सबरीमाला विवाद : बात मंदिर की निकली थी, अब मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारे तक भी जाएगी

विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 14 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की उम्र की महिलाओं के लिये प्रवेश का विवाद महिलाओं के लिये इस मंदिर के ही नहीं, अपितु मस्जिद, गिरिजाघर और गुरुद्वारे समेत सभी धर्मों के धार्मिक स्थलों के द्वार भी खोल सकता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सबरीमाला मंदिर पर आने वाले फैसले का असर केवल इस मंदिर तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर अन्य धर्मों में चल रही प्रथाओं पर भी पड़ेगा। सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जो पुनर्विचार याचिकाएँ दायर की गई थी, उन्हें गुरुवार को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली 5 जजों की खंडपीठ ने 7 सदस्यीय बड़ी संवैधानिक पीठ को भेजने का आदेश दिया है। 5 में से 3 जजों के बहुमत से यह मामला उच्च संवैधानिक पीठ को रेफर किया गया है, जबकि दो जजों जस्टिस नरीमन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसके विरुद्ध निर्णय दिया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) रंजन गोगोई ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश देने के मामले पर पुनर्विचार की याचिकाओं को सुनवाई के लिये उच्च संवैधानिक पीठ के पास भेजने का आदेश देते हुए कहा कि धार्मिक प्रथाओं को सार्वजनिक आदेश, नैतिकता और भाग-3 के अन्य प्रावधानों के विरुद्ध नहीं होना चाहिये।

इसके बाद से ही देश में सुप्रीम कोर्ट के इस वाक्य का विश्लेषण शुरू हो गया है और ऐसा अर्थघटन किया जा रहा है कि अब यह मामला केवल सबरीमाला मंदिर तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विभिन्न धार्मिक प्रथाओं को लेकर जिन मस्जिदों, गिरजाघरों या गुरुद्वारों में भी विविध कारणों से महिलाओं के प्रवेश को लेकर पाबंदियाँ होंगी, उन पर भी सर्वोच्च अदालत के निर्णय का प्रभाव पड़ेगा। यहाँ तक कि दाऊदी बोहरा समाज में प्रचलित स्त्रियों के खतना सहित अन्य विविध धार्मिक मुद्दे भी विचार के लिये इस सात सदस्यीय संविधान पीठ को विचारार्थ सौंपे गये हैं, जिससे आने वाले समय में इस पीठ का निर्णय काफी महत्वपूर्ण और व्यापक सिद्ध होने वाला है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि उसका पिछला फैसला बरकरार रहेगा, जिसमें अदालत ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश देने की बात कही है। अदालत ने केरल की सरकार से अदालत के फैसले को लागू करने के लिये भी कहा है। इससे पहले 28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश देने का निर्णय घोषित किया था, जिसके बाद केरल में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध हिंसक प्रदर्शन हुए थे। इस विरोध को देखते हुए 56 पुनर्विचार याचिकाओं सहित कुल लगभग 64 याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई हैं, जिन पर गुरुवार को फैसला आना था, परंतु वर्तमान 5 सदस्यीय खंडपीठ ने इन याचिकाओं पर फैसला सुनाने के बजाय इन्हें उच्च संवैधानिक पीठ के पास रेफर कर दिया है, जिससे फिलहाल यह मामला कुछ और समय के लिये टल गया है।

मस्जिदों में प्रवेश देने के लिये भी दायर की गई है PIL

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर विवाद पर आने वाले उच्च संवैधानिक पीठ के फैसले का असर मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश के जिस मामले पर पड़ने की बात की है, वह मामला यास्मीन जुबैरअहमद पीरजादा से जुड़ा है, जिन्होंने एक याचिकाकर्ता के रूप में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। इस याचिका में यास्मीन ने सरकारी अधिकारियों और वक्फ बोर्ड जैसे मुस्लिम संस्थानों को मस्जिदों में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने का निर्देश देने की माँग की है। याचिका में दलील दी गई है कि महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने से रोकना महिलाओं के कई मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला कदम है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में अभी लंबित है, जो गोगोई ने सबरीमाला मंदिर की याचिकाओं के साथ ही उच्च संवैधानिक पीठ के पास भेज दिया है।

दाऊदी बोहरा समाज में महिलाओं के खतना के विरुद्ध भी है PIL

इसी प्रकार दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में 15 साल से कम उम्र की नाबालिग लड़कियों में धार्मिक प्रथा के नाम पर खतना की बर्बर प्रथा को जायज ठहराया जाता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में इस प्रथा को भी चुनौती दी गई है। वकील सुनीता तिवारी की ओर से जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका में कहा गया है कि महिला जननांग का छेदन करने की परंपरा संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। उनका कहना है कि धर्म के नाम पर किसी स्त्री के गुप्तांग से छेड़छाड़ कैसे की जा सकती है ? यह प्रक्रिया जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धर्म, नस्ल, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव करने वाली, बर्बर और असंवेदनशील है। केन्द्र सरकार की ओर से भी याचिका का समर्थन किया गया है और अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अदालत से कहा है कि इस परंपरा पर 42 देशों में रोक लग चुकी है, जिनमें 27 अफ्रीकी देश शामिल हैं। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस बर्बर प्रथा पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता दर्शाई है। यह मामला भी सीजेआई रंजन गोगोई के अनुसार उच्च संवैधानिक पीठ के पास भेजा गया है।

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