अद्भुत, अकल्पनीय और अविश्वसनीय : क्या कोई DOCTOR भी कभी ‘अंधेरी कोठरी’ रह सकता है ?

महाराष्ट्र के पुणे में पर्यावरण के बीच बिना बिजली के जीवन बिताने वालीं सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. हेमा साने।

भारतीय सनातन, वैदिक और हिन्दू परम्परा के ‘पर्यावरण संरक्षण दर्शन’ की साक्षात् प्रतीक हैं हेमा साने

पूरी दुनिया आज जंगल काटने में लगी है। हर देश प्रकृति का भरपूर दोहन कर रहा है और धरती माता खोखली होती जा रही है। दुनिया को इसके गंभीर परिणाम भी मिल रहे हैं, जिनसे भारत भी अछूता नहीं है। इसके बावजूद भारत में अभी भी वन सम्पदा को लेकर जितनी जागृति है, वह किसी से छिपी नहीं है और भारत की इस चेतना के पीछे अनादि काल से चला आ रही सनातन धर्म और आधुनिक हिन्दू धर्म तथा संस्कृति की परम्परा है, जिसने पर्यावरण संरक्षण को अपने दर्शन का मुख्य हिस्सा बनाया।

हिन्दू दर्शन में ‘दशकूप समावापी: दशवापी समोहृद:। दशहृद सम:पुत्रो दशपत्र समोद्रुम:।।’ श्लोक के जरिए एक वृक्ष की तुलना मनुष्य के दस पुत्रों से की गई है। हमारे ऋषि-मुनि आज के आधुनिक युग के वैज्ञानिकों से कहीं अधिक दूरदृष्टा थे और वे आने वाले भविष्य को जानते थे। तभी हमारी सनातनी वैदिक परम्परा में पर्यावरण संरक्षण को महत्व दिया गया, जो इस श्लोक से समझा जा सकता है, ‘वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव:’ अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं- ‘अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु’ यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से तीन आश्रमों ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है। गृहस्थाश्रम को छोड़ कर ये तीनों आश्रम वन में ही पूर्ण किए जा सकते हैं।

यह बात आपको इसलिए बता रहे हैं, क्योंकि क्लाइमेट चेंज पूरी दुनिया के लिये एक चुनौती बन गया है। पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ता जा रहा है और बर्फीले पहाड़ तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे समंदर का जलस्तर बढ़ रहा है और पृथ्वी के कई भूभाग समंदर में समा जाने की कगार पर पहुँच गये हैं। ऐसे में पर्यावरण की सुरक्षा ही एकमात्र उपाय है जो पृथ्वी को समंदर में डूबने से बचा सकती है और पर्यावरण की सुरक्षा के लिये पेड़-पौधे तथा जंगलों का विकास जरूरी है, यही हमारी आने वाली पीढ़ी का जीवन सुरक्षित कर सकते हैं, परंतु सब आधुनिक इलेक्ट्रिक संसाधनों का उपयोग करके बढ़ती गर्मी से तुरंत राहत तो पा लेते हैं, किन्तु भविष्य के बारे में और आने वाली पीढ़ी के बारे में नहीं सोचते हैं।

इंटरनेट, मोबाइल सहित लाखों मशीनों के जाल में उलझ चुके आज के आधुनिक युग में कहाँ किसी को पर्यावरण संरक्षण का विचार भी स्फुरित हो सकता है, परंतु भारत की ही एक महिला डॉक्टर ने अपने पूरे जीवन को पर्यावरण के लिए समर्पित कर पूरी दुनिया को एक संदेश दिया है। इस महानुभाव महिला का नाम है प्रोफेसर डॉक्टर हेमा साने। 79 वर्षीय हेमा साने ऐसे लोगों के लिये दृष्टांत रूप हैं, जो लोगों को पर्यावरण के साथ घुल-मिलकर जीवन जीने का संदेश देती हैं।

पुणे के सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय से वनस्पति विज्ञान में पीएचडी करने वाली डॉ. हेमा पुणे के ही गरवारे कॉलेज में कई वर्ष तक प्रोफेसर रही हैं। डॉ. हेमा ने अपना जीवन प्रकृति और पर्यावरण की देखभाल के लिये समर्पित कर दिया है। वह एक झोपड़ीनुमा अत्यंत साधारण घर में रहती हैं, परंतु उन्होंने घर के आसपास पेड़-पौधों का पूरा जाल बिछा रखा है, इतना ही नहीं वह अपने घर में पालतू पशु-पक्षियों कुत्तों, बिल्लियों, नेवले और भाँति-भाँति के पक्षियों के साथ रहती हैं और इनकी देखभाल करती हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि एक ओर हम लोग जहाँ वर्तमान भीषण गरमी में इलेक्ट्रिक पंखा, वॉटर कूलर और एयरकंडीशन के बिना कुछ पल नहीं रह सकते, वहीं डॉ. हेमा एक ऐसी पर्यावरण-प्रेमी हैं, जिन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी बिजली का उपयोग नहीं किया। न रात को रोशनी के लिये बिजली का उपयोग करती हैं और न ही दिन में शीतल हवा के लिये इलेक्ट्रिक पंखे, कूलर या एयर कंडीशन का उपयोग करती हैं। रात को काम करने के लिये वह तेल से जलने वाले लैंप का उपयोग करती हैं और शीतल हवा के लिये पेड़-पौधे ही काफी हैं।

पुणे के बुधवार पेठ में रहने वाली डॉ. हेमा ऐसी पर्यावरणविद् हैं जिन्हें कदाचित ही कोई ऐसा पेड़-पौधा होगा, जिसके बारे में ज्ञान न हो, वह पर्यावरण पर अनेक पुस्तकें भी लिख चुकी हैं। उनका पूरा समय इन्हीं पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों की देखभाल में बीतता है और जो समय बचता है, उसमें वह पर्यावरण सम्बंधी पुस्तकें लिखती हैं। उनकी सुबह चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर होती है। दोपहर को उनका समय पेड़-पौधों की शीतल छाया और हवा में गुजरता है।

डॉ. हेमा का पूरा जीवन एक संदेश है कि हमें पर्यावरण के साथ घुल-मिलकर रहना चाहिये, क्योंकि यही हमारे जीवन के रक्षक हैं। आजकल विकास के नाम पर क्रंक्रीट के जंगलों की तरह फैलते जा रहे शहरीकरण के कारण भूमि का तापमान बढ़ता जा रहा है। जंगलों और कृषि भूमि का दायरा सिमटता जा रहा है, जो आने वाली पीढ़ी के जीवन के लिये खतरे की घंटी है। भारतीय प्राचीन जीवन शैली भी पर्यावरण मैत्री वाली शैली थी। भारत का रहन-सहन, खान-पान सबकुछ वातावरण के अनुरूप था, परंतु समय के साथ अब सबकुछ बदल गया है, इस विकास ने ही विनाश को आमंत्रित किया है और आधुनिक जीवन के नाम पर व्यक्ति असुरक्षित जीवन जी रहा है।

डॉ. हेमा कहती हैं कि उनकी साधारण जीवन शैली को देखकर कई लोग उन्हें यह मकान बेचने की सलाह देते हैं और कुछ लोग पागल भी कहते हैं, परंतु उन्हें इन चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि वह इको-फ्रेंडली जीवन शैली में खुश हैं। उनका कहना है कि बिजली के आने से पहले भी तो लोग आधुनिक संसाधनों के बिना जीवन जीते ही थे, वह भी इन संसाधनों का उपयोग किये बिना आनंदपूर्वक जीवन जी रही हैं। उनका जीवन सचमुच प्रेरणादायी है।

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