‘सारंगी’ आगमन और ‘नरसिंही’ नगर भ्रमण : स्वप्न से हुआ सूत्रपात और पूरी हुई ‘पुरी वाले’ की इच्छा

* अहमदाबाद में 2 जुलाई, 1878 को निकली थी प्रथम जगन्नाथ रथयात्रा

* आगामी 4 जुलाई को निकलेगी ऐतिहासिक 142वीं जगन्नाथ रथयात्रा

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 26 जून, 2019 (YuvaPress.com)। अहमदाबाद तैयारियों में जुट गया है अपने सबसे बड़े नगरोत्सव की। आधुनिक युग की आपाधापी के बावजूद पुराने अहमदाबाद में जमालपुर क्षेत्र स्थित 460 वर्षों से अधिक पुराना और वर्तमान में आधुनिक रूप से चुका जगन्नाथ मंदिर सज-धज गया है। मंदिर में चहुँओर भारी चहल-पहल है। महंत दिलीपदास महाराज से मिलने वालों का ताँता लगा हुआ है। मंदिर के मुख्य द्वार के बराबर सामने रथों का रंगरोगन कार्य चल रहा है। इन सब गतिविधियों के बीच आपको यह भी जान कर आश्चर्य होगा कि मंदिर में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई दाऊ बलराम तथा बहन सुभद्रा तीनों नहीं हैं। उनकी अनुपस्थिति के बावजूद मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है।

वास्तव में अहमदाबाद और जगन्नाथ मंदिर में यह तैयारियाँ चल रही हैं 142वीं जगन्नाथ रथयात्रा की, जो आगामी अषाढ़ी दूज यानी 4 जुलाई, 2019 गुरुवार को निकलने वाली है। रथयात्रा के माध्यम से भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन सहित समूचे नगरवासियों को स्वयं दर्शन देने के लिए नगर भ्रमण को निकलते हैं। अहमदाबाद में प्रथम जगन्नाथ रथयात्रा वर्ष 1878 में अषाढ़ी दूज को निकली थी। 2 जुलाई, 1878 को आरंभ प्रथम रथयात्रा से आरंभ हुआ जगन्नाथ का नगर भ्रमण का सिलसिला पिछले 141 वर्षों से जारी है और अब आगामी 4 जुलाई को राजा रणछोड़ 142वीं बार अहमदाबाद नगर के लोगों को दर्शन देने के लिए उनके घर के दरवाजे तक पहुँचने वाले हैं।

जगन्नाथ बोले, ‘में स्वयं कर्णावती में बसना चाहता हूँ’

वर्तमान में अहमदाबाद में जो जगन्नाथ मंदिर है, वह 460 वर्ष पहले एक हनुमान मंदिर हुआ करता था। साबरमती तट पर रामानंदी सिद्ध संत हनुमानदास महाराज ने हनुमान मंदिर और आश्रम की स्थापना की थी। हनुमानदास महाराज के बाद उनके शिष्य सारंगदास महाराज इस हनुमान मंदिर और आश्रम के महंत बने। एक दिन सारंगदास महाराज ने शिष्यों के समक्ष इच्छा व्यक्त की, ‘साधु तो चलता भला। बहुत समय हो गया है। अब भारत भ्रमण की आज्ञा देंगे ?’ महंत सारंगदास के शिष्य नरसिंहदास ने विनम्र स्वर में कहा कि वे भी उनके साथ यात्रा में जुड़ना चाहते हैं, परंतु महंत सारंगदास ने इसकी आज्ञा न देते हुए महंत नरसिंहदास को मंदिर-आश्रम का उत्तरदायित्व सौंपा और रवाना हो गए। तत्कालीन अखंड भारत का भ्रमण करते हुए सारंगदास महाराज एक दिन आध्यात्मिक शक्ति के स्वामी भगवान जगन्नाथ के दर्शन की अभिलाषा से उनकी नगरी जगन्नाथ पुरी पहुँच गए। सारंगदास ने पुरी में भगवान और उनके भाई-बहन के प्रेम की त्रिवेणी संगम की अद्भुत अनुभूति की और उनकी भक्ति में लीन रहने लगे। एक सुबह सारंगदास भगवान जगन्नाथ की भक्ति में ध्यानमग्न थे, तभी उनके कानों में प्रभु वाणी पड़ी, ‘सारंगदास, तेरे भक्तिभाव से मैं अत्यंत प्रन्न हूँ। तेरी यहाँ की साधना पूर्ण हुई। तू अब अपनी कर्मभूमि लौट जा।’ प्रत्युत्तर में सारंगदास बोले, ‘प्रभु आपको छोड़ कर मैं अब कहीं नहीं जा सकता। अब तो पुरी ही मेरी कर्मभूमि है। मुझे कोई सिद्धि नहीं चाहिए। मुझे यहाँ से मत निकालिए।’ जगन्नाथ बोले, ‘मैं तुझे निकाल नहीं रहा, परंतु तेरी कर्मभूमि तेरी प्तीक्षा कर रही है। यहाँ से अधिक वहाँ तेरी आवश्यकता है।’ सारंगदास ने कहा, ‘परंतु आपके बिना ?’ भगवान जगदीश ने कहा, ‘अरे, मेरी स्वयं की ही इच्छा है कर्णावती की पुण्यभूमि में बसने की। वहाँ हजारों दीन-दु:खी नि:सहाय बन कर यातनाएँ भुगत रहे हैं। वहाँ जाकर उनके आँसू पोंछने हैं। मेरा सेवक हनुमान तो वहाँ साक्षात् है ही। अब मैं भी भाई-बहनों के साथ कर्णावती में हनुमान मंदिर में विराजित होना चाहता हूँ। तू इसी समय कर्णावती के लिए प्रयाण।’ दिव्य वाणी समाप्त होते ही पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की प्रतिमा के मुख का तेज ओझल हो गया। आनंदविभोर सारंगदास उसी क्षण अहमदाबाद स्थित हनुमान मंदिर लौट आए।

और हनुमान मंदिर बन गया जगन्नाथ मंदिर

सारंगदास के लौटते ही महंत नरसिंहदास सहित सभी शिष्य आनंद से उल्लासित हो उठे। सारंगदास ने भगवान जगन्नाथ की इच्छा शिष्यों के समक्ष प्रकट की। योग्य मुहूर्त में जगन्नाथ मंदिर की आधार शिला रखी गई। मंदिर निर्माण का कार्य तेजी से शुरू हुआ। इस बीच भगवान जगन्नाथ, दाऊ बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियाँ पूर्वाचल-जगन्नाथ पुरी में तैयार करके मंगवाई गई। विद्वान पुरोहितों और पुजारियों को पुरी से ही बुला कर अहमदाबाद में अषाढ़ी सुद एकम को तीनों दिव्य मूर्तियों की स्थापना की गई। उस दिन मानो कर्णावती नगरी में नए प्राणों का संचार हुआ।

‘वत्स नरसिंह, मैं कर्णावती के लोगों को दर्शन देना चाहता हूँ’

सारंगदास के लौटने के बाद उन्हें पुन: महंत बना दिया गया। महंत सारंगदास के बाद बालमुकुंददास महंत बने और उनके बाद नरसिंहदास महाराज को महंत बनाया गया। वर्ष 1878 में अषाढ़ी दूज से कुछ दिन पहले एक सुबह महंत नरसिंहदास महाराज ने सभी शिष्यों को इकट्ठा किया और कहा, ‘कल रात भगवान जगन्नाथ मेरे स्वप्न में आए और बोले कि वत्स नरसिंह। तेरी और सारंगदास की इच्छा से मैं पुरी से यहाँ तो आ गया, परंतु पुरी में तो मैं वर्ष में एक बार भक्तों को दर्शन देने परिक्रमा के लिए निकलता हूँ। पुरी की तरह यहाँ भी मैं कर्णावती नगरी के लोगों को दर्शन देना चाहता हूँ।’ नरसिंहदास महाराज के इस स्वप्न को सुन कर शिष्यों और भक्तों में हर्षोल्लास छा गया और घोषणा कर दी गई कि आगामी अषाढ़ी दूज को कर्णावती नगरी में भी भगवान बड़े भाई और बहन समेत नगर परिक्रमा को निकलेंगे। इस तरह महंत नरसिंहदास को आए स्वप्न से अहमदाबाद में जगन्नाथ रथयात्रा का सूत्रपात हुआ, जो निरंतर इतिहास रचता चला जा रहा है। अहमदाबाद में पहली रथयात्रा 2 जुलाई, 1878 को निकली थी और अब 142वीं रथयात्रा निकलने वाली है।

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