पंडित पीटेंगे सिर-मोदी आएँगे फिर : पढ़िए सभी 36 राज्यों का चुनावी गणित, आप खुद कहेंगे, ‘अबकी बार-भाजपा 300 के पार’

सूक्ष्म विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहदाबाद, 16 मई, 2019। इस ख़बर की डेटलाइन में तारीख पढ़ कर आपको कुछ याद आ रहा है ? अगर नहीं, तो हम याद कराए देते हैं। 16 मई भारतीय लोकतंत्र और चुनावी इतिहास में पाँच साल पहले सदैव के लिए स्वर्ण अक्षरों से अंकित हो गई, जब देश ने पूरे 30 वर्षों के बाद स्पष्ट बहुमत वाली सरकार चुनी थी।

जी हाँ। हम बात कर रहे हैं 16 मई, 2014 की। पिछले लोकसभा चुनाव 2014 का चुनाव परिणाम इसी 16 मई, 2014 को यानी आज से ठीक पाँच वर्ष पहले घोषित हुआ था और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP) ने 282 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के पक्ष में पूरे देश में चल रही लहर 16 मई, 2014 को सबके सामने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के जरिए बाहर आई। 16 मई, 2014 को देश की जनता ने 1984 के बाद यानी पूरे 30 वर्ष बाद किसी एक दल को पूर्ण बहुमत दिया था।

अब प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या 2014 के गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी 2019 में प्रधानमंत्री के रूप में पाँच साल 7 दिन बाद यानी आगामी 23 मई, 2019 को 2014 वाला इतिहास दोहरा पाएँगे ? या फिर देश फिर एक बार 1984-2014 के तीन दशकों में रही राजनीतिक अस्थिरता के दौर में चला जाएगा ? यद्यपि भाजपा-एनडीए और अमित शाह, नरेन्द्र मोदी सहित तमाम बड़े नेता पूरे आत्म-विश्वास के साथ दावा कर रहे हैं कि 23 मई को देश की जनता भाजपा-एनडीए को 2014 से बड़ा आशीर्वाद देने वाली है। भाजपा के इस आत्म-विश्वास के पीछे जहाँ एक ओर मोदी की जादुई लोकप्रियता, मोदी सरकार के कार्य और भाजपा संगठन हैं, वहीं विपक्षी खेमे का अंतर्विरोध भी भाजपा को फायदा पहुँचाएगा, ऐसी उम्मीद भाजपा लगाए बैठी है। भाजपा ने यह आत्म-विश्वास और यह आशा यूँ ही नहीं लगाई है। इसका आधार एक-एक राज्य की एक-एक सीट के लिए भाजपा की ओर से अपनाई गई सूक्ष्म, घातक, मारक और विजयी रणनीति है। आइए आपको बताते हैं देश के 29 राज्यों व 7 केन्द्र शासित प्रदेशों यानी सभी 36 राज्यों का चुनावी गणित, जिसे पढ़ने के बाद आप स्वयं कह उठेंगे, ‘अबकी बार-भाजपा 300 के पार’।

पश्चिम बंगाल देगा बोनस

अपने मजबूत दृढ़ विश्वास के धनी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी हर चरण के मतदान के बाद भाजपा को मिलने वाली सीटों की संख्या बढ़ाते जा रहे हैं और मोदी ने अंतिम चरण में 19 मई को होने वाले मतदान से पहले जो ताजा पूर्वानुमान लगाया है, उसके मुताबिक लोकसभा चुनाव 2019 में छह चरणों के मतदान बाद भाजपा अकेले 300 सीटें जीत चुकी है और मोदी बंगाल से बोनस मिलने को लेकर आश्वस्त हैं। मोदी ने कल ही पश्चिम बंगाल के बसीरहाट में चुनाव रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि भाजपा की 300 सीटें तय हैं और पश्चिम बंगाल भाजपा के इस 300 सीटों के आँकड़े को आगे बढ़ाएगा। मोदी का आकलन इसलिए भी सही लगता है, क्योंकि भाजपा का जनाधार बंगाल में पिछले 3 वर्षों से लगातार बढा है। इसी कारण ममता बैनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) बौखलाई हुई हैं। ममता को ज़मीन खिसकती नज़र आ रही है। वामपंथियों और ममता-टीएमसी-कांग्रेस विरोधी पूरा जनाधार भाजपा की ओर खिसक रहा है, जिससे 23 मई को बंगाल के परिणाम सबसे चौंकाने वाले हो सकते हैं। यदि बंगाल में ‘चुपेचाप-कमल छाप’ का नारा चल रहा है, तो सीधा मतलब है कि मतदाता भाजपा को बोनस के रूप में 2014 की 2 सीटों के मुकाबले 2019 में 20 से 30 सीटें भी दे सकते हैं। 2014 में मोदी लहर के बावजूद पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने 42 में से 37 सीटें जीती थीं, तो कांग्रेस को 4 और सीपीएम को 2 सीटें मिली थीं। 2019 में पिछले तीन वर्षों से मोदी विरोधी टोली का हिस्सा बने रहे कांग्रेस-राहुल, टीएमसी-ममता और सीपीएम-सीताराम येचुरी बंगाल की चुनावी ज़मीन पर एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ कर भाजपा को अलग-अलग चुनौती दे रहे हैं। एक तरफ बढ़ता जनाधार और दूसरी तरफ विरोधी मतों में बँटवारा भाजपा को बंगाल में अवश्य बोनस सीटें दिलाएगा।

ओडिशा निभाएगा यारी

यहाँ लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हो रहे हैं। भाजपा ओडिशा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल (बीजद-BJD) नेता व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के विरुद्ध चुनाव मैदान में हैं। नरेन्द्र मोदी ने भी पश्चिम बंगाल में ताबड़तोल रैलियाँ की हैं और नवीन सरकार पर प्रहार किए हैं। यद्यपि नवीन-नरेन्द्र की दलगत राजनीति से परे जो यारी है, वह सभी मोदी विरोधियों कों चौंकाती है। ओडिशा में भी भाजपा ने पैर जमाने के लिए पूरा जोर लगा दिया है। इतना ही नहीं, भाजपा ने 23 मई के बाद जरूरत पैदा हुई, तो नवीन-बीजेडी से यारी के दरवाजे भी खुले रहें, इस बात का चुनाव प्रचार अभियान में पूरा ध्यान रखा। जहाँ तक 2014 की बात है, तो भाजपा ने पहली बार यहाँ मोदी लहर के दम पर 1 सीट के साथ खाता खोला था, जबकि बीजेडी 20 सीटें जीतने में सफल रही थी। भाजपा को 21.9 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 26.4. प्रतिशत वोट हासिल करके भी कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। 2019 में भाजपा की शक्ति बढ़ी है, जिसके चलते बीजेडी के विरुद्ध भाजपा मुख्य चुनौती के रूप में उभरी है। सभी 21 सीटों पर बीजेडी-भाजपा-कांग्रेस में त्रिकोणीय मुकाबला है और स्पष्ट है सत्ता विरोधी मतों का बँटवारा होगा और इसका सीधा फायदा बीजेडी को मिलेगा, परंतु बीजेडी की राह बहुत कुछ भाजपा से मिलती है।

त्रिपुरा में फिर तांडव

भाजपा ने इस राज्य में पहली बार वामपंथियों का किला ढहा कर सत्ता हासिल की है। ऐसे में भाजपा को आशा है कि वह त्रिपुरा की 2 सीटें गत विजेता सीपीएम से छीनने में सफल रहेगी।

केरल

वामपंथियों के गढ़ केरल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभाओं में लोगों की भारी भीड़ यदि मतों में बदलती है, तो यहाँ से भी कुछ सीटें निकाल लाने में भाजपा को अवश्य सफलता मिल सकती है। 2014 में भाजपा का यहाँ खाता नहीं खुला था। 20 सीटों में से कांग्रेस को 8, सीपीएम को 5, आईयूएमएल को 2, निर्दलीय व अन्य को 2-2 और आरएसपी को 1 सीट मिली थी। यद्यपि भाजपा को 10.5 प्रतिशत मत हासिल हुए थे। यदि मोदी की सभाओं में उमड़ी भीड़ ने मतदान भी भाजपा के पक्ष में किया, तो केरल से भाजपा को 1 से 2 सीटें अवश्य मिल सकती हैं।

लक्षद्वीप बदलेगा लक्ष्य ?

इस केन्द्र शासित प्रदेश में 1 सीट है, जिस पर 2014 में कांग्रेस का कबजा था। यहाँ भाजपा को केवल 0.4 प्रतिशत मत मिले थे। ऐसे में इस राज्य से भाजपा को कोई चमत्कार ही एकमात्र सीट दिलवा सकता है।

तमिलनाडु पर जया-करुणा का साया

तमिलनाडु में भाजपा और एआईएडीएमके का गठबंधन पूरी तरह नरेन्द्र मोदी के भरोसे हैं। एआईएडीएमके के पास अब जयललिता जैसी नेता नहीं हैं, तो भाजपा का अपना जनाधार है नहीं। ऐसे में मोदी के चेहरे के नाम पर यहाँ भाजपा और एआईएडीएमके कांग्रेस-डीएमके गठबंधन को टक्कर दे रही हैं। डीएमके भी एम. करुणानिधि की कमी से जूझ रहा है। वह राहुल गांधी के सहारे है। कुल मिला कर तमिलनाडु में परोक्ष मुकाबला भाजपा-कांग्रेस के बीच ही है, जिसमें लोकप्रियता के मामले में मोदी का जादू काम कर गया, तो यहाँ से एनडीए की सीटों में अच्छी-खासी बढ़ोत्तरी होने की संभावना है। 2014 में जयललिता के नेतृत्व में एआईएडीएमके ने अकेले दम पर 39 में से 37 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को और पीएके को 1-1 सीट मिली थी। 2019 में जो डीएमके कांग्रेस के साथ मिल कर एआईएडीएमके-भाजपा को टक्कर दे रही है, उस डीएमके का 2014 में खाता भी नहीं खुला था। ऐसे में 2019 में जयललिता की अनुपस्थिति का बहुत ज्यादा असर न पड़े और मोदी के नेतृत्व पर लोगों का विश्वास बढ़ा होगा, तो निश्चित रूप से एआईएडीएमके भाजपा के साथ मिल कर 2014 की तरह पुनः 37 या उससे अधिक सीटें हासिल कर सकती है, जिससे एनडीए का संख्या बल बढ़ेगा।

आंध्र प्रदेश-तेलंगाना में हो सकता है फायदा

लोकसभा चुनाव 2014 के समय ये दोनों एक ही राज्य थे आंध्र प्रदेश। बाद में आंध्र प्रदेश में से तेलंगाना का गठन हुआ। 2019 में आंध्र प्रदेश में जहाँ चंद्रबाबू नायडू TDP, राहुल की कांग्रेस और जगन मोहन रेड्डी की वायएसआर कांग्रेस और भाजपा के बीच पंचकोणीय मुकाबला है, तो तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव की TRS, TDP, YSR CONGRESS PARTY, कांग्रेस और भाजपा के बीच ,छह कोणीय मुकाबला है। आंध्र प्रदेश में भाजपा ने मोदी लहर के दम पर 2014 में 2 सीटें जीती थीं, जबकि टीडीपी को 15 और वायएसआर कांग्रेस को 8 सीटें मिली थीं यहाँ भाजपा ने पंचकोणीय मुकाबले का फायदा उठा कर अपनी सीटों का आँकड़ा 2 से आगे बढ़ाने के लिए दम लगाया। एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि आंध्र प्रदेश में टीडीपी-कांग्रेस भले ही मोदी विरोधी हों, परंतु वायएसआर कांग्रेस-जगन मोहन रेड्डी भाजपा के साथ आ सकते हैं। भाजपा दोनों राज्यों की सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है। दूसरी तरफ तेलंगाना में 2014 में टीआरएस ने 11 और कांग्रेस ने 2 सीटें जीती थीं, जबकि टीडीपी, भाजपा, वायएसआर कांग्रेस व अन्य को 1-1 सीट मिली थी। यहाँ भी भाजपा बहुकोणीय मुकाबले के बीच अपनी सीटों की संख्या बढ़ा सकती है। कुल मिला कर दोनों राज्यों में बहुकोणीय मुकाबलों में मोदी लहर थोड़ी भी काम कर गई, तो भाजपा 2014 में दोनों राज्यों मिली कुल 3 सीटों के आँकड़े को 5 से 7 तक पहुँचा सकती है और इसके लिए पार्टी ने पूरी रणनीति के साथ काम किया है।मिल सकती है।

कर्नाटक निकालेगा कसक

कर्नाटक के लोगों में विधानसभा चुनाव 2018 में भाजपा को पूर्ण बहुमत न दे पाने की कसक हो सकती है और मोदी की लोकप्रियता भी काम कर सकती है। वैसे 2014 में 28 में से 17 सीटें जीतने वाली भाजपा को 2019 में यही सफलता दोहरा पाने में कड़ी चुनौती मिल रही है कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन से। देखना यह होगा कि कर्नाटक के किले पर भाजपा अपना भगवा दोबारा कैसे लहराएगी।

पुड्डुचेरी में पलड़ा भारी

इस राज्य में 1 सीट है, जो एनडीए की सहयोगी एआईएनआरसी को मिली थी। भाजपा ने इस सीट को एनडीए के कबजे में बनाए रखने का पूरे प्रयास किए हैं।

उत्तर प्रदेश बिगाड़ेगा अवसरवादियों का खेल

सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश होने के बावजूद भाजपा की ज़ुबान पर भले उत्तर प्रदेश का नाम कम आ रहा हो, परंतु ज़मीन पर भाजपा ने सपा-बसपा-आरएलडी गठबंधन को काँटे की टक्कर देने के लिए पूरे इंतज़ाम कर रखे हैं। नरेन्द्र मोदी की मानें, तो उन सारे चुनावी पंडितों के ये विश्लेषण और दावे कि सपा-बसपा-आरएलडी के साथ आने से भाजपा को नुकसान होगा, 23 मई को ध्वस्त हो जाएँगे, जब भाजपा यूपी में 2014 से भी अधिक सीटें हासिल करेंगी। मोदी का गणित तो यह कहता है कि यूपी दिल खोल कर भाजपा को वोट देगा। मोदी का गणित चुनावी ज़मीन पर इसलिए साकार होता दिखाई दे रहा है, क्योंकि मोदी विरोध की राजनीति करने वाले एकजुट नहीं रह सके। 2014 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 71 और सहयोगी अपना दल ने 2 सीटें जीती थीं, जबकि सपा (5) और कांग्रेस (2) केवल अपनी परम्परागत पारिवारिक सीटें ही बचा पाई थीं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में भी भाजपा और मोदी का जादू छाया रहा, जिससे मोदी विरोधी दलों लामबंदी शुरू की। दिल्ली में कांग्रेस-राहुल के नेतृत्व में की गई मोदी विरोधी लामबंदी लखनऊ में बिखर गई। यूपी में मोदी को रोकने के लिए अखिलेश-मायावती-अजित सिंह ने सपा-बसपा-आरएलडी गठबंधन कर लिया, पर कांग्रेस को बाहर रखा। कांग्रेस ने पलटवार करते हुए प्रियंका गांधी वाड्रा को उतार दिया और सभी सीटों पर लड़ने का ऐलान किया। इसके चलते उत्तर प्रदेश में अधिकांश सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो गया। स्वाभाविक है कि मोदी विरोधी मत गठबंधन और कांग्रेस के बीच बँटेंगे और फायदा भाजपा को ही होगा। ऐसे में मोदी और सभी भाजपा नेता यह दावा कर रहे हैं कि भाजपा 2014 से अधिक सीटें जीतेगी, तो यह असंभव भी नहीं है।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ नहीं दोहराएँगे भूल ?

2014 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मोदी लहर लोगों के सिर पर सवार थी, परंतु विधानसभा चुनाव 2018 में तीनों राज्य भाजपा के हाथ से निकल गए, परंतु भाजपा को आशा है कि इन राज्यों के मतदाता विधानसभा और लोकसभा चुनाव के लिए अलग-अलग मानसिकता के साथ मतदान करेंगे और मोदी के नेतृत्व पर ही विश्वास व्यक्त करते हुए 2014 से अधिक सीटें दिलाएँगे। मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में जहाँ कांग्रेस को किसानों की कर्ज़ माफी का मुद्दा परेशान कर रहा है, वहीं भाजपा का राष्ट्रवाद का मुद्दा भारी पड़ सकता है। ऐसे में भाजपा ने 2014 में मध्य प्रदेश में मिली 29 में 27, राजस्थान में मिली सभी 25 और छत्तीसगढ़ में मिली 11 में से 10 सीटें 2019 में दोबारा हासिल करने के लिए हर समीकरण को साधा है।

उत्तराखंड उतारेगा आरती

2014 में उत्तराखंड में कांग्रेस की हरीश रावत सरकार थी, परंतु मोदी लहर पर सवार मतदाताओं ने सभी 5 सीटें भाजपा को दीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में राज्य से कांग्रेस की सरकार को हटा कर लोगों ने भाजपा को सत्ता सौंपी। ऐसे में उत्तराखंड में भाजपा के साथ सीधे मुकाबले में उतरी कांग्रेस को कोई फायदा नहीं होने जा रहा है और भाजपा पुनः 5 सीटों पर कब्जा बनाए रखने में सफल रह सकती है।

बिहार बनाएगा इतिहास

यह महत्वपूर्ण राज्य 2014 से 2019 के बीच कई करवटें ले चुका हैं। 2014 में जहाँ बिहार में भाजपा-जेडीयू 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ कर अलग-अलग चुनाव मैदान में थे और मोदी लहर बिहारियों के सिर चढ़ कर बोली थी। 2014 में भाजपा ने बिहार की 40 में से 22 सीटें जीत कर भाजपा ने जेडीयू को 2 सीटों पर समेट दिया था, तो भाजपा की सहयोगी एलजेपी 6 सीटें जीतने में सफल रही थी। विरोधी आरजेडी 4, बीएलएसपी 3, कांग्रेस 3 और अन्य 4 सीटें जीत सके थे। विधानसभा चुनाव 2015 में नीतिश कुमार के जेडीयू ने लालू के आरजेडी से गठबंधन किया और मतदाताओं ने भाजपा को पटखनी दी, परंतु 2019 में राजनीतिक माहौल 2014 से अलग है। इस बार नीतिश-जेडीयू भाजपा के साथ है और भाजपा-जेडीयू-एलजेपी गठबंधन का मुकाबला कांग्रेस-आरएलडी से है। ऐसे में बिहार में एनडीए को 2014 में मिलीं कुल 28 सीटों की संख्या बढ़ाने में जेडीयू का साथ कितना काम आएगा, यह देखने वाली बात होगी।

झारखंड से झड़ेंगे फूल

झारखंड में पिछली बार भाजपा ने 14 में से 12 सीटें जीती थीं, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) 2 ही सीट हासिल कर सका था। इस बार भाजपा के समक्ष कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन की चुनौती है। देखना यह होगा कि गठबंधन का मोदी विरोधी गणित भाजपा के भूगोल पर भारी पड़ता है या भाजपा सभी 14 सीटों पर जीत का परचम लहराती है ?

गुजरात फिर देगा मोदी का साथ

2014 में मोदी लहर में सभी 26 सीटें हासिल करने वाली भाजपा का जनाधार विधानसभा चुनाव 2017 में जनाधार घटा था और उसके पीछे कांग्रेस की साथी रही मोदी विरोधी त्रिपुटी थी, परंतु 2019 में यह टोली गुजरात में बहुत अधिक असर नहीं छोड़ पाई। टोली के एक नेता हार्दिक पटेल कांग्रेस में शामिल होकर भी चुनाव न लड़ सके, दूसरे नेता अल्पेश ठाकोर ने मतदान से पहले ही कांग्रेस से किनारा कर लिया और निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी ने गुजरात से बाहर बेगूसराय में वामपंथी उम्मीदवार कन्हैया कुमार के लिए प्रचार किया। इस टोली की निष्क्रियता तथा मोदी सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और मजबूत नेतृत्व का असर गुजरात पर हावी रहे, जिसका फायदा भाजपा को अवश्य मिलेगा। कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि भाजपा 2019 में भी सभी 26 सीटें जीत ले, क्योंकि गुजरात ने 2019 में अब तक के तमाम रिकॉर्ड तोड़ कर सर्वाधिक 64.11 प्रतिशत मतदान किया है।

महाराष्ट्र में मजबूत हुआ गठबंधन

2014 में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने 48 में से 31 सीटें जीती थीं, परंतु बाद के तीन-चार वर्षों तक यह गठबंधन आपसी मनमुटाव में उलझा रहा, जिससे कांग्रेस-एनसीपी को फायदा हो सकता था, परंतु ऐन चुनाव से पहले भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने अपनी नाराजगियाँ दूर कर लीं और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की बढ़ती संभावनाओं पर ब्रेक लगाने में सफलता हासिल की। महाराष्ट्र की देवेन्द्र फडणवीस सरकार की भी अच्छी-खासी लोकप्रियता है और उस पर मोदी का जादू चलेगा, तो निश्चित रूप से महाराष्ट्र में भाजपा को 2014 जैसी सफलता मिल सकती है।

गोवा पर गुमान

गोवा में 2 सीटें हैं और 2014 में दोनों भाजपा के खाते में रही थीं। भाजपा को इस बार मनोहर पर्रिकर की कमी खली, परंतु इसके बावजूद मोदी के मजबूत नेतृत्व के चलते भाजपा फिर एक बार दोनों सीटें कब्जाने में सफल रहेगी।

दीव-दण और दादरा नगर हवेली में कमल का दबदबा

गुजरात से सटे केन्द्र शासित प्रदेश दीव-दमण और दादरा नगर हवेली में 1-1 सीटों पर 2014 में भाजपा का परचम लहराया था और इस बार भी कांग्रेस के मुकाबले भाजपामजबूत स्थिति में है।

अंडमान-निकोबार बढ़ाएँगे ताकत

भाजपा ने 1 सीट वाले केन्द्र शासित प्रदेश अंडमान-निकोबार में 2014 जीत का परचम लहराया था। हालाँकि जीत का मार्जिन 7,812 मतों का ही था। ऐसे में भाजपा ने इस 1 सीट के लिए भी भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है।

दिल्ली का दिल फिर मोदी के साथ

देश का दिल दिल्ली किसका साथ देगा ? 2014 में तो मोदी लहर पर सवार दिल्ली वासियों ने सभी 7 सीटों पर मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को मात देकर भाजपा की झोली भर दी थी, परंतु पाँच वर्षों में दिल्ली की राजनीतिक फिज़ा बदली है। 2014 में नई-नई पार्टी बनी अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) कोई कमाल न कर सकी, परंतु उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में AAP 70 में 28 सीटें जीत कर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि 32 सीटें पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी भाजपा ने सरकार नहीं बनाई। तब AAP ने कांग्रेस के समर्थन से केजरीवाल के नेतृत्व में पहली बार सरकार बनाई और कुछ ही समय बाद केजरीवाल ने त्यापगत्र भी दे दिया। फिर से विधानसभा चुनाव हुए और AAP का जादू दिल्ली वासियों पर छा गया। AAP ने 70 में से रिकॉर्ड 67 सीटें हासिल कीं, जबकि भाजपा 3 सीटों पर सिमट गई, तो कांग्रेस खाता भी नहीं खोल सकी। यह स्थिति 2014 में सभी 7 लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा के लिए चिंताजनक थी। दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी AAP के विरुद्ध मोर्चा खोला। यद्यपि 2019 के आते-आते कांग्रेस और AAP दोनों की विचारधारा मोदी विरोधी बन गई, परंतु फिर भी दोनों ने लोकसभा चुनाव साथ-साथ नहीं लड़ा और इसी कारण दिल्ली की सातों सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि त्रिकोणीय मुकाबले के कारण भाजपा-मोदी विरोधी मत कांग्रेस-AAP के बीच बँटेंगे और इसका फायदा भाजपा को होगा। इसके अलावा मोदी का नेतृत्व भी भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

हरियाणा हराएगा मोदी विरोधियों को

2014 में हरियाणा में कांग्रेस की सरकार थी, परंतु मोदी लहर के चलते कांग्रेस 10 में से 1 ही सीट जीत पाई, जबकि भाजपा को 7 सीटें हासिल हुईं और आईएनएलडी 2 सीटें जीत सकी। बाद में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 2014 की सफलता दोहराते हुए राज्य की सत्ता पर कब्जा किया। 2019 में हरियाणा में भाजपा के विरुद्ध बहुकोणीय मुकाबला है। एक तरफ कांग्रेस, दूसरी तरफ आईएनएलडी और तीसरी तरफ जेजेपी। मोदी की मजबूत छवि, भाजपा का मजबूत संगठन और मोदी विरोधी मतों का बँटवारा भाजपा की सीटें 7 से बढ़ा सकता है।

पंजाब पर असर करेगा सिख विरोधी दंगों का मुद्दा

2014 से 2019 के बीच पंजाब में राजनीतिक परिस्थिति में बदलाव आया है। 2014 में जहाँ एक तरफ पंजाब में भाजपा-शिरोमणि अकाली दल (SAD) गठबंधन की सरकार थी, वहीं मोदी लहर के बावजूद स्थानीय सत्ता विरोधी लहर के कारण गठबंधन को 13 में से 6 ही सीटें मिली थीं। AAP को 4 और कांग्रेस को 3 सीटें मिली थीं। बाद में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा-अकाली सरकार विरोधी लहर चली और कांग्रेस सत्ता में आ गई। ऐसे में कांग्रेस को आशा थी कि 2019 में भी भाजपा-अकाली विरोधी लहर का फायदा मिलेगा, परंतु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की घातक रणनीति, राजीव गांधी, सिख विरोधी दंगे जैसे मुद्दों ने पंजाब के सिखों में फिर एक बार कांग्रेस के विरुद्ध माहौल खड़ा किया है। इसके चलते पंजाब में भाजपा-अकाली गठबंधन की सीटों का आँकड़ा 6 से बढ़ सकता है।

चंडीगढ़ भी बेअसर नहीं

पंजाब और हरियाणा की राजधानी होने के कारण केन्द्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में दोनों राज्यों की राजनीति का असर स्पष्ट दिखाई देता है। 2014 में मोदी लहर के चलते भाजपा ने एकमात्र चंडीगढ़ सीट जीत ली थी। 2019 में सिख विरोधी दंगों के कारण कांग्रेस घिरी हुई है, जिससे चंडीगढ़ की एक सीट पुनः भाजपा के खाते में आना निश्चित लगता है।

हिमाचल प्रदेश का मोदी से पुराना नाता

हिमाचल प्रदेश में 2014 में कांग्रेस की सरकार थी, परंतु मोदी लहर में मतदाताओं ने कांग्रेस को पूरी तरह नकारते हुए सभी 4 सीटें भाजपा की झोली में डाली थीं। बाद में विधानसभा चुनाव में भी लोगों ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर भाजपा को सत्ता सौंपी। 2019 में भी भाजपा ने यहाँ 2014 जैसा प्रदर्शन दोहराने की पूरी कोशिश की है। वैसे हिमाचल प्रदेश का मोदी से पुराना नाता है। मोदी के प्रभारी रहते हुए ही भाजपा ने पहली बार हिमाचल प्रदेश में सरकार बनाई थी।

जम्मू-कश्मीर उखाड़ फेंकेगा जड़ें ?

भाजपा को इस बार इस राज्य से अधिक उम्मीदें हैं। 2014 में केवल जम्मू क्षेत्र में ही प्रभाव छोड़ सकी भाजपा ने 6 में से 3 सीटें जीती थीं, परंतु 2019 में यहाँ सभी छह सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला है। एक तरफ भाजपा है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस-NC गठबंधन व PDP है। यदि मोदी लहर, मोदी की कश्मीर नीति स्थानीय कश्मीरी समझ सकेंगे और साथ ही मोदी विरोधी मत कांग्रेस-एनसी तथा पीडीपी के बीच बँटेंगे, तो भाजपा की सीटें 3 से बढ़ भी सकती हैं।

पूर्वोत्तर का विकास जीत की गारंटी

असम

असम में लोकसभा की 14 सीटें हैं, जिनमें से 2014 में भाजपा ने 7, कांग्रेस और एआईयूडीएफ ने 303 और निर्दलीय ने 1 सीट जीती थी। यहाँ भाजपा को नागरिकता का मुद्दा परेशानी में डाल सकता है, परंतु राष्ट्रवाद के नाम पर भाजपा बहुकोणीय मुकाबले में अपनी सीटें 7 से बढ़ा सकती हैं।

अरुणाचल प्रदेश

अरुणाचल प्रदेश में दो सीटें हैं। 2014 में भाजपा और कांग्रेस को 1-1 सीटें मिली थीं, परंतु भाजपा का मत प्रतिशत 46.6 था, जो कांग्रेस को मिले 41.7 प्रतिशत मतों से अधिक था। भाजपा ने इस बार यहाँ दोनों सीटें जीतने का लक्ष्य बनाया है।

मणिपुर

2 सीटों वाले मणिपुर पर कांग्रेस का दबदबा रहा है। 2014 में मोदी लहर के बावजूद दोनों सीटें कांग्रेस ने जीती थी, जबकि भाजपा को केवल 12 प्रतिशत वोट ही मिले थे। वैसे पूर्वोत्तर में भाजपा के पैर पसारने की रणनीति के चलते आज राज्य में उसी का शासन है। इस पर मोदी सरकार की ओर से किए गए कार्यों के चलते मणिपुर में भाजपा के पक्ष में परिस्थितियाँ तेजी से बदली हैं। संभव है कि 2019 में मणिपुर की दोनों सीटें भाजपा की झोली में आ गिरें।

मेघालय

मेघालय में भी 2 सीटें हैं, जिनमें से एक सीट कांग्रेस और एक सीट एनपीईपी के पास है। 2014 में भाजपा को यहाँ केवल 9.2 प्रतिशत मत मिले थे, परंतु हाल में राज्य की सत्ता में भागीदार है। ऐसे में एनडीए का संख्या बल बढ़ाने में मणिपुर सहयोग कर सकता है।

मिज़ोरम

पूर्वोत्तर के इस राज्य में 1 सीट है और कांग्रेस का दबदबा है। दिसम्बर-2018 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ही जीत मिली। 2014 में यहाँ भाजपा चुनाव मैदान में ही नहीं थी, परंतु 2019 में एनडीए अवश्य चुनाव मैदान में है। ऐसे में संभव है कि एनडीए को यहाँ से 1 सीट मिल जाए।

नगालैण्ड

2014 में भी नगालैण्ड की 1 सीट एनडीए की सहयोगी एनपीएफ को मिली थी। भाजपा ने 2019 में भी मोदी सरकार के काम के आधार पर एनडीए के पास यह सीट बनाए रखने की पूरी कवायद की है।

सिक्किम

सिक्किम में एकमात्र सीट पर क्षेत्रीय दल एसडीएफ ने कब्जा किया था। भाजपा को केवल 2.4 प्रतिशत मत मिले थे, परंतु 2019 में भाजपा एनडीए के रूप में मैदान में है।

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