आ अब लौट चलें : पत्नी हो तो रत्नावली जैसी, जिनके एक कटाक्ष ने साधारण युवक को महान संत तुलसीदास बना दिया

* तुलसीदास को महिला विरोधी बताने वाले लोग ‘अपूर्ण’

* अवधी भाषा में ताड़न का अर्थ परखना या पहचानना होता है

* जन्म के बाद पहला शब्द राम बोले और नाम पड़ गया ‘रामबोले’

* पत्नी के एक ताने ने रामबोले को महान संत तुलसीदास बनाया

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 23 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। देश में इस समय अयोध्या में भगवान श्री राम की जन्म भूमि, जन्म स्थान और वहाँ मंदिर बनाने का मुद्दा चर्चा में है। उच्चतम् न्यायालय (SC) इस पूरे प्रकरण की सुनवाई पूर्ण कर चुका है और 17 नवम्बर, 2019 से पहले कोई निर्णय आने की संभावना है। अयोध्या में भगवान श्री राम के जन्म स्थान को लेकर चल रहे वैधानिक विवाद के बीच समाचार माध्यमों विशेषकर टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों पर भगवान राम को लेकर विशेष रूप से चर्चाएँ हो रही हैं। इन चर्चाओं में कई बार वेद-पुराण-उपनिषदों से लेकर रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि और आधुनिक रामायण ‘रामचरितमानस’ के रचयिता गोस्वामी संत तुलसीदास का भी उल्लेख होता है। ऐसा कई बार देखा और सुना गया है कि टीवी पर डिबेट करने बैठे कुछ लोग राम मंदिर मुद्दे पर चर्चा करते-करते विषय से भटक जाते हैं और संत तुलसीदास की एक चौपाई को आधार बना कर उन्हें नारी विरोधी ठहरा देते हैं, परंतु प्रश्न यह उठते हैं कि क्या ‘एक नारिब्रतरत सब झारी। ते मन बच क्रम पतिहितकारी।’ के माध्यम से पुरुष के विशेषाधिकारों को न मान कर दोनों को समान रूप से एक ही व्रत पालने का आदेश देने वाले संत तुलसीदास नारी विरोधी हो सकते हैं ? सीता का परम आदर्शवादी महिला के रूप में एवं उनकी नैतिकता का चित्रण, उर्मिला के विरह और त्याग का चित्रण, यहाँ तक कि लंकापति रावण की पत्नी मंदोदरी और महिला असुर त्रिजटा का सकारात्मक चित्रण करने वाले संत तुलसीदास नारी विरोधी हो सकते हैं ?

वास्तव में रामचरितमानस में तुलसीदास की जिस चौपाई को आधार बना कर जो लोग उन्हें नारी विरोधी ठहराने की कुचेष्टा करते हैं, वे अपूर्ण-अधूरे ज्ञानी हैं। आइए पहले आपको तुलसीदास की वह चौपाई बताते हैं, जिसे लेकर अक्सर तुलसीदास को घेरा जाता है। यह चौपाई है : ‘ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी-ये सब ताड़न के अधिकारी’। तुलसीदास की यह चौपाई 445 वर्षों से अधिक पुरानी है। तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना का आरंभ विक्रम संवत् 1631 (ईसवी सन् 1574) में किया था और 2 वर्ष 7 माह 26 दिनों के बाद विक्रम संवत 1633 (ईस्वी सन् 1576) में यह रचना पूर्ण हुई थी। यह वह कालखंड था, जब भारत में हिन्दी पूर्णत: विकसित नहीं हुई थी। यह वह काल था, जब उत्तर भारत में संस्कृत, अवधी, मागधी, अर्धमागधी जैसी भाषाएँ प्रचलित थीं। रामचरितमानस ग्रंथ की चौपाई ‘ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी-ये सब ताड़न के अधिकारी’ में जिस ‘ताड़न’ शब्द के कारण तुलसीदास को महिला और शूद्र विरोधी ठहराया जाता है, वह ताड़न शब्द वास्तव में अवधी भाषा का है। वर्तमान विकसित हिन्दी में ताड़न के अर्थ को प्रताड़ना, यातना के साथ जोड़ा जाता है, परंतु तुलसीदास की चोपाई में जिस ‘ताड़न’ शब्द का उल्लेख है, उसका अवधी भाषा में अर्थ होता है ‘पहचानना’ या ‘परखना’। इस प्रकार तुलसीदासजी इस चौपाई में नारी या शूद्र विरोध नहीं कर रहे, अपितु उन्हें परखने का संदेश दे रहे हैं।

तुलसीदास की चौपाई का यह है पूरा और वास्तविक अर्थ

‘ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी-ये सब ताड़न के अधिकारी’। रामचरितमानस ने इस चौपाई को रामायण के उस प्रसंग के समय लिखी है, जब भगवान श्री राम की याचना के बावज़ूद सागर उन्हें लंका जाने का मार्ग नहीं देता। जब श्री राम क्रोधित हो गए और अपने तुणीर से बाण निकाला, तो समुद्र देव श्री राम के चरणो मे आए और श्री राम से क्षमा मांगते हुये अनुनय करते हुए कहने लगे, ‘हे प्रभु, आपने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी। तुलसीदास ने इस चौपाई में उल्लेखित चार शब्दों में सागर को गँवार की संज्ञा दी, जो विशेष ध्यान रखने यानी शिक्षा देने के योग्य होते है। इसी प्रकार ढोल को यदि परखे बिना बजाया जाए, तो वह बेसुरा बजेगा। शूद्र के व्यवहार को परख कर ही उसके साथ जीवन यापन संभव हो सकता है। पशु को ताड़ने का अर्थ प्रताड़ना नहीं हो सकता, क्योंकि यदि पशु को प्रताड़ित किया जाए, तो वह मानव के वश में नहीं रह सकता। ताड़न का अर्थ है परखना। जैसे हाथी-घोड़े-गाय आदि को परख कर ही उन्हें अपने वश में रखा जा सकता है। रही बात नारी की, तो नारी भी इसलिए ताड़न की अधिकारी है, क्योंकि किसी भी नारी को जब तक परखा न जाए, उसे समझा न जाए, तब तक उसके साथ जीवन यापन करना संभव नहीं है।

क्यों स्मरण कर रहे हैं हम तुलसी को ?

वैचारिक क्रांति के मंच ‘युवाPRESS’ की ओर से गत 9 अक्टूबर, 2019 को आरंभ किए गए ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ की आज तीसरी कड़ी में हम भारत के महान संत गोस्वामी तुलसीदास का आज की युवा पीढ़ी से परिचय कराने जा रहे हैं, क्योंकि आज उनका 387वाँ अंतर्ध्यान दिवस है। 23 अक्टूबर, 1623 को भारत सहित समग्र विश्व को रामचरितमानस सहित कई उपयोगी ग्रंथ देने वाले संत तुलसीदास का निर्वाण हुआ था। तुलसीदास का जन्म विक्रम संवत् 1589 में श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी (ईस्वी सन् 1532) के दिन उत्तर प्रदेश के राजापुर (वर्तमान बांदा) नामक ग्राम में हुआ था। पिता आत्माराम दुबे और माता हुलसी के पुत्र तुलसीदास हिन्दी साहित्य के आकाश के परम नक्षत्र, भक्तिकाल की सगुण धारा की रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि है। तुलसीदास एक साथ कवि, भक्त तथा समाज सुधारक तीनों रूपों में मान्य है। श्रीराम को समर्पित ग्रन्थ श्रीरामचरितमानस वाल्मीकि रामायण का प्रकारान्तर से ऐसा अवधी भाषान्तर है, जिसमें अन्य भी कई कृतियों से महत्वपूर्ण सामग्री समाहित की गयी थी। श्रीरामचरितमानस को समस्त उत्तर भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। इसके बाद विनय पत्रिका तुलसीदासकृत एक अन्य महत्वपूर्ण काव्य है। तुलसीदास ने अपने 91 वर्षों के जीवनकाल में रामचरितमानस, दोहावली, कवितावली, गीतावली, विनय पत्रिका, कृष्ण गीतावली, रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी, रामाज्ञा प्रश्न, जानकी मंगल, सतसई, पार्वती मंगल, बरवै रामायण और हनुमान चालीसा जैसे गद्य-पद्य ग्रंथों की रचना की। उनके देह निर्वाण पर भी एक चौपाई बनी है : ‘संवत सोलह सौ असी, असी गंग के तीर। श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर।।’

पत्नी के एक कटाक्ष ने बनाया महान संत

ब्राह्मण परिवार में जन्मे तुलसीदास के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जन्म के बाद प्रथम शब्द राम का उच्चारण किया था। इसी कारण इनका नाम रामबोले पड़ गया। बचपन से ही तुलसीदास का मन पूजा-पाठ में अधिक था। इनकी अल्पायु में किसी को तनिक भी अभास नहीं हो सकता था कि वे एक दिन भगवान राम के सबसे बड़े आधुनिक भक्त कहलाएँगे। यद्यपि जिस प्रकार हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है, ठीक ऐसा ही तुलसीदास के साथ भी हुआ। रामबोले को संत तुलसीदास बनाने का श्रेय उनकी पत्नी रत्नावली को दिया जा सकता है। तुलसीदास का विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। तुलसीदास पत्नी रत्नावली से अत्यधिक प्रेम करते थे, परंतु रत्नावली ने तुलसीदास को प्रेम और मोह के बीच का अंतर समझाया। हुआ यूँ कि नई-नई दुल्हन बन कर आई रत्नावली मायके गई हुई थी। रत्नावली के बिना तुलसीदास को घर में न नींद आ रही थी, न चैन। इसी कारण तुलसीदास देर रात अपने घर से निकल पड़े और रत्नावली से मिलने अपने ससुराल पहुँच गए। तुलसीदास चुपचाप रत्नावली के कमरे में दाखिल हुए, तब रत्नावली ने बहुत ही तीखा कटाक्ष किया, ‘लाज न आई आपको, दौरे आएहु नाथ। अस्थि चर्ममय देह यह, ता सौं ऐसी प्रीति ता। नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत बीता।’ अर्थात् रत्नावली ने तुलसीदास से कहा, ‘इतनी रात गए चुपचाप मेरे मायके आने में आपको लाज नहीं आई। हड्डी-चमड़ी की इस देह की बजाए राम से इतनी प्रीति करते, तो भव पार उतर जाते।’ रत्नावली के इन शब्दों ने तुलसीदास के जीवन की दिशा ही बदल डाली और वे राम भक्ति में ऐसे डूबे कि उनके अनन्य भक्त बन गए। इस तरह पत्नी के एक ताने ने साधारण रामबोले को महान संत बनने की ओर अग्रसर किया।

दीक्षा से आरंभ हुई ‘हरि कथा अनंता’

कहते हैं कि भगवान शंकर की प्रेरणा से रामशैल पर रहने वाले श्री अनंतानंदजी के प्रिय शिष्य नरहर्यानंदजी (नरहरि बाबा) रामबोले की खोज में निकले और उन्हें ढूँढ निकाला। नरहरि बाबा ने ही तुलसीदास का नाम रामबोले रखा। नरहरि बाबा 29 वर्षीय तुलसीदास को लेकर अयोध्या पहुँचे और विक्रम संवत 1561 में माघ शुक्ल पंचमी शुक्रवार को उन्हें दीक्षा दी। बिना सिखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मन्त्र का उच्चारण किया, जिसे देखकर सब लोग चकित हो गये। इसके बाद नरहरि स्वामी ने वैष्णवों के पाँच संस्कार करके रामबोला को राममन्त्र की दीक्षा दी और अयोध्या ही में रहकर उन्हें विद्याध्ययन कराने लगे। बालक रामबोला की बुद्धि बड़ी प्रखर थी। एक बार गुरुमुख से जो सुन लेते थे, उन्हें वह कंठस्थ हो जाता था। वहाँ से कुछ दिन बाद गुरु-शिष्य दोनों शूकरक्षेत्र (सोरों) पहुँचे। वहाँ श्री नरहरि जी ने तुलसीदास को रामचरित सुनाया। कुछ दिन बाद वह काशी चले आये। काशी में शेषसनातन जी के पास रहकर तुलसीदास ने पन्द्रह वर्ष तक वेद-वेदांग का अध्ययन किया। इधर उनकी लोकवासना कुछ जाग्रत्‌ हो उठी और अपने विद्यागुरु से आज्ञा लेकर वे अपनी जन्मभूमि को लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने देखा कि उनका परिवार सब नष्ट हो चुका है। उन्होंने विधिपूर्वक अपने पिता आदि का श्राद्ध किया और वहीं रहकर लोगों को भगवान राम की कथा सुनाने लगे। इधर पण्डितों ने जब यह बात सुनी तो उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। वे दल बाँधकर तुलसीदास जी की निन्दा करने लगे और उस पुस्तक को नष्ट कर देने का प्रयत्न करने लगे। उन्होंने पुस्तक चुराने के लिये दो चोर भेजे। चोरों ने जाकर देखा कि तुलसीदास जी की कुटी के आसपास दो वीर धनुषबाण लिये पहरा दे रहे हैं। वे बड़े ही सुन्दर श्याम और गौर वर्ण के थे। उनके दर्शन से चोरों की बुद्धि शुद्ध हो गयी। उन्होंने उसी समय से चोरी करना छोड़ दिया और भजन में लग गये। तुलसीदास जी ने अपने लिये भगवान को कष्ट हुआ जान कुटी का सारा समान लुटा दिया, पुस्तक अपने मित्र टोडरमल के यहाँ रख दी। इसके बाद उन्होंने एक दूसरी प्रति लिखी। उसी के आधार पर दूसरी प्रतिलिपियाँ तैयार की जाने लगीं। पुस्तक का प्रचार दिनों दिन बढ़ने लगा। इधर पण्डितों ने और कोई उपाय न देख श्रीमधुसूदन सरस्वती जी को उस पुस्तक को देखने की प्रेरणा की। श्रीमधुसूदन सरस्वती जी ने उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की और उस पर यह सम्मति लिख दी-

आनन्दकानने ह्यास्मिञ्जङ्गमस्तुलसीतरुः।
कवितामञ्जरी भाति रामभ्रमरभूषिता॥

निर्धनता और कष्टों से भरे जीवन में जगाई राम धुन

इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी तथा अयोध्या में बीता। तुलसीदास का बचपन बड़े कष्टों में बीता। माता-पिता दोनों चल बसे और इन्हें भीख मांगकर अपना पेट पालना पड़ा था। इसी बीच इनका परिचय राम-भक्त साधुओं से हुआ और इन्हें ज्ञानार्जन का अनुपम अवसर मिल गया। पत्नी के व्यंग्यबाणों से विरक्त होने की लोकप्रचलित कथा को कोई प्रमाण नहीं मिलता। तुलसी भ्रमण करते रहे और इस प्रकार समाज की तत्कालीन स्थिति से इनका सीधा संपर्क हुआ। इसी दीर्घकालीन अनुभव और अध्ययन का परिणाम तुलसी की अमूल्य कृतियां हैं, जो उस समय के भारतीय समाज के लिए तो उन्नायक सिद्ध हुई ही, आज भी जीवन को मर्यादित करने के लिए उतनी ही उपयोगी हैं। तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 39 बताई जाती है। इनमें रामचरित मानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली, गीतावली, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अपने 91 वर्ष के दीर्घ जीवन-काल में तुलसीदास जी ने कुल 22 कृतियों की रचना की है जिनमें से पाँच बड़ी एवं छः मध्यम श्रेणी में आती हैं। इन्हें संस्कृत विद्वान् होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है। तुलसीदास जी को महर्षि वाल्मीकि का भी अवतार माना जाता है जो मूल आदिकाव्य रामायण के रचयिता थे। उनकी अंतिम कृति विनय पत्रिका थी।

चाहते तो सम्प्रदाय चला सकते थे, परंतु…

उनकी यह अद्भुत पोथी इतनी लोकप्रिय है कि मूर्ख से लेकर महापण्डित तक के हाथों में आदर से स्थान पाती है। उस समय की सारी शंक्काओं का रामचरितमानस में उत्तर है। अकेले इस ग्रन्थ को लेकर यदि गोस्वामी तुलसीदास चाहते तो अपना अत्यन्त विशाल और शक्तिशाली सम्प्रदाय चला सकते थे। यह एक सौभाग्य की बात है कि आज यही एक ग्रन्थ है, जो साम्प्रदायिकता की सीमाओं को लाँघकर सारे देश में व्यापक और सभी मत-मतान्तरों को पूर्णतया मान्य है। सबको एक सूत्र में ग्रंथित करने का जो काम पहले शंकराचार्य स्वामी ने किया, वही अपने युग में और उसके पीछे आज भी गोस्वामी तुलसीदास ने किया। रामचरितमानस की कथा का आरम्भ ही उन शंकाओं से होता है जो कबीरदास की साखी पर पुराने विचार वालों के मन में उठती हैं। तुलसीदासजी स्वामी रामानन्द की शिष्यपरम्परा में थे, जो रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत सम्प्रदाय के अन्तर्भुक्त है, परन्तु गोस्वामीजी की प्रवृत्ति साम्प्रदायिक न थी। उनके ग्रन्थों में अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का सुन्दर समन्वय पाया जाता है। इसी प्रकार वैष्णव, शैव, शाक्त आदि साम्प्रदायिक भावनाओं और पूजापद्धतियों का समन्वय भी उनकी रचनाओं में पाया जाता है। वे आदर्श समुच्चयवादी सन्त कवि थे।

राम और भक्त हनुमान ने दिए थे साक्षात् दर्शन

ऐसी मान्यता है कि तुलसीदास को हनुमान, भगवान राम-लक्ष्मण और शिव-पार्वतीजी के साक्षात दर्शन प्राप्त हुए थे। अपनी यात्रा के समय तुलसीदास जी को काशी में एक प्रेत मिला, जिसने उन्हें हनुमानजी का पता बताया। हनुमानजी के दर्शन करने के बाद तुलसीदास ने भगवान राम के दर्शन कराने की प्रार्थना की। इसके बाद उन्हें भगवान राम के दर्शन हुए, परंतु वे भगवान को पहचान नहीं सके। इसके बाद फिर मौनी अमावस्या के दिन पुन: भगवान श्रीराम के दर्शन हुए। भगवान राम ने बालक रूप में आकर तुलसीदास से कहा, ‘बाबा !
हमें चंदन चाहिये। क्या आप हमें चंदन दे सकते हैं ?’ हनुमान ‌जी ने सोचा कि कहीं तुलसीदास इस बार भी धोखा न खा जायें। इसलिये उन्होंने तोते का रूप धारण कर दोहे में बोल कर इशारा किया।

चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर।
तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥

तुलसीदास श्रीराम जी की उस अद्भुत छवि को निहार कर अपने शरीर की सुध-बुध ही भूल गए। भगवान ने स्वयं अपने हाथ से चंदन लेकर अपने तथा तुलसीदास जी के मस्तक पर लगाया और अन्तर्ध्यान हो गए।

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