संभल जा ऐ इंसान ! यह समुद्र धरती ही नहीं, तेरे अस्तित्व को भी निगल जाएगा…

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 20 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। प्रकृति और पर्यावरण के प्रति असंवेदनशील मानवीय व्यवहार भारत सहित पूरे विश्व को एक दिन विनाशकारी प्रलय में समा लेगा। पाँच भूतों से संचालित समूची जीव सृष्टि एकमात्र मानव के दुराचरण के कारण एक दिन नष्ट हो जाएगी। विभिन्न अध्ययन और सरकारी आँकड़े बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि इंसान अब भी नहीं संभला, तो समूची जीव सृष्टि को संचालित करने वाले पाँच भूतों पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु का बिगड़ता सामंजस्य एक दिन इस सीमा तक निरंकुश हो जाएगा कि यह धरती इंसान तो क्या, किसी भी जीव के लिए जीने योग्य नहीं रहेगी।

प्रकृति और पर्यावरण को लेकर पूरा विश्व चिंताएँ तो जताता है, परंतु दूसरी ओर उनका दोहन भी निरंतर करता ही जा रहा है। यही कारण है कि आज जलवायु परिवर्तन (CLIMATE CHANGE) और वैश्विक तापमान में वृद्धि (GLOBAL WARMING) ने समूचे विश्व को अनपेक्षित-अप्रत्याशित संकटों में डाल रखा है। कहीं बेमौसम भारी वर्षा व बाढ़, कहीं चक्रवात और बर्फीले तूफान, कहीं भीषण गर्मी तथा अकाल जैसे संकटों से समूची मानव जाति जूझ रही है। ये सारे संकट केवल संकट नहीं हैं, अपितु भविष्य में आने वाले महासंकटों के संकेत भी हैं और भारत भी प्राकृतिक असंतुलन के कारण जन्मे इन संकटों से अछूता नहीं है।

मर्यादा लांघता समुद्र धरती को लील रहा

बात भारत की करें, तो त्रेता युग में भगवान श्री राम ने श्रीलंका जाने के लिए समुद्र से रास्ता मांगा था, परंतु स्वयं साक्षात् ईश्वर की प्रार्थना पर भी समुद्र मर्यादा लांघने को सज्ज नहीं था। भगवान राम को तो असुरराज रावण के वध का शुभ कार्य करना था, जिसके लिए बाद में समुद्र ने प्रभु राम को मार्ग दे दिया था, परंतु आज का मानव तो स्वयं असुर वृत्ति का बन गया है और यही कारण है कि समुद्र अपनी मर्यादा लांघने को विवश हो गया है। भारत तीन तरफ से समुद्र से सटा हुआ है और यही कारण है कि ताप, शीत और वर्षा का वरदान देने वाला समुद्र धीरे-धीरे भारत के लिए भी संकट के संकेत दे दा रहा है। यह बात मंगलवार को राज्यसभा में सरकार की ओर से प्रस्तुत किए कुछ आँकड़ों से उभर कर सामने आई है, जिसके अनुसार भारत में प्रमुख बंदरगाहों के तटों पर समुद्र का जल स्तर तेजी से बढ़ रहा है। केन्द्रीय वन, पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन मंत्री बाबुल सुप्रियो ने राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि भारत में समुद्री जल स्तर पिछले 50 वर्षों में 8.5 सेंटीमीटर तक बढ़ा है और यह प्रतिवर्ष 1.7 मिलीमीटर की गति से बढ़ रहा है। सुप्रियो के इस उत्तर में भारत में समुद्र के मर्यादा लांघने के स्पष्ट संकेत छिपे हुए हैं, जिससे आने वाले भविष्य में भयंकर प्राकृतिक असंतुलन और उससे उत्पन्न होने वाली भारी वर्षा, बाढ़, चक्रवात, सुनामी, भूकंप, भीषण गर्मी और अकाल जैसी आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है।

डायमंड हार्बर और कंडला में निरंकुश होता समुद्र

सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश के 10 प्रमुख बंदरगाहों में कोलकाता के डायमंड हार्बर में सबसे तेजी से समुद्री जल स्तर बढ़ा है। डायमंड हार्बर बंदरगाह पर प्रतिवर्ष 5.2 मिलीमीटर की गति से समुद्र धरती को निगल रहा है, तो गुजरात में कच्छ स्थित कंडला बंदरगाह दूसरे स्थान पर है, जहाँ समुद्री जल स्तर प्रति वर्ष 5.16 मिलीमीटर की गति से बढ़ रहा है। यही स्थिति पोर्टब्लेयर और ओखा बंदरगाह की है, जहाँ क्रमश: 2.2 मिलीमीटर व 1.5 मिलीमीटर की गति से प्रतिवर्ष समुद्र जल स्तर बढ़ रहा है। इसी प्रकार हल्दिया में 2.9, पारादीप में 1, कोच्चिं में 1.3, विज़ाग में 0.9, मुंबई में 0.7 और चेन्नई में 0.3 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की गति से समुद्री जल स्तर का बढ़ना भारत के लिए गंभीर चेतावनी है।

तो डूब जाएँगे तटवर्ती निचले क्षेत्र

समुद्र के जल स्तर बढ़ने पर केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा, ‘भारतीय तट पर समुद्र के जल स्तर में प्रतिवर्ष औसतन 1.70 मिमी की वृद्धि होती है। मोटे तौर पर इसे समझ सकते हैं कि बीते 50 साल में भारतीय तट पर समुद्र के जल स्तर में 8.5 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है।’ केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो ने यह भी कहा कि समुद्री जल स्तर में वृद्धि से सुनामी, तूफान, तटीय बाढ़ और तट क्षेत्र के क्षरण के दौरान निचले इलाकों के डूब जाने का ख़तरा बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि समुद्री जल स्तर में वृद्धि का प्रभाव तटवर्ती क्षेत्रों पर भी पड़ेगा। उन्होंने कहा कि ऐसे तटीय क्षेत्रों को डूबने से बचाने के लिए विशेष पहल करने की आवश्यकता है।

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