सनातन संक्रांति : यदि हम नहीं जान पाए इस ‘SCIENCE’ को, तो हमसे बड़ा कोई ‘आत्महत्यारा’ नहीं !!!

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 21 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। आत्महत्या शब्द सुनते ही हमारे चित्त में एक ऐसे व्यक्ति का चित्र उभर आता है, जिसने स्वयं अपने प्राण हर लिए हों। आधुनिक युग में हमें आत्महत्या की यही परिभाषा सिखलाई गई है। जिसने स्वयं को फाँसी पर झुला कर, विषाक्त पदार्थ का सेवन कर, नदी-तालाब-समुद्र में कूद कर, स्वयं को गोली मार कर या फिर ऐसी ही अन्य किसी युक्ति से अपनी हत्या कर ली, उसे ही आज के विश्व में आत्महत्या कहा जाता है। वैधानिक दृष्टि से आत्महत्या को अपराध घोषित किया गया है, परंतु विडंबना यह है कि यह विधि यानी क़ानून स्वघोषित अपराधी यानी आत्महत्या का अपराध करने वाले को दंडित नहीं कर सकता, क्योंकि जिसे दंडित किए जाने का प्रावधान है, वह तो मृत्यु को प्राप्त हो चुका होता है।

आज गुरुवार है यानी ईश्वर के साक्षात् स्वरूप गुरु का वार और आप भली-भाँति समझ भी गए होंगे कि गुरुवार का दिन वैचारिक क्रांति के सूत्रधार युवाPRESS के साप्ताहिक स्तंभ ‘सनातन संक्रांति’ का होता है। गत 19 सितंबर, 2019 से आरंभ हुई ‘सनातन संक्रांति’ की इस श्रृंखला का आज 10वाँ भाग है और इसका विषय है ‘आत्महत्या’। एक अनुमान के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष 8,00,000 लोग आत्महत्या करते हैं, जिनमें भारतीयों की संख्या 17 प्रतिशत अर्थात् 1,35,000 है। यहाँ हम ईश्वर की ओर से मिले अमूल्य मानव शरीर को निष्प्राण कर देने वाले आत्महत्यारों की बात नहीं करना चाहते। जिन्होंने आत्महत्या कर ली है, वे नए जन्म को प्राप्त हो चुके होंगे और जो कर रहे हैं या करने वाले हैं, वे भी किसी न किसी योनि में पुनर्जन्म लेंगे ही, परंतु हम तो बात करने जा रहे हैं ‘जीवित आत्महत्यारों’ की !!! आश्चर्य हुआ न ? मन में प्रश्न उठ रहे होगा ‘जीवित आत्महत्यारे’ ? ये क्या होता है और कौन होते हैं ?

तो चलिए आपको जीवित आत्महत्यारों के विषय में भी बता देते हैं। त्रेता युग में अवतरित हुए भगवान श्री राम जब गुरु वशिष्ठ से आत्म-ज्ञान की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, तब गुरु वशिष्ठ ने प्रभु श्री राम के समक्ष ‘जीवित आत्महत्यारे’ की बहुत सुंदर व्याख्या दी थी। इसका उल्लेख शिष्य राम और गुरु वशिष्ठ के बीच हुए संवाद से रचित ग्रंथ ‘योग वशिष्ठ’ में मिलता है। राम का नाम सुनते ही लोग 9 कांडों वाले ‘रामायण’ महाकाव्य में कही गई कथाओं तक सीमित होकर सोचते हैं, परंतु बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि ‘योग वशिष्ठ’ नामक ग्रंथ को तो ‘महारामायण’ की उपाधि दी गई है, क्योंकि ‘योग वशिष्ठ’ में गुरु वशिष्ठ ने प्रभु राम को अपने वास्तविक स्वरूप की अनुभूति कराई है। इसी ‘योग वशिष्ठ’ में गुरु वशिष्ठ देहधारी राम से कहते हैं, ‘हे रामचंद्रजी ! बड़े भाग्य से मनुष्य तन पाया है और जो व्यक्ति मनुष्य तन पाने के बाद स्वयं को, अपने निज स्वरूप को जाने बिना देहत्याग कर इस संसार से चला जाता है, उस व्यक्ति, उस मनुष्य से बड़ा आत्महत्यारा दूसरा कोई नहीं है।’ गुरु वशिष्ठ ने इस एक पंक्ति के माध्यम से सूर्य के दिव्य प्रकाश में भी प्रगाढ़ निद्रा में सोए हुए प्रत्येक मनुष्य को उस आत्मज्ञान, उस निज स्वरूप को पहचानने, स्वयं से साक्षात्कार करने, जीवनमुक्त दशा पाने, मुक्ति या मोक्ष पद को प्राप्त करने का संदेश दिया है, जिसे प्राप्त करने के बाद मनुष्य के लिए इस धरती तो क्या, पूरे ब्रह्मांड में कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता।

पहले इस मानव योनि का महत्व समझिए

भारतीय सनातन धर्म और उससे जुड़े गुरु-शिष्य संवाद पर आधारित गीता सहित सभी ग्रंथों में पुकार-पुकार कर एक ही बात कही गई है, ‘कई जन्मों के पुण्य से मानव योनि प्राप्त होती है।’ भारत के संतों-महापुरुषों ने सौभाग्यशाली व्यक्ति उसे कहा है, जिसके जीवन में तीन बातों का सुगम संयोग हुआ हो। पहला मानव जन्म की प्राप्ति, दूसरा मोक्ष की इच्छा का जागना और तीसरा सद्पुरुष का संग। किसी माता-पिता के परस्पर संयोग से मनुष्य तन तो मिल गया, परंतु यह व्यर्थ गँवाने के लिए नहीं मिला है। भौतिक सुखों की अंधी दौड़ में भागने वाला इंसान अपने अनमोल देह का एक-एक हिस्सा उन वस्तुओं को पाने में क्षीण करता जाता है, जो वस्तुएँ स्वयं क्षीण हैं। या तो वो वस्तुएँ एक दिन नष्ट हो जाएँगी या फिर उसे प्राप्त करने वाला इंसान। इस आपाधापी में और आज के वैज्ञानिक-आधुनिक युग में स्वयं को अति बुद्धिशाली मानने वाला इंसान पूरे जीवन काल में यह कभी नहीं सोच पाता कि वह भाग-दौड़ क्यों कर रहा है ? मरते समय वह अचानक नींद से जागता है, परंतु बहुत देर हो चुकी होती है। इसीलिए यदि मानव जन्म मिला है, तो सबसे पहले उसका लक्ष्य समझना आवश्यक है। यह मानव जन्म केवल और केवल परमात्म प्राप्ति के लिए मिला है। संसार में रह कर, सभी कर्मों को करते हुए इस लक्ष्य की प्राप्ति करनी होती है, परंतु व्यक्ति कर्मों में ऐसा उलझ जाता है कि उसकी हर यात्रा बाह्य पदार्थों की ओर ही जाती है, कभी स्व की ओर होती ही नहीं है। यदि व्यक्ति थोड़ा-सा विवेक जगाए, थोड़ी-सी बुद्धि लड़ाए, तो उसे आसानी से यह समझ में आ सकता है कि मानव जन्म की प्राप्ति का उद्देश्य निज स्वरूप को जानना है और पुनर्जन्म के चक्रव्यूह से बाहर निकलना है। जब यह विवेक जागेगा, तब मोक्ष की इच्छा जागेगी और फिर उस सद्गुरु या प्रकट पुरुष का संग मिलेगा, जो स्वयं को जानता है।

मरूँ-मरूँ सब कहे, मरना न जाने कोय…

भारत के महान संत कबीर ने जागते हुए भी गहरी नींद में सोई हुई मानव जाति को झकझोरने वाले कई दोहों की रचना की है। उन्हीं में से एक दोहा है, ‘मरूँ-मरूँ सब कहे, मरना न जाने कोय, एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न होय…’। संत कबीर इस दोहे के माध्यम से उसी विज्ञानयुक्त-स्वप्रमाणित ज्ञान की बात कर रहे हैं। कबीर के कहने का तात्पर्य है कि यदि मरना ही है, तो वर्तमान मनुष्य जीवन में देहाभिमान को मार कर उस परम् पद को प्राप्त कर लो, जहाँ कोई मरता नहीं है, जहाँ नित्य अमरत्व है। ‘योग वशिष्ठ’ में गुरु वशिष्ठ ने यही संकेत दिया है कि निज स्वरूप को जानना ही मानव जीवन का परम् लक्ष्य है और जो इस लक्ष्य से भटक कर संसार रूपी सकाम कर्मों के जंजाल में उलझ जाता है और निज स्वरूप को जाने बिना इस पृथ्वी लोक (मृत्यु लोक) से चला जाता है, उससे बड़ा आत्महत्यारा कोई नहीं है। आत्महत्या की यही सच्ची परिभाषा है। देह को नहीं मारना है। मनुष्य यदि देह को मारता है, तो उसे इस जन्म के उत्पीड़नों, दु:खों से मुक्ति मिल सकती है, परंतु उसकी वास्तविक मृत्यु नहीं होती, क्योंकि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से बना सूक्ष्म शरीर कभी मरता नहीं है। इसीलिए देह को मारने वाला मनुष्य नए जन्म को धारण अवश्य करता है और पुन: सुख-दु:ख के चक्रव्यूह में फँसने की नई यात्रा आरंभ करता है। संत कबीर का यह कहना कि ‘एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न होय…’, बहुत बड़ा संकेत है कि देह को नहीं, देहाध्यास को मारो। देहाध्यास अर्थात् आत्मा का देह के साथ हुआ तादात्म्य, जिसे तोड़ कर ही मनुष्य को पुनर्जन्म के कारणरूपी सूक्ष्म शरीर से मुक्ति मिलती है। संत कबीर कह रहे हैं कि जीते-जी अपने देह से संबंध तोड़ दो। यदि मरना ही है, तो जीते-जी देह की हत्या कर दो और उसके बाद जो परम पद मिलेगा, वहाँ कभी मरना नहीं पड़ेगा। गुरु वशिष्ठ इससे एक कदम आगे कहते हैं कि बड़े भाग्य से जो मनुष्य तन मिला है, वह तन ईश्वर यानी निज स्वरूप को जानने का साधन है। उस साधन के माध्यम से अपने निज स्वरूप को जान लो और जो मनुष्य तन मिलने के बाद भी निज स्वरूप को जाने बिना देहत्याग कर देता है, उससे बड़ा आत्महत्या जगत में दूसरा कोई नहीं है।

क्या है वह विज्ञानयुक्त ज्ञान, जो आत्महत्या से बचाता है ?

प्रकट पुरुष की शरण ही उस आत्मज्ञान को उपलब्ध करा सकती है। भारतीय सनातन धर्म का यह एक ऐसा चामत्कारिक विज्ञान है, जिसे देह आधारित-देह तक सीमित आधुनिक (चिकित्सा) विज्ञान के युग में प्रमाणित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह अनुभूति का विषय है। जिस प्रकार गुड़ का स्वाद का वर्णन सुन कर गुड़ का स्वाद नहीं जाना जा सकता, अपितु गुड़ खाकर ही उसका स्वाद जाना जा सकता है। ठीक उसी तरह आत्मज्ञान भी विज्ञानयुक्त ज्ञान है, जो स्वप्रमाण पर आधारित है। किसी प्रकट पुरुष, जिसने स्वयं को जाना है, जो निज स्वरूप में स्थित है, वही आत्मज्ञान की इस गूढ़ विद्या के रहस्यों को समझा सकता है। निज स्वरूप को जाने बिना आप गुरु वशिष्ठ कथित ‘आत्महत्या’ के दोष से बच नहीं सकते। भारतीय वैदिक संस्कृति में आत्मज्ञान की प्राप्ति के कई मार्ग बताए गए हैं, परंतु उन मार्गों का मार्गदर्शक केवल और केवल वही (सद्गुरु) हो सकता है, जिसने उस लक्ष्य को प्राप्त किया है। जो स्वयं ही स्वयं को नहीं जानता, वह किसी अन्य को उसके अव्यक्त निज स्वरूप की पहचान नहीं करा सकता।

पाठकों के प्रश्नों का स्वागत

‘सनातन संक्रांति’ नामक यह स्तंभ निरंतर ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाएगा और आगे भी इसमें मानव जीवन के कई गूढ़ रहस्यों और अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति तक के मार्ग को दिखाने के प्रयास किए जाएँगे। इस प्रथम भाग में जो बातें कही गई हैं, उसे लेकर किसी भी पाठक के मन में कोई प्रश्न हो, तो उसका युवाप्रेस.कॉम स्वागत करता है। हर पाठक के हर प्रश्न का गुरु कृपा से सटीक उत्तर देने का प्रयास किया जाएगा। पाठक इस आलेख से जुड़े या अध्यात्म से जुड़े किसी भी प्रश्न को इन ई-मेल आईडी founder@iksharma.com, iksharmadotcom@gmail.com, kanhaiyyaa@gmail.com अथवा वॉट्सएप नंबर 9998953281 पर भेज सकते हैं। उनके प्रश्नों का ‘सनातन संक्रांति’ की अगली श्रृंखलाओं में उत्तर देने का पूर्ण निष्ठा से प्रयास किया जाएगा।

(गुरु अर्पण)

You may have missed