सनातन संक्रांति : जब तक ‘किया’ जाए, तब तक ‘ध्यान’ नहीं है..!

* जो ‘निष्क्रिय-निष्कर्म’ कर्ता बनाए, वही है ध्यान

* जो समाधि से मोक्ष तक ले जाए, वही है ध्यान

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 7 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। वैचारिक क्रांति के सूत्रधार युवाPRESS का गुरुवारीय साप्ताहिक स्तंभ ‘सनातन संक्रांति’ आज भाग 8 पर पहुँच गया है। गत 19 सितंबर, 2019 को आरंभ किए गए ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ का उद्देश्य इसके शीर्षक में स्वत: निहित है। फिर भी हम पुन: स्मरण करा देते हैं कि ‘सनातन संक्रांति’ का उद्देश्य भारत की तथाकथित आधुनिक-वैज्ञानिक युग में जीने वाली और पौराणिक-प्राचीन-पुरातन सनातन वैदिक धर्म संस्कृति से विमुख हो चुकी पीढ़ी का पुन: उस सनातन धर्म में संक्रमण यानी प्रवेश कराना है, क्योंकि यह सनातन धर्म ही हर भारतीय को उसके मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में सर्वोच्च पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति कराने में सक्षम है। यहाँ पुन:-पुन: स्पष्ट करना चाहेंगे कि मोक्ष कभी-भी और किसी को भी मृत्यु के पश्चात नहीं, अपितु जीते-जी ही मिलता है। मोक्ष एक दशा है, एक अवस्था है, जिसमें जीवन यापन करने वाला कोई भी व्यक्ति कभी सुखी या दु:खी नहीं हो सकता। ऐसी अवस्था को प्राप्त व्यक्ति केवल आनंद और परमानंद में रहता है। इसी मोक्ष दशा को हमारे भारतीय अध्यात्म, भारतीय दर्शन में मुक्ति पद, जीवनमुक्त दशा, स्थितप्रज्ञ अवस्था, ज्ञानी (आत्म-ज्ञान, स्वयं को जानने वाला पुरुष) आदि जैसे शब्दों से भी संबोधित किया जाता है।

क्या है मोक्ष का शाब्दिक अर्थ ?

आइए सबसे पहले आपको समझाते हैं मोक्ष का शाब्दिक अर्थ। यह शब्द दो अक्षरों मो+क्ष से बना है। मो का अर्थ होता है मोह और क्ष का अर्थ होता क्षरण। जब किसी व्यक्ति के मन से सभी प्रकार के मोह का क्षरण हो जाता है, तभी वह मोक्ष पद को प्राप्त हो जाता है। जैसा कि श्रीमद् भगवद् गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अपने ज्ञान रूपी प्रकाश पुंज से अर्जुन का मोह नष्ट किया था और उसे मुक्ति पद प्रदान किया था। ऐसा नहीं है कि अर्जुन द्वापर युग में ही हुआ था। द्वापर युग से पूर्व भी कई अर्जुन हुए और पश्चात भी अर्जुनों के अंबार लगे हुए हैं, जो मोह से बुरी-पूरी तरह बंधे हुए हैं। मोह की बेड़ियाँ इतनी भयावह होती हैं, जो व्यक्ति को निरंतर गर्भाग्नि में तपाती-पकाती-झुलसाती है, परंतु इसके बावजूद इन बेड़ियों से व्यक्ति स्वयं को स्वतंत्र नहीं कर पाता, जबकि वास्तविकता और घोर आश्चर्यजनक सत्य यह है कि मोह की इन भयावह बेड़ियों में व्यक्ति को किसी ने बांधा नहीं है, अपितु वह स्वयं इन बेड़ियों से बंधा हुआ है और इससे भी बड़ा घोर आश्चर्य यह है कि व्यक्ति को इस बात का आभास तक नहीं है कि वह बेड़ियों में बंधा हुआ है, जो उसे जीवन भर कभी सुख, तो कभी दु:ख के चक्र में उलझाए रखती है।

तो अनमोल मानव जीवन का उद्देश्य समझ में आ जाए

आज के आधुनिक युग में लोगों के पास पूरी दुनिया के लिए समय है, परंतु स्वयं के लिए समय नहीं है। हमारा देश भी पश्चिमी संस्कृति में रंगता जा रहा है और स्वयं से दूर होता जा रहा है। किसी के पास कुछ क्षण स्वयं के साथ बिताने का समय ही नहीं है। हर व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से शांति, संतोष, सुख, धन, वैभव, काम आदि की अपेक्षाएँ करता है, जबकि वह इस बात से पूरी तरह अनजान है कि वह स्वयं की ओर यात्रा करे, तो उसे वह सब कुछ सहज ही मिल सकता है, जिसके लिए वह भारी परिश्रम कर रहा है। जीवन भर बैल की तरह बोझा ढोकर मोह के बंधन से बंधे संबंधियों के लिए ही जीवन यापन करने वाला व्यक्ति जब मृत्युशैय्या पर जाता है, तब सोचता है, ‘मैं क्यों आया था इस दुनिया में ? मैंने क्या पाया ? मैं क्या साथ लेकर जा रहा हूँ ?’ यह वैराग्य अक्सर श्मशान में भी कई लोगों के मन में जागता है, जब जलती चिता को देख कर लोग कहते हैं, ‘एक दिन हमें भी लोग इसी तरह जला देंगे।’ परंतु मृत्युशैय्या वाला वैराग्य तो तुणीर से निकल चुके बाण की तरह व्यर्थ है। यद्यपि श्मशान वैराग्य यदि श्मशान के बाहर आकर व्यक्ति के विवेक को झकझोर दे, तो उसे न केवल मोह से मुक्ति मिल सकती है, अपितु उसे अमूल्य मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य ‘मोक्ष’ की प्राप्ति का भी भान हो सकता है। बस, व्यक्ति के मन में यह विवेकपूर्ण प्रश्न जागना चाहिए कि अंतत: उसे यह जीवन मिला क्यों है ? वह कौन ? क्या वह जो दिखाई देता है, वही है या फिर वह वह है, जो उसे देखना नहीं चाहता ? इन प्रश्नों के बिजली की तरह कौंधते ही व्यक्ति तत्काल अपने मन का रवैया बदल सकता है और सुख-दु:ख के जनक मोह के क्षरण यानी मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है और जैसे ही व्यक्ति वास्तविक स्वयं को जानने की जिज्ञासा मन में पैदा करता है, उस जिज्ञासा को शांत करने का मार्ग भी उसे मिल जाता है सद्गुरु के रूप में। सद्गुरु को कहीं ढूंढने जाने की आवश्यकता नहीं है, बस व्यक्ति को मोक्ष पुरुषार्थ आरंभ करने की आवश्यकता है। यह पुरुषार्थ आरंभ करते ही सद्गुरु के घर का पता स्वत: ही मिल जाता है।

मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण सोपान ध्यान कोई क्रिया नहीं

अब आते हैं शीर्षक पर। जब व्यक्ति में विवेक और वैराग्य जागता है, तो वह कोई असाधारण व्यक्ति नहीं बन जाता। वह साधारण मनुष्य की तरह ही सब कर्म करता है और गुरु के दिखाए मार्ग पर चलते हुए अंतत: मोक्ष को प्राप्त होता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए हमारे देश में कई महापुरुषों ने घर छोड़ा, महल छोड़ा, संन्यास लिया, भगवा धारण किया, हिमालय की शरण ली और उन्हें मुक्ति मिली भी, परंतु आधुनिक युग में ऐसा कोई कठोर कदम उठाने की आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि मोक्ष प्राप्ति के लिए कोई शर्त नहीं है। यह बिना शर्त प्राप्त होता है, बस आवश्यकता होती है शरणागति की। जब कोई मोक्ष की इच्छा रखने वाला मुमुक्षु अपने गुरु की पूर्ण शरणागति स्वीकार लेता है, तो गुरु उसे मोक्ष प्राप्ति के लिए कई मार्ग बताते हैं। आज हम ऐसे ही कई मार्गों में से एक ध्यान के विषय में फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास करने जा रहे हैं। वास्तव में हमारे शास्त्रों में मोक्ष प्राप्ति के लिए अष्टांग योग साधना का उल्लेख है और इस अष्टांग योग का आठवाँ अंग ध्यान है। एक मात्र ध्यान ही ऐसा तत्व है कि उसे साधने से सभी स्वत: ही सधने लगते हैं। ‘तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम।। 3-2 ।।’-योगसूत्र अर्थात जहाँ चित्त को लगाया जाए, उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, परंतु ध्यान का अर्थ है जहाँ भी चित्त ठहरा हुआ है, उसमें वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। उसमें जागृत रहना ही ध्यान है। महान संत ओशो रजनीश के अनुसार ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है, जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, परंतु ध्यान उस बल्ब की तरह है, जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। साधारणत: किसी सामान्य व्यक्ति का ध्यान बहुत कम वॉट का हो सकता है, परंतु योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है, जहाँ ब्रह्मांड के सारे रहस्य खुल जाते हैं। बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं- जैसे सुदर्शन क्रिया, भावातीत ध्यान क्रिया और सहज योग ध्यान। दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है। बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की क्रांतिकारी विधियाँ बताते हैं, परंतु वे यह नहीं बताते कि विधि और ध्यान में अंतर है। क्रिया और ध्यान में अंतर है। क्रिया तो साधन है, साध्य नहीं। क्रिया तो झाड़ू की तरह है। आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पाँच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो। यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है।

क्रियाओं से मुक्ति ही वास्तविक ध्यान

हमारे मन में एक साथ असंख्य कल्पना और विचार चलते रहते हैं। इससे मन-मस्तिष्क में कोलाहल-सा बना रहता है। हम नहीं चाहते, फिर भी यह चलता रहता है। आप लगातार सोच-सोचकर स्वयं को कम और कमज़ोर करते जा रहे हैं। वास्तव में अनावश्यक कल्पनाओं व विचारों को मन से हटा कर शुद्ध और निर्मल मौन में चले जाना ही वास्तविक ध्यान है, जहाँ कोई क्रिया होने की संभावना नहीं रहती। ध्यान जैसे-जैसे गहराता है, व्यक्ति साक्षी भाव में स्थित होने लगता है। उस पर किसी भी भाव, कल्पना और विचारों का क्षण मात्र और लेस मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता। मन और मस्तिष्क का मौन हो जाना ही ध्यान का प्राथमिक स्वरूप है। विचार, कल्पना और अतीत के सुख-दु:ख में जीना ध्यान के विरुद्ध है। ध्यान में इंद्रियाँ मन के साथ, मन बुद्धि के साथ और बुद्धि अपने स्वरूप आत्मा में लीन होने लगती है। जिन्हें साक्षी या दृष्टा भाव समझ में नहीं आता, उन्हें प्रारंभ में ध्यान का अभ्यास आंखें बंद करने करना चाहिए। फिर अभ्यास बढ़ जाने पर आंखें बंद हों या खुलीं, साधक अपने स्वरूप के साथ ही जुड़ा रहता है और अंतत: वह साक्षी भाव में स्थित होकर संसार के सभी कर्तव्य कर्म करते हुए भी ध्यान की अवस्था में रह सकता है। ध्यान की यह उच्चतम् अवस्था धीरे-धीरे साधक को समाधि अवस्था की ओर ले जाती है। समाधि से तात्पर्य किसी संत-महात्मा, राजनेता की निर्वाण स्थली या स्मारक स्तंभ नहीं है। समाधि भी मोक्ष से पहले की और ध्यान के बाद की एक महत्वपूर्ण अवस्था है। समाधि की अवस्था भी जीवित व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है। मृत्यु के बाद बनाई जाने वाली समाधियाँ केवल और केवल स्मृतियाँ या स्मारक हैं। समाधि शब्द सम+अधि अक्षरों से बना है अर्थात् अधिष्ठान (आत्मा) के साथ सम हो जाना ही समाधि है। ध्यान से समाधि अवस्था को प्राप्त करने वाला व्यक्ति सद्गुरु के मार्गदर्शन में धीरे-धीरे सविकल्प समाधि और निर्विकल्प समाधि की ओर बढ़ता है और अंतत: मुक्ति पद को प्राप्त होता है। ध्यान के अगले चरण समाधि पर अगली कड़ी में प्रकाश डालेंगे। फिलहाल मोक्ष की इच्छा रखने वालों को ध्यान की यह वास्तविक पद्धति सीख लेनी चाहिए और विभिन्न क्रियाओं में न उलझ कर वास्तविक ध्यान करना चाहिए, जो एक दिन मुक्ति पद प्रदान करता है।

पाठकों के प्रश्नों का स्वागत

‘सनातन संक्रांति’ नामक यह स्तंभ निरंतर ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाएगा और आगे भी इसमें मानव जीवन के कई गूढ़ रहस्यों और अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति तक के मार्ग को दिखाने के प्रयास किए जाएँगे। इस भाग में जो बातें कही गई हैं, उसे लेकर किसी भी पाठक के मन में कोई प्रश्न हो, तो उसका युवाप्रेस.कॉम स्वागत करता है। हर पाठक के हर प्रश्न का गुरु कृपा से सटीक उत्तर देने का प्रयास किया जाएगा। पाठक इस आलेख से जुड़े या अध्यात्म से जुड़े किसी भी प्रश्न को इन ई-मेल आईडी founder@iksharma.com, iksharmadotcom@gmail.com, kanhaiyyaa@gmail.com अथवा वॉट्सएप नंबर 9998953281 पर भेज सकते हैं। उनके प्रश्नों का ‘सनातन संक्रांति’ की अगली श्रृंखलाओं में उत्तर देने का पूर्ण निष्ठा से प्रयास किया जाएगा।

(गुरु अर्पण)

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