पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता खतरे में : अमेरिका ने किया ब्लैकलिस्ट

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 25 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। पड़ोसी इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को किस कदर यातनाएँ दी जा रही हैं और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर कितना बड़ा खतरा मँडरा रहा है ? इसका एक ताज़ा मामला सामने आया है। अमेरिका ने लगातार दूसरे साल पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट में डाल दिया। अमेरिका के इस कदम से पाकिस्तान बौखला गया है। क्योंकि अमेरिका की ओर से उठाया गया यह कदम पाकिस्तानी सरकार की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े करती है। अमेरिका के इस कदम से पूरे विश्व में यह संदेश जाएगा कि पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता नहीं है अथवा ऐसी स्वतंत्रता का हनन और उल्लंघन होता है। इससे पूरे विश्व में पाकिस्तान की किरकिरी होगी। यही कारण है कि पाकिस्तान इस कदम से बेहद नाराज़ है और अमेरिका पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगा रहा है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने जम्मू कश्मीर और नागरिकता कानून तथा एनआरसी के मुद्दों को उठाते हुए भारत को भी इस लिस्ट में डालने की माँग की। हालाँकि पाकिस्तान की इस तरह की माँगों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है, क्योंकि पूरा विश्व उसकी असलियत जान चुका है कि उसके पास भारत के विरोध के सिवाय दूसरा कोई एजेंडा नहीं है।

पाकिस्तान पर दबाव बनाना ही है CAA का मूल उद्देश्य

भारत की मोदी सरकार ने पड़ोसी इस्लामिक देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफग़ानिस्तान में यातनापूर्ण जीवन जी रहे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को भारत में आने पर नागरिकता देने के लिये कानून बनाया तो उसका उद्देश्य यही था कि इन पड़ोसी देशों पर दबाव बनाया जाए कि वे उनके यहाँ रहने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों जिनमें हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध, इसाई, पारसी और सिंधी आदि समुदाय के लोग शामिल हैं, उन्हें यातनाएँ देना बंद करें और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करें। पड़ोसी देशों पर इस कानून का असर भी दिखाई दिया और पाकिस्तान की ओर से प्रतिक्रिया दी गई कि भारत ऐसे कानून बना कर पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल देने का प्रयास कर रहा है। बांग्लादेश की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया आई कि वह भारत में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों को अपने देश में वापस लेने के लिये तैयार है। हालाँकि इसके बाद देश के विपक्षी दलों ने मोदी विरोध के जुनून में इस कानून को लेकर ऐसा प्रचार किया कि यह कानून देश की संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध है और यह कानून देश की धार्मिक स्वतंत्रता को चोट पहुँचाने वाला है, जिससे एक समुदाय विशेष में सरकार के प्रति अविश्वास और असंतोष व्याप्त हो गया और उसने इस कानून के विरोध में बांहें चढ़ा ली, जिससे इस कानून का मूल उद्देश्य लुप्तप्रायः हो गया। पिछले दिनों पीएम मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित हुई भाजपा की रैली को संबोधित करते हुए इस बात की स्पष्टता भी की कि देश में ही इस कानून को लेकर कुछ लोगों ने ऐसा भ्रम फैलाया जिससे एक समुदाय में नाराजगी पैदा हो गई और वह हिंसक प्रदर्शन पर उतारू हो गया। इस विरोध की आग में यह कानून लाने का सरकार का मूल उद्देश्य नाकाम हो गया और हमने पड़ोसी देशों पर दबाव बनाने का एक मौका गँवा दिया।

लगातार दूसरे साल ब्लैकलिस्ट हुआ पाकिस्तान

दूसरी ओर अमेरिका के विदेश मंत्रालय की संस्था जो विभिन्न देशों में धार्मिक स्वतंत्रता पर नज़र रखने का काम करती है, उसने भी ट्रंप सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति खराब होने की बात की गई। इस संस्था की रिपोर्ट के आधार पर अमेरिकी सरकार हर वर्ष एक ब्लैकलिस्ट तैयार करती है, जिसमें पाकिस्तान को लगातार दूसरे वर्ष भी रखा गया है। यह दर्शाता है कि पाकिस्तान में वर्तमान इमरान खान सरकार के कार्यकाल में भी धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति में कोई सुधार होने की बजाय स्थिति और बिगड़ी है, तभी तो लगातार दूसरी बार पाकिस्तान को इस लिस्ट में रखा गया है।

पाकिस्तान में होता है धार्मिक स्वतंत्रता का हनन

इससे पहले इसी महीने में जारी हुई संयुक्त राष्ट्र के महिलाओं की स्थिति की समीक्षा करने वाले आयोग की रिपोर्ट में भी चेतावनी दी गई थी कि पाकिस्तान में पीएम इमरान खान के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। आयोग ने 47 पेज की अपनी रिपोर्ट में ईशनिंदा कानून के राजनीतिकरण और शस्त्रीकरण के अलावा अहमदिया विरोधी कानूनों को लेकर चिंता जाहिर की थी और कहा था कि इन कानूनों का उपयोग इस्लामी समूह धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताने के लिये करते हैं और इन जुल्मों के आधार पर वे राजनीतिक आधार और वर्चस्व हासिल करते हैं। विशेष कर हिंदू और इसाई समुदाय की महिलाओं और लड़कियों को हजारों की संख्या में हर वर्ष अगवा करके मुस्लिम व्यक्तियों से उनकी शादी करवाई जाती है और उनका जबरन धर्मांतरण कराया जाता है। इमरान खान के नेतृत्व वाली तहरीके-इंसाफ सरकार के भेदभावपूर्ण कानूनों के कारण चरमपंथी मानसिकता वाले लोग और समूह धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले करने के लिये प्रेरित और प्रोत्साहित होते हैं।

अमेरिकी कदम से बौखलाया पड़ोसी देश

अमेरिका की ओर से उठाया गया यह कदम पाकिस्तानी सरकार की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी बड़े सवाल खड़े करती है। अमेरिका के इस कदम से पाकिस्तान बौखला गया है और उस पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगा रहा है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय जम्मू कश्मीर और भारत के नागरिकता कानून तथा एनआरसी के मुद्दों को उठाते हुए भारत को भी इस लिस्ट में डालने की माँग करते नज़र आया।

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