सनातन संक्रांति : जिस ‘शरीर’ को आवश्यकता है श्रृंगार की, उसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं जाता…

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 24 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। सनातन संक्रांति आज छठी कड़ी की ओर अग्रसर होने जा रहा है। वैचारिक क्रांति के सूत्रधार युवाPRESS की ओर से सनातन संक्रांति नामक यह स्तंभ वर्तमान पीढ़ी को भारत की पुरातन-वैदिक-प्राचीन संस्कृति से जोड़ने के लिए गत 19 सितंबर, 2019 गुरुवार से आरंभ किया है और अब आज फिर गुरुवार को यह भाग 6 में प्रवेश करने जा रहा है। हमें आशा ही नहीं, अपितु विश्वास है कि हमारे सुधि पाठकों को प्रत्येक गुरुवार को इस सनातन संक्रांति स्तंभ की प्रतीक्षा रहती होगी, तो उनकी प्रतीक्षा को समाप्त करते हुए आज हम हर व्यक्ति का उसके उस शरीर से परिचय कराएँगे, जो उसे दिखाई नहीं देता, परंतु उसका दृश्यमान शरीर जो भी कर्म करता है, वह उसी अदृश्य यानी नहीं दिखाई देने वाले शरीर के कहने पर करता है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने मानव शरीर को रोगों से मुक्त करने-रखने के लिए कई उपाय खोजे हैं, परंतु हमारी वैदिक संस्कृति ने इस मानव शरीर की जड़ की स्वस्थता पर बल दिया है, जिससे दृश्यमान शरीर हर प्रकार के रोगों से मुक्त रह सकता है। वर्तमान युग में हर व्यक्ति स्वस्थ और निरोगी रहने के ढेरों उपाय करता है, तो सुंदर दिखाई देने के लिए भी दृश्यमान देह को भाँति-भाँति के श्रृंगारों से सजाया जाता है, परंतु यदि हम उस अदृश्य शरीर को सँवारने का यत्न आरंभ कर दें, तो बाह्य देह की स्वस्थता और सुंदरता की इस अंधी दौड़ से बहुत ही आसानी से बच सकते हैं। अदृश्य शरीर को अस्वस्थता से स्वस्थता और कुरूपता से सुंदरता की ओर ले जाया जाए, तो वही अदृश्य शरीर मनुष्य को न केवल दृश्यमान शरीर की रोगमुक्ति देगा, अपितु वह परम् पद की प्राप्ति भी कराएगा, जिसके लिए 84 लाख योनियों में से 83 लाख 99 हजार 999 योनियाँ तरसती हैं। यह परम् पद केवल और केवल मनुष्य योनि के लिए ही सुलभ है। पशु-पक्षी सहित सभी इतर योनियों, यहाँ तक कि देव योनि को भी इस परम् पद को प्राप्त करने के लिए मृत्युलोक में मनुष्य बन कर आना पड़ता है।

दृश्यमान देह ही व्यक्ति की मूल पहचान नहीं

मनुष्य योनि में हर व्यक्ति की पहचान उसके शरीर से होती है। ईश्वर ने सभी को अनादिकाल से अगण्य मनुष्यों को जन्म दिया, परंतु यह उसका ही चमत्कार है कि हर व्यक्ति को अलग चेहरे के साथ अलग पहचान दी। मनुष्य के अलावा अन्य योनियों के प्राणियों के बीच अंतर करना मुश्किल होता है, परंतु वह भी मनुष्य के लिए ही। प्राणी तो एक-दूसरे को पहचानते ही हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि ईश्वर ने मानव ही नहीं, सभी योनियों के प्राणियों में विविधता रखी है, ताकि वे एक-दूसरे को पहचान सकें। बात मानव की ही करें, तो हर व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को सबसे पहले तो उसके शारीरिक मुख-आकार से पहचानता है, परंतु यह किसी भी व्यक्ति की मूल पहचान नहीं हो सकती, क्योंकि ऊपर से दिखाई देने वाला भौतिक शरीर ही मनुष्य का मूल स्वरूप या मूल पहचान नहीं है। किसी भी व्यक्ति को अच्छी तरह पहचानने के लिए शारीरिक रूप-आकार से ऊपर उठ कर गुणों और कर्मों पर दृष्टि डालनी पड़ती है। उसी से किसी व्यक्ति के अच्छे या बुरे होने की पहचान होती है। शारीरिक रूप व आकार से परे गुण और कर्म किसी भी व्यक्ति के आचरण में तो देखे जा सकते हैं, परंतु वास्तव में ये होते कहाँ हैं ? इस प्रश्न का उत्तर है वही अदृश्य शरीर, जो दिखाई नहीं देता।

क्या और कैसा है वह अदृश्य शरीर ?

वर्तमान आधुनिक विश्व विकास, प्रगति, उन्नति, प्रौद्योगिकी, तकनीक, टेक्नोलॉजी, मोबाइल, इंटरनेट, जॉब, बिज़नेस, धनोपार्जन, प्रतिस्पर्धा जैसे कार्यों में लिप्त है और उसकी इस लिप्तता के पीछे मुख्य कारण आधुनिक विज्ञान की ओर से उपलब्ध कराई गई हर प्रकार की सुविधा है। व्यक्ति हर समय उस शरीर के सुख और वैभव के लिए पुरुषार्थ करता है, जो दिखाई तो देता है, परंतु सदैव रहने वाला नहीं है, जबकि वास्तविकता यह है कि मनुष्य को बाह्य देह की सुख-सुविधा-वैभव के लिए प्रेरित करने वाले अदृश्य देह को पहचानने की। आज की युवा पीढ़ी केवल दिखाई देने वाले शरीर को ही ‘मैं’ या ‘स्वयं’ समझती है और यही मानती है कि 4 से 6 फुट का जो शरीर उसे मिला है, वही वह है, जबकि वास्तविकता यह नहीं है। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि आपको ईश्वर ने इस पृथ्वी पर एक नहीं, अपितु चार शरीरों के साथ भेजा है। इनमें स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर और महाकारण शरीर। एक उदाहरण से समझिए कि कैसे ये चारों शरीर अलग-अलग हैं। एक सूती कुर्ता लीजिए। यह कुर्ता धागे से बना होता है और धागा रुई से बनता है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस कुर्ते में हर जगह-जगह रुई विद्यमान है, जो इसके निर्माण का मुख्य कारण है। यह रुई ही इस कुर्ते का कारण शरीर है। अब धागे की बात करते हैं। धागा रुई से बनता है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस कुर्ते में रुई (कारण शरीर) सूक्ष्म धागे के रूप में विद्यमान है। यदि रुई न होती, तो धागा न बनता अर्थात् इस कुर्ते का सूक्ष्म शरीर धागा हुआ। अब जो कुर्ता आपके हाथ में है, वह रुई (कारण शरीर) और धागे (सूक्ष्म शरीर) से तैयार हुआ है। कुर्ता तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है, परंतु उसमें व्याप्त रुई और धागे पर हमारी दृष्टि नहीं जाती। यह कुर्ता स्थूल शरीर है। इसी प्रकार मानव को लीजिए। दृश्यमान देह स्थूल शरीर है। उसे सक्रिय करते हैं हमारे मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन चारों से मिल कर बनी देह को सूक्ष्म शरीर कहते हैं। अब जिस तरह बिजली के एक तार में विद्यमान विद्युत से बल्ब, पंखा, एसी जैसे अलग-अलग साधन चलाए जा सकते हैं, उसी प्रकार हमारा सूक्ष्म शरीर आत्मा या चैतन्य रूपी विद्युत के प्रकाश में सारे कार्य करता है। इस प्रकार यह आत्मा या चैतन्य कहलाता है कारण शरीर। चौथे महाकारण शरीर की चर्चा हम फिर कभी करेंगे। आज आपको केवल सूक्ष्म शरीर के बारे में बताएँगे।

सूक्ष्म शरीर का श्रृंगार ही मुख्य ध्येय बनाएँ

सूक्ष्म शरीर दृश्यमान नहीं है, परंतु हर व्यक्ति को चलाता है, संचालित करता है, कार्यरत् करता है, सक्रिय करता है। सूक्ष्म शरीर स्थूल देह में ही होता है, परंतु दिखाई नहीं देता। यह जिन चार मुख्य अंगों मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार से बना होता है। अब यह तो आप भी अच्छी तरह समझते होंगे कि मन दिखाई नहीं देता, जबकि हम हर कर्म मन में उत्पन्न इच्छाओं की प्रेरणा से करते हैं। मन में इच्छा उत्पन्न होते ही बुद्धि उस इच्छा को पूर्ण करने की दिशा में काम करती है। वह इच्छा हमारे चित्त में इस तरह घर कर जाती है कि हम अहंकार रूपी ‘मैं’ भाव से उस इच्छा को पूर्ण करने के लिए कर्म करते हैं। यह ‘मैं’ भाव ही हमें हर कर्म (अच्छे या बुरे) का कर्ता बनाता है और उसी कारण हमें हर कर्म के (अच्छे या बुरे) परिणाम भुगतने पड़ते हैं, परंतु हमारे वेद-पुराणों, उपनिषदों और श्रीमद् भगवद् गीता में इस अच्छे या बुरे परिणाम से बचने और स्वस्थ यानी स्व में स्थित रहने के उपाय बताए गए हैं। इस सू्क्ष्म शरीर को स्वस्थ रखने का अर्थ है मन में विकारमुक्त विचार लाना बुद्धि में कुशाग्रता व सूक्ष्मता-तीव्रता लाकर उसे विवेकपूर्ण-विवेकशील बनाना, चित्त में पड़े सभी द्वंद्वों-भेदों को दूर करना और अहंकार से ‘देहरूपी मैं’ भाव हटा कर आत्मा रूपी ‘स्वयं’ या ‘मैं’ में स्थित होना। सूक्ष्म शरीर का इस तरह श्रृंगार किया जाए, तो व्यक्ति का हर कर्म आत्मा रूपी चैतन्य के प्रकाश में सूक्ष्म शरीर की सक्रियता से स्थूल देह के माध्यम से शुद्ध कर्म होगा।

मोक्ष का साधन-पुनर्जन्म का कारण दोनों बन सकता है सूक्ष्म शरीर

व्यक्ति स्थूल देह को ही सब कुछ मान बैठता है और इस देहाभिमान में वह संसार में हर कर्म करता है, परंतु सूक्ष्म शरीर के प्रति कभी ध्यान ही नहीं देता। यदि व्यक्ति आत्म-चिंतन करे, वैदिक शास्त्रों, वेदांत, श्रीमद् भगवद गीता और उपनिषदों का अध्ययन कर विवेक को जागृत करे तथा सद्गुरु की शरण ले, तो यही सूक्ष्म शरीर उसके लिए मोक्ष का सबसे बड़ा साधन बन सकता है। सूक्ष्म शरीर की शुद्धता के बाद ही व्यक्ति महाकारण शरीर की ओर प्रयाण करता है और उसे जान सकता है। महाकारण शरीर के बारे में हम अगली कड़ी में बताएँगे, परंतु सूक्ष्म शरीर को माध्यम बना कर व्यक्ति स्थूल देह के अभिमान से मुक्त होकर कारण शरीर की ओर अग्रसर हो सकता है, जिसके बाद उसे सहज समाधि, सविकल्प ब्रह्म और अंतत: निर्विकल्प ब्रह्म यानी स्वयं का साक्षात्कार हो सकता है, परंतु यदि व्यक्ति स्थूल देह, उससे जुड़े संबंधों, मोह-माया आदि में फँसा रहे और निर्लेप न रहते हुए संलिप्त होकर कर्म करता रहे, तो यही सूक्ष्म शरीर उसे मोक्ष पद से पदच्युत कर पुनर्जन्म की ओर ले जाता है।

कैसे-क्यों होता है पुनर्जन्म और सूक्ष्म शरीर की क्या है भूमिका ?

भारतीय वैदिक परम्परा और शास्त्रों के अनुसार किसी भी योनि में जन्म का कारण सूक्ष्म शरीर होता है। किसी इतर योनि के उदाहरण से समझने की बजाए मनुष्य योनि के उदाहरण से समझिए, क्योंकि यही वह योनि है, जो एक जंक्शन है, जहाँ से हर व्यक्ति अपनी आगामी यात्रा का निर्धारण कर सकता है। इतर योनियाँ यह नहीं कर सकतीं, क्योंकि उन तमाम योनियों के प्राणी अपने प्रारब्ध (भाग्य) कर्म के साथ जन्म लेते हैं और उन कर्मों को काटते-भोगते हुए मृत्यु को प्राप्त होकर अगले जन्म की यात्रा पर निकल जाते हैं, परंतु मनुष्य योनि ईश्वर की सबसे अनुपम रचना है, क्योंकि 83 लाख 99 हजार 999 योनियों के पास वह विवेक नहीं है, जो केवल और केवल मनुष्य के पास है, जिसके ज़रिए वह अपनी आगामी यात्रा का निर्धारण कर सकता है। इन अगली यात्राओं में (1) सत्कर्म कर पुन: मनुष्य के रूप में जन्म लेना (2) दुष्कर्म कर इतर योनि में जन्म लेना और (3) निष्काम कर्म कर मोक्ष पाते हुए जन्म-मृत्यु के चक्र से निकल जाना शामिल है। इन यात्राओं में सूक्ष्म शरीर की सर्वाधिक भूमिका होती है, क्योंकि हर व्यक्ति से जुड़े सत्कर्म-दुष्कर्म, इच्छाएँ, वासनाएँ, सुख-दु:ख, लाभालाभ, अभिमान, अहंकार, मान-सम्मान, यश-अपयश आदि का संग्रह इसी सूक्ष्म शरीर में रहता है। जब कोई व्यक्ति (मोक्ष पद की प्राप्ति किए बिना) देह त्याग करता है, तो उसका स्थूल शरीर निष्प्राण हो जाता है, परंतु वासनाओं से भरा हुआ सूक्ष्म शरीर नहीं मरता। स्थूल देह की मौत होती है, परंतु मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार से बना सूक्ष्म शरीर पूर्व जन्म और वर्तमान जीवनकाल की शेष-अधूरी रह गई इच्छाओं-वासनाओं को पूरा करने के लिए प्रारब्ध के अनुसार नई योनि में पुनर्जन्म लेकर नया शरीर धारण करता है। यह पुनर्जन्म सत्कर्म और दुष्कर्म दोनों ही तरह के कर्म करने वालों के लिए अवश्यंभावी है, परंतु जो व्यक्ति सूक्ष्म शरीर का शुद्धि श्रृंगार कर मुक्ति पद पा लेता है, वह न केवल स्थूल देह से भिन्न हो जाता है, अपितु सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर और महाकारण शरीर से भी परे होकर स्वयं में या परमात्मा में एकाकार हो जाता है। जब नए जन्म का कारण सूक्ष्म शरीर ही शेष नहीं रहा, तो ऐसे मुक्ति पद प्राप्त पुरुष या स्त्री का पुनर्जन्म नहीं होता।

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