोधी माहौल बनाया था, वैसा कोई माहौल 2019 में दिखाई नहीं दिया।

‘फिर एक बार मोदी सरकार’ या राहुल को दरकार ?

गुजरात में भारी मतदान के बाद भाजपा उत्साहित है। उसने फिर एक बार सभी 26 सीटें जीतने का दावा किया है। दूसरी तरफ कांग्रेस भी 26 सीटें जीतने का दावा करने का साहस तो नहीं जुटा पा रही, परंतु उसका सेंध लगाने का लक्ष्य अवश्य है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि गुजरात के मतदाताओं ने राष्ट्रवाद के नाम पर वोट दिया या मोदी के काम पर या राहुल के NYAY सहित वायदों पर मुहर लगाई ? जहाँ तक गुजरात में लोकसभा चुनावों के इतिहास का प्रश्न है, तो गुजरातियों ने 1962 से 1984 तक राष्ट्रीय मुद्दों, राष्ट्रीय राजनीति और राष्ट्रीय नेताओं के नाम पर ही वोट दिया, न कि स्थानीय मुद्दों पर। यही कारण है कि जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, पुनः इंदिरा गांधी और उनके पुत्र राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने में गुजरात की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1989 से 2014 तक के चुनावों में भी गुजराती मतदाताओं ने हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय मुद्दों, राष्ट्रीय नेताओं के नाम पर वोट दिया। इस प्रकार गुजरात ने वी. पी. सिंह, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2019 की बात करें, तो गुजरात में मोदी के विरोध में न तो 2017 जैसी कोई लहर नहीं थी, न ही कांग्रेस, राहुल गांधी या हार्दिक पटेल 2017 जैसा कोई माहौल बनाने में सफल रहे। निष्कर्ष यही निकलता है कि गुजरात के लोगों ने ‘फिर एक बार मोदी सरकार’ पर ही मुहर लगाई होगी।

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