सनातन संक्रांति : अहो आश्चर्यम् ! ‘मन’ के बिना भी उत्तम जीवन संभव है…

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 10 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। युवाPRESS की ओर से आरंभ किया गया सनातन संक्रांति स्तंभ आज गुरुवार को चौथी कड़ी की ओर अग्रसर है। गत 19 सितम्बर, 2019 गुरुवार से आरंभ हुए इस स्तंभ की आज जब चौथी कड़ी है, तब संयोग से 28वाँ विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस भी है। इसीलिए हमने सनातन संक्रांति की इस चौथी कड़ी का विषय मन को बनाया है। आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान में मन केवल और केवल एक शोध का विषय बन कर गया है। आधुनिकता ने जहाँ एक ओर चिकित्सा विज्ञान को मन के रहस्यों की गुत्थियाँ सुलझाने में व्यस्त कर दिया है, वहीं साधारण मनुष्य के मन को केवल और केवल विकारों से भर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार आज विश्व का हर चौथा व्यक्ति मन के किसी न किसी रोग से ग्रस्त है। आधुनिक विज्ञान ने जहाँ मनोरोगी बढ़ाए हैं, वहीं पूरी दुनिया में मनोचिकित्सकों का व्यवसाय दिन दूना-रात चौगुना बढ़ रहा है। बड़े महानगरों से लेकर छोटे-छोटे नगरों तक मनोवैज्ञानिकों (Psychologists), मनोचिकित्सकों (Psychiatrists) और मनोपरामपर्शदाताओं (Psycho-Counselors) की बाढ़ आ गई है।

आपको याद होगा कि आपने जिस भी स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई की होगी, वहाँ कभी भी आपको मन के बारे में कुछ नहीं पढ़ाया गया होगा। हाँ, जो लोग मनोवैज्ञानिक (Psychologists), मनोचिकित्सक (Psychiatrists) और मनोपरामपर्शदाता (Psycho-Counselors) बनना चाहते होंगे, उन्होंने अवश्य ही मन के भावों, मन की गहनता, मन की गूढ़ता, मन के रहस्यों, मन की बारीकियों को समझने का प्रयास किया होगा, परंतु वैज्ञानिक तरीके से। मेरा स्वयं का अनुभव है कि मैंने अपने शिक्षा काल में कभी-भी, किसी भी पुस्तक में मन विषय की पढ़ाई नहीं की है। हाँ, कविताओं, पाठों और कहानी-किस्सों में तथा आम जनजीवन में फिल्मी गीतों अथवा व्यावहारिक कर्म में मन शब्द का प्रयोग अवश्य सुना और किया भी है, परंतु मन पर किसी प्रकार की गंभीर चर्चा न पढ़ी, न सुनी है। मैं उस समय आश्चर्य से विभोर हो गया, जब मैंने हमारे धर्म ग्रंथों की यात्रा आरंभ की, जहाँ सभी रोगों की जड़ मन को बताया गया है।

मन नहीं है शरीर का कोई अंग नहीं, फिर भी रोगग्रस्त है…

भारतीय सनातन धर्म में मन पर बहुत कुछ लिखा गया है। यह कितना बड़ा आश्चर्य है कि मन शरीर का कोई अंग नहीं है, परंतु इसके बावजूद हमारे हर कार्य का प्रेरणास्रोत मन ही है। भारतीय अध्यात्म के अनुसार मन भले ही शरीर का कोई अंग नहीं है, परंतु विश्व का हर व्यक्ति मनोरोग से पीड़ित है। डब्ल्यूएचओ के वैज्ञानिक मापदंड के अनुसार भले ही विश्व का हर चौथा व्यक्ति मानसिक रोगी है, परंतु भारतीय अध्यात्म दर्शन का स्पष्ट उद्घोष है कि एकमात्र ज्ञानी पुरुष को छोड़ कर कोई भी व्यक्ति मनोरोग से मुक्त नहीं है अर्थात् स्वयं को न जानने वाला हर अज्ञानी व्यक्ति मनोरोगी है। यदि आप और मैं भी स्वयं को नहीं जानते, तो हम स्वयं को मनोरोग से मुक्त नहीं कह सकते। एकमात्र ज्ञानी पुरुष, जिसने यह जान लिया है कि वह यह शरीर नहीं है, ही मनोरोग से मुक्त है। शेष सभी लोग मन के किसी न किसी रोग से पीड़ित हैं।

क्या है वास्तविक मनोरोग और क्यों हम सब मनोरोगी हैं ?

भारतीय अध्यात्म दर्शन में निरवयवी (शारीरिक अंग नहीं) मन पर बहुत भार दिया गया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में भले ही मनोरोग के ढेरों प्रकार तथा लक्षण दर्शाए जाते हों और जिनमें वे लक्षण नहीं पाए जाते हों, उन्हें स्वस्थ मना कहा जाता हो, परंतु अध्यात्म जगत में हर वह व्यक्ति मनोरोगी है, जिसके मन में द्वंद्व है। द्वंद्व से अर्थ है सुख-दु:ख, पाप-पुण्य, शुभ-अशुभ, लाभ-हानि, मान-अपमान, अच्छा-बुरा। इस तरह के सुभाव या कुभाव से भरा मन रोगग्रस्त ही है, विकारग्रस्त ही है। जब तक मन में इस तरह के विचारों की अश्खलित श्रृंखला चलती रहती है, तब तक वह मन रोगी ही होता है। भले ही मनोचिकित्सक आपको मानसिक रूप से संपूर्ण स्वस्थ होने का प्रमाणपत्र दे दें, परंतु सुभाव-कुभाव से युक्त मन को कभी भी रोगमुक्त नहीं कहा जा सकता।

‘एक’ को छोड़ कर सभी मनोरोगी और डॉक्टर भी ‘एक’ ही है

आप सोच रहे होंगे कि यह ‘एक’ कौन है, जो मनोरोगी नहीं है और वह ‘एक’ डॉक्टर कौन है, जो सुभाव-कुभाव यानी विकारों से ग्रस्त मन के रोग का उपचार करता है ? सबसे पहले तो ‘एक’ का अर्थ समझ लीजिए। यह ‘एक’ वास्तव में ईश्वर का पर्याय व प्रतीक है। जब हमने जन्म लिया, तब हम ‘एक’ ही थे और जब हमारी मृत्यु होगी, तब भी हम ‘एक’ ही होंगे। इस ‘एक’ के रूप में जन्म के समय हमारे मन में कोई सुभाव-कुभाव जैसा विकार नहीं था और देह से प्राण निकलने के बाद तो ऐसे किसी विकार की संभावना ही नहीं रह जाती, परंतु जन्म से मृत्यु के बीच के काल में इस ‘एक’ के रूप में जन्मा व्यक्ति ‘अनेक’ सगे-संबंधियों, वस्तु-व्यक्ति-पदार्थ सहित भौतिक पदार्थों और भोग-विलास तथा विषयों के आकर्षणों में उलझ जाता है और भूल जाता है कि वह तो ‘एक’ ही है। व्यक्ति का अपने ‘एकत्व’ को भूल जाना ही सबसे बड़ा मनोरोग है, क्योंकि ‘एकत्व’ को भूलने का अर्थ है कि व्यक्ति मोह और माया के जाल में फँस चुका है और इस तरह के किसी भी जाल में फँसना ही सबसे बड़ा मनोरोग है। अब आपके मन में प्रश्न उठ रहा होगा कि सुभाव-कुभाव से भरा हमारा मन भी रोगी ही है और इसका उपचार करने वाला डॉक्टर भी ‘एक’ ही है, तो वह डॉक्टर कौन है ? इसका उत्तर भी दिए देते हैं। इस मनोरोग का उपचार केवल वह सद्गुरु ही कर सकता है, जो स्वयं को ‘एक’ के रूप में जान चुका हो। कोई मनोवैज्ञानिक (Psychologists), मनोचिकित्सक (Psychiatrists) और मनोपरामपर्शदाता (Psycho-Counselors) भी इस सांसारिक मनोरोग का उपचार नहीं कर सकता, क्योंकि वे स्वयं मानसिक विकारों से भरे हुए होते हैं और इनमें से अधिकांश लोग तो मनोरोग के इलाज के नाम पर पीड़ितों से लाखों रुपए की फीस लेते हैं, परंतु एकमात्र सद्गुरु ऐसा होता है, जो कोई फीस नहीं लेता, परंतु आपको न केवल मनोरोग से मुक्ति दिलाने का, अपितु मन से ही मुक्ति दिलाने का सामर्थ्य रखता है ! शर्त इतनी है कि वह सद्गुरु स्वयं को जानता हो, वह सद्गुरु यह भली-भाँति समझ चुका हो कि वह देह नहीं है। वही आपको मनोरोग और उसकी जड़ यानी मन से भी मुक्ति दिला सकता है।

अद्भुत-अकल्पनीय-अविश्वसनीय : ‘मन रहित जीवन संभव है’

भारतीय अध्यात्म विद्या इतनी गूढ़ है, जिसकी थाह पाना आधुनिक विज्ञान के लिए असंभव है। हमारे वेदों-पुराणों-उपनिषदों और यहाँ तक की सबसे आधुनिक श्रीमद् भगवद गीता में भी बार-बार उद्घोष किया गया है, ‘मन का उन्मूलन करो।’ आपके मन में पहला और सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा होगा कि मन के बिना जीवन और उसके व्यवहार कैसे किए जा सकेंगे ? इस प्रश्न का उत्तर है, ‘मन रहित जीवन संभव है।’ मैं अपने आध्यात्मिक जीवन में कुछ ऐसे लोगों के सम्पर्क में हूँ, जो मन के बिना जीवन यापन करते हैं और वह भी विकारयुक्त मन के साथ जीवन यापन करने वाले साधारण व्यक्ति से उत्तम। वास्तव में भारतीय दर्शन का सार यही है कि मानव को इस संसार में हर तरह की अर्थपूर्ण-अर्थहीन दौड़ लगाने पर विवश करता है मन, परंतु ये सभी दौड़ बाह्य होती हैं, जबकि गीता में भगवान श्री कृष्ण विषादग्रस्त अर्जुन से बार-बार यह कहते हैं, ‘हे अर्जुन ! तू केवल तेरा मन मुझे दे दे।’ अर्जुन कहता है, ‘हे केशव ! पवन को मुट्ठी में बंद करना संभव है, इस मन को कैसे वश में करूँ ?’ गीता में कृष्ण परमात्मा ने इसका एक ही उपाय बताया है, ‘योग और अभ्यास’ अर्थात् व्यक्ति को हर कर्म विकारयुक्त मन के सुभाव-कुभाव से प्रेरित होकर नहीं, अपितु निष्काम व नि:स्वार्थ भाव से करने चाहिए, जो उसे कर्मयोगी बनाते हैं। यही योग है। इसका निरंतर अभ्यास करने से एक समय ऐसा भी आता है, जब व्यक्ति की मन अवस्था ही समाप्त हो जाती है। इस मनमुक्त अवस्था को ही मोक्ष, मुक्ति, ज्ञान, स्वयं से साक्षात्कार, ईश्वर से साक्षात्कार, ईश्वर से एकाकार और जीवनमुक्ति कहा जाता है। अध्यात्म की भाषा में इन सभी अवस्थाओं वाले को ‘ज्ञानी’ कहा जाता है। जानकारियों का बोझ हमें ज्ञानी कभी नहीं बना सकता। ऐसा नहीं है कि वह व्यक्ति सांसारिक व्यवहार नहीं करता, बल्कि साधारण संसारी व्यक्तियों से उत्तम व्यवहार करता है। यह कैसे संभव होता है ? इसका गूढ़ रहस्य यह है कि जब व्यक्ति गीता में कृष्ण के कहे अनुसार अपना मन परमात्मा को समर्पित कर देता है, तब वह स्वयं मन से मुक्त हो जाता है। उसका मन विकारों से मुक्त होकर परमात्मा को समर्पित हो जाता है और उसका हर कार्य परमात्मा के मन से प्रेरित होता है। ऐसे मनमुक्त व्यक्ति का कोई सांसारिक व्यवहार नहीं रुकता। गुजरात के महान आदिकवि नरसिंह मेहता इसके श्रेष्ठतम् उदाहरण हैं।

कृष्ण परमात्मा सबसे बड़े दृष्टांत

मैं ‘मन रहित जीवन संभव है’ का दावा इसलिए कर सकता हूँ, क्योंकि मैं जिन कुछ मन रहित व्यक्तियों के संपर्क में हूँ, उन्हें मैंने संसार में रह कर-सभी कर्म करते हुए बिना मन के सरल-सुगम और उत्तम जीवन यापन करते हुए देखा है। ये कुछ लोग संसार के पहले व्यक्ति नहीं हैं, जो बिना मन के जीते हैं। स्वयं श्री कृष्ण को ही ले लीजिए। उन्होंने अपने जीवन में हर कर्म किए, परंतु किसी भी कर्म से उनका कोई व्यक्तिगत या निजी स्वार्थ नहीं जुड़ा हुआ था। गोकुल में रह कर राधा व गोपियों के साथ मिल कर दुनिया को नि:स्वार्थ प्रेम सिखाया, मथुरा में मामा कंस को मार कर सिंहासन न लेते हुए उनके पिता को पुन: राजा बनाया, महाभारत के युद्ध में भाग नहीं लेने की घोषणा के बावजूद कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को ज्ञान देने का नि:स्वार्थ कर्म किया, भव्य द्वारका नगरी बसाने के बावजूद निर्मोही रह कर उसे समुद्र में डुबो दिया और वंशवेल की मोह-माया में न पड़ते हुए यदुवंश का नाश किया। यदि कृष्ण के पास भी विकारयुक्त मन होता, तो वे अपने जीवन में सबसे प्रिय राधा को कभी नहीं छोड़ते। मनमुक्त अवस्था के कारण ही कृष्ण का जीवन सभी तरह के कर्म करते हुए भी त्याग से परिपूर्ण रहा। गोकुल-वृंदावन से मथुरा रवाना होते समय कृष्ण राधा से अंतिम बार मिले। इसके बाद दोबारा कभी नहीं मिले, तो माता यशोदा और पिता नंद का भी स्वत: परित्याग हो गया। मथुरा से हस्तिनापुर रवाना हुए और इसके साथ ही जन्मदाता माता देवकी व पिता वासुदेव का परित्याग किया। कुरुक्षेत्र में अर्जुन को निमित्त बना कर पूरे विश्व के कल्याण की नि:स्वार्थ भावना से गीता का महान उपदेश दिया। महाभारत का युद्ध पांडव जीते, परंतु कृष्ण ने कुछ नहीं लिया। हस्तिनापुर का सिंहासन युद्धिष्ठिर को सौंप दिया और द्वारका आ बसे। भव्य द्वारका नगरी बसाई, परंतु उससे मोहित नहीं हुए। स्वयं कृष्ण ने ही द्वारका को डुबो दिया। आज जहाँ लोग वंशवेल चलाने के लिए पुत्रमोह में फँसे रहते हैं, वहीं कृष्ण ने न केवल अपनी 8 पत्नियों, अपितु अपने 80 पुत्रों का स्वयं नाश कर संपूर्ण यदुवंश को नष्ट कर दिया। यह सब केवल कृष्ण ही नहीं, अपितु कृष्ण की मनमुक्त दशा को प्राप्त कर लेने वाला हर व्यक्ति कर सकता है।
(गुरु अर्पण)

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