सनातन संक्रांति : मृत्यु ‘अटल सत्य’ नहीं, क्योंकि कोई कभी मरता ही नहीं है..!

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 28 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। साधारणत: किसी व्यक्ति की मृत्यु पर श्मशान में एकत्र हुए लोग आपस में यह बातें कहते सुने जाते हैं, ‘क्या लेकर गया, एक दिन हमें भी यहीं आना है। मृत्यु अटल सत्य है, जिसका हमें भी एक न एक दिन सामना करना ही पड़ेगा।’ श्मशान में एकत्र लोगों के मुख से निकलने वाला यह उद्गार ‘श्मशान वैराग्य’ की श्रेणी में आता है अर्थात् ऐसा वैराग्य, जो केवल श्मशान तक सीमित रहता है। श्मशान से पुन: संसार में लौटते ही हर व्यक्ति पुन: जीवन की आशा से स्वयं को भरता है और रूटीन लाइफ में लौट आता है।

भारतीय सनातन धर्म संस्कृति से लेकर आधुनिक विज्ञान तक इस बात को मानता है कि मृत्यु अटल सत्य है अर्थात् ऐसा सत्य, जो टल नहीं सकता। किसी भी योनि में जन्म लेने वाले हर जीव की एक न एक दिन मृत्यु अवश्य होनी है। चार खानि के जीव हैं : अंडज, पिंडज, स्वेदज और उद्विज। अंडज अर्थात् अंडे से जन्म लेने वाले पक्षी, सर्प आदि। पिंडज अर्थात् किसी के शरीर (पिंड) से जन्म लेने वाले मनुष्य, पशु आदि। स्वेदज अर्थात् पसीने से जन्म लेने वाले जूँ आदि। उद्विज अर्थात् भूमि-जल के संगम से भूमि को फाड़ कर जन्म लेने वाले पेड़, पौधे, वनस्पतियाँ आदि। इन चारों खानि के जीवों पर ‘मृत्यु अटल सत्य’ का नियम लागू होता है, परंतु आज हम आपको शुद्ध और सनातन तर्क के आधार पर यह सिद्ध करके दिखाएँगे कि मृत्यु अटल सत्य नहीं है, क्योंकि इस पृथ्वी तो क्या, पूरे ब्रह्मांड-सृष्टि में कोई भी-कभी भी मरता ही नहीं है।

वैचारिक क्रांति के सूत्रधार युवाPRESS के गत 19 सितंबर, 2019 से आरंभ हुआ ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ आज गुरुवार को भाग 11 में प्रवेश कर रहा है और इस 11वीं कड़ी में हम इसी बात को सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि यहाँ प्रतिदिन मानव सहित अरबों जीवों की मृत्यु हो रही है, परंतु वास्तव में कोई भी मर नहीं रहा है। भारतीय सनातन व वैदिक धर्म शास्त्रों तथा सद्गुरुओं की वाणी का स्मरण करते हुए यह दावे से कहा जा सकता है कि कोई भी जीव मरता नहीं है। यदि प्रमाण को ही सत्य मानने वाले वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखें, तो किसी व्यक्ति ने कभी यह नहीं कहा, ‘मैं मर गया हूँ।’ विज्ञान तो प्रमाण को ही सत्य मानता है। ऐसे में, जबकि आज तक किसी भी व्यक्ति या जीव ने स्वयं यह नहीं प्रमाणित नहीं किया, ‘मैं मर गया हूँ’, तब मृत्यु को प्रमाणित कैसे माना जा सकता है ? यदि विज्ञान से परे और विज्ञान से भी ऊँची दूरदृष्टि वाले भारतीय सनातन-वैदिक धर्म तथा सद्गुरुओं की बात मानें, तो हर जीव निरंतर गतिशील है और इसीलिए वह केवल जगत के समक्ष प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले स्थूल शरीर का त्याग करता है, तो इस दृष्टिकोण से भी कोई मरता नहीं है।

हमने चार खानि के जीवों का उल्लेख किया, जिसमें असंख्य जीव शामिल हैं, परंतु हम पिंडज खानि के जीव मनुष्य को ही बात कर लेते हैं कि कैसे कोई मनुष्य कभी भी मरता नहीं है। वास्तव में मनुष्य या मानव शब्द की उत्पत्ति का बीज मन है। भारतीय सनातन धर्म के अनुसार ब्रह्मांड में 84 लाख योनियाँ हैं और सबके पास मन तो होता ही है, परंतु 83 लाख 99 हजार 999 योनियों के जीव अपने मन से कुछ नहीं कर पाते या कर सकते, क्योंकि उनका जीवन केवल और केवल प्रारब्ध/प्रकृति के आधीन होता है। एकमात्र मानव योनि ऐसी है, जो मन का उपयोग (सदुपयोग या दुरुपयोग) कर सकती है, क्योंकि ईश्वर ने पाँच महाभूतों और तीन गुणों से बने मानव रूपी पुद्गल में ‘विवेक’ रूपी बुद्धि प्रदान की है, परंतु कुशाग्र बुद्धि प्राप्त करने के पश्चात् भी यदि कोई विवेकपूर्ण दृष्टि से सोचे, तो वह यह जान सकता है कि उसकी कभी मृत्यु नहीं होने वाली, वह नित्य-सदा अमर है और रहेगा।

पहले आपको वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाते हैं कि किस तरह मृत्यु अटल सत्य नहीं है ? जैसा कि हमने ऊपर कहा कि अनादिकाल से चली आ रही इस सृष्टि में जब कोई व्यक्ति जन्म लेता है, तो वह प्रत्यक्ष प्रमाण होता है। आधुनिक युग में तो सरकार की ओर से अधिकृत जन्म प्रमाणपत्र भी दिया जाता है। जन्म लेने वाला नवजात शिशु भले ही जन्म के समय यह नहीं कह पाता कि उसने जन्म लिया है, परंतु बड़ा होने के बाद वह देह रूप में सबके सामने प्रत्यक्ष रहते हुए यह स्वयं प्रमाणित कर सकता है कि उसने जन्म लिया है, परंतु क्या कभी मृत्यु को प्राप्त हो जाने वाले व्यक्ति ने यह प्रमाण दिया है कि वह मर गया है ? आपका उत्तर होगा, ‘नहीं।’ सनातन धर्म ग्रंथों और जागृत संत पुरुषों की मानें, तो जीवन के अंतिम क्षणों में भी व्यक्ति जिस ‘स्वयं’ को मरता हुआ देखता है, जिस ‘स्वयं’ की मौत निहारता है, वह ‘स्वयं’ देह होता है, परंतु देह की मृत्यु को देखने और निहारने वाला भी कोई ‘स्वयं’ है और वह ‘स्वयं’ ही व्यक्ति की मृत्यु का एकमात्र साक्षी होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि मरते हुए व्यक्ति में ‘स्वयं’ के रूप में कोई ऐसा तत्व है, जो उसके जीवन ही नहीं, उसकी मृत्यु का भी साक्षी है। महापुरुषों के अनुसार यह तत्व वास्तव में अमर है और व्यक्ति के देह से पहले, देह के साथ और देह के बाद भी जीवित रहता है। जो यह तत्व जीते-जी जान लेता है, वह देह की मृत्यु को मृत्यु ही नहीं मानता। इतना ही नहीं ऐसा तत्वज्ञानी पुरुष उस परम् पद को प्राप्त होता है, जहाँ पुनर्जन्म के लिए कोई स्थान नहीं होता। दूसरी तरफ जो व्यक्ति इस तत्व को जाने बिना मर जाता है, वह भी वास्तव में मरता नहीं है। केवल उसकी देह की मृत्यु होती है। चूँकि उसने ‘स्वयं’रूपी तत्व को नहीं जाना है, इसीलिए उस व्यक्ति में अनादिकाल से चला आ रहा मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार से बना सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है, जिसमें उसकी वासनाएँ-इच्छाएँ होती हैं। मरता हुआ व्यक्ति उस ‘स्वयं’रूपी तत्व के कारण उसकी देह से निकलने जा रहे सूक्ष्म शरीर को भी स्पष्ट देख सकता है। यही कारण है कि जब व्यक्ति इस जन्म में मिले देह को त्यागता है, तब उसकी देह से केवल प्राण नहीं, अपितु वासनाओं-इच्छाओं से परिपूर्ण सूक्ष्म शरीर भी निकल जाता है और उस गर्भ में संक्रमित होता है, जहाँ से वह नए शरीर के साथ अपनी अपूर्ण-अतृप्त वासनाओं और इच्छाओं को पूर्ण करने की यात्रा पुन: आरंभ करता है। कहने का सार यही है कि जीवन का आधार सूक्ष्म शरीर है और वह कभी मरता नहीं। जो तत्वज्ञानी है, उसका अंतिम जीवन होता है। ऐसे में आप मृत्यु को अटल सत्य कैसे मान सकते हैं ?

पाठकों के प्रश्नों का स्वागत

‘सनातन संक्रांति’ नामक यह स्तंभ निरंतर ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाएगा और आगे भी इसमें मानव जीवन के कई गूढ़ रहस्यों और अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति तक के मार्ग को दिखाने के प्रयास किए जाएँगे। इस प्रथम भाग में जो बातें कही गई हैं, उसे लेकर किसी भी पाठक के मन में कोई प्रश्न हो, तो उसका युवाप्रेस.कॉम स्वागत करता है। हर पाठक के हर प्रश्न का गुरु कृपा से सटीक उत्तर देने का प्रयास किया जाएगा। पाठक इस आलेख से जुड़े या अध्यात्म से जुड़े किसी भी प्रश्न को इन ई-मेल आईडी founder@iksharma.com, iksharmadotcom@gmail.com, kanhaiyyaa@gmail.com अथवा वॉट्सएप नंबर 9998953281 पर भेज सकते हैं। उनके प्रश्नों का ‘सनातन संक्रांति’ की अगली श्रृंखलाओं में उत्तर देने का पूर्ण निष्ठा से प्रयास किया जाएगा।

(गुरु अर्पण)

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