कौन हैं रमेश सोलंकी, जिनकी अंतरात्मा का ‘शिवसैनिक’ चीत्कार उठा, ‘जो राम का नहीं, वो मेरे काम का नहीं’ ?

* शिवसेना का पहला और छोटा विकेट गिरा, परंतु बड़ा संदेश देते हुए

* उद्धव के CM बनने का मार्ग प्रशस्त होते ही 9 ट्वीट कर नाता तोड़ा

विशेष रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 27 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। देश में अनगिनत राजनीतिक दल हैं और उन्हें शून्य से शिखर तक पहुँचाने में उनके धरती से जुड़े कार्यकर्ताओं के पसीने की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी शक्ति उसके कार्यकर्ता होते हैं। आज यदि केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) की सरकार है तथा नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, तो इसके पीछे भाजपा के सहस्त्रों कार्यकर्ताओं का कठोर परिश्रम और बलिदान है। ये कार्यकर्ता भविष्य के नेता बनने के निजी स्वार्थ के साथ-साथ पार्टी हित के लिए पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाते हैं, परंतु जब पार्टी अपनी विचारधारा की पटरी से उतरती है, तो जनता के बीच बड़े नेताओं से अधिक इन छोटे कार्यकर्ताओं को लज्जित होना पड़ता है।

राजनीति में कार्यकर्ता के इस महत्व को इसलिए समझाना पड़ रहा है, क्योंकि 21 वर्ष पूर्व बाळा साहेब ठाकरे के नेतृत्व और उनकी छत्रछाया में शिवसेना से जुड़ने वाले एक साधारण कार्यकर्ता ने आज बड़े ही खेद, दु:ख, पीड़ा, कष्ट और भारी मन से शिवसेना की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है। इस कार्यकर्ता का नाम रमेश सोलंकी है। महाराष्ट्र की राजनीति में धुरंधर नेताओं की कोई कमी नहीं है। ऐसे में रमेश सोलंकी बड़े-बड़े नेताओं के लिए भले ही महत्व न रखते हों, परंतु शिवसेना व उसके नेतृत्व का भारी अंतर्विरोध और परस्पर विरोधी विचारधारा वाली पार्टियों कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) से हाथ मिलाना रमेश सोलंकी को रास नहीं आया और उनकी अंतरात्मा चीत्कार उठा, ‘जो राम का नहीं, वो मेरे काम का नहीं।’

उच्च स्तर पर राजनीतिक दल और उनके नेता सत्ता व समीकरणों को साधने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं, परंतु ज़मीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को कई बार अपने नेताओं की ऐसी करतूतें रास नहीं आती। कुछ ऐसा ही हुआ था उत्तर प्रदेश में, जब समाजवादी पार्टी (एसपी-SP) के अध्यक्ष अखिलेश यादव तथा बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी-BSP) की अध्यक्ष मायावती ने ऊँचे मंचों पर हाथ मिला लिए, परंतु ज़मीन पर दो दशकों तक एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ने वाले सपा-बसपा कार्यकर्ताओं का मनमुटाव समाप्त नहीं हुआ। यही कहानी महाराष्ट्र में भी दोहराई जाएगी और इसका आरंभ रमेश सोलंकी से हुआ है।

एक के बाद एक 9 ट्वीट कर तोड़ा 21 साल पुराना नाता

रमेश सोलंकी शिवसेना में कोई बड़ा चेहरा नहीं हैं, परंतु सोशल मीडिया विशेषकर FACEBOOK और TWITTER पर अक्सर सक्रिय रहते आए हैं और कांग्रेस-एनसीपी सहित हिन्दुत्व के तथाकथित विरोधियों के विरुद्ध शिवसेना का कट्टर हिन्दुत्ववादी चेहरा बने रहे हैं, परंतु जब शिवसेना ने उसी कांग्रेस-एनसीपी से गठबंधन कर लिया, तो आहत रमेश सोलंकी ने शिवसेना से त्यागपत्र देना ही उचित समझा। ऐसा नहीं है कि रमेश सोलंकी कोई नए-नवेले नेता हैं। सोलंकी ने 18 वर्ष की आयु में 1998 में शिवसेना जॉइन की थी, जब पार्टी की कमान असली ठाकरे यानी बाळा साहेब ठाकरे के हाथों में थी, परंतु 21 वर्षों के बाद आज जब सोलंकी 39 वर्ष के हैं, तब उन्होंने भारी मन से शिवसेना से नाता तोड़ लिया। उन्होंने एनसीपी-कांग्रेस के समर्थन से शिवसेना की सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त होते ही रात 8 बजे एक बाद एक 9 ट्वीट किए, जिनमें शिवसेना से त्यागपत्र, कांग्रेस-एनसीपी से गठबंधन का विरोध और अपनी नि:स्वार्थ सेवाओं का उल्लेख किया है।

रमेश सोलंकी का पहला ट्वीट : ‘मैं 1992 में बाळा साहेब ठाकरे के निर्भय व करिश्माई नेतृत्व से प्रभावित हुआ था और 12 वर्ष की आयु में मैंने अपने हृदय और आत्मा को ठाकरे के नेतृत्व में कार्य करने के लिए तैयार कर लिया था। मैंने 1998 में अधिकृत रूप से शिवसेना जॉइन की थी।’

रमेश सोलंकी का दूसरा ट्वीट : ‘और तब से मैं बाळा साहेब की हिन्दुत्व विचारधारा का अनुकरण करते हुए कई पदों कार्य कर रहा हूँ। मैंने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। मैंने बीएमसी/विधानसभा/लोकसभा के कई चुनावों में केवल एक ही सपने व उद्देश्य के साथ कार्य किया किया और वह था हिन्दू राष्ट्र तथा कांग्रेसमुक्त भारत।’

रमेश सोलंकी का तीसरा ट्वीट : ‘मैंने अपने 21 वर्षों के कार्यकाल में पार्टी से कभी कोई पद, पदाधिकार या टिकट नहीं मांगा। मैंने दिन-रात पार्टी के आदेशों को पूरा करने में लगाए। शिवसेना ने राजनीतिक निर्णय किया और महाराष्ट्र में साथ सरकार बनाने के लिए एनसीपी-कांग्रेस से हाथ मिलाया।’

रमेश सोलंकी का चौथा ट्वीट : ‘महाराष्ट्र में सरकार बनाने व मुख्यमंत्री बनने के लिए बधाई, परंतु मेरी अंतरात्मा और विचारधारा मुझे कांग्रेस के साथ कार्य करने की अनुमति नहीं देते। मैं अधूरे मन से कार्य नहीं करना चाहता, जिससे मेरे पद, मेरे दल और मेरे साथी शिवसैनिकों व मेरे नेताओं के साथ अन्याय हो।’

रमेश सोलंकी का पाँचवाँ ट्वीट : ‘इसलिए मैं भारी मन से मेरे जीवन का अत्यंग कठोर निर्णय लेते हुए शिवसेना से त्यागपत्र दे रहा हूँ। सभी शिवसैनिक मेरे भाई-बहन हैं और रहेंगे। 21 वर्षों का यह अटूट नाता है। मैं बाळा साहेब ठाकरे के हृदय में सदैव एक शिवसैनिक के रूप में रहूँगा।’

रमेश सोलंकी का छठा ट्वीट : ‘कहावत है कि जब जहाज डूबता है, तब सबसे पहले चूहे कूद कर भागते हैं, परंतु मैं उस समय पार्टी छोड़ रहा हूँ, जब शिवसेना सरकार बना रही है।’

रमेश सोलंकी का सातवाँ ट्वीट : ‘पिछले कुछ दिनों से लोग मेरे रुख को लेकर पूछ रहे थे। मैं स्पष्ट रूप से बता देना चाहता हूँ कि जो मेरे श्री राम का नहीं है (कांग्रेस), वो मेरे किसी काम का नहीं है।’

रमेश सोलंकी का नौवाँ ट्वीट : ‘मेरा त्यागपत्र। मैं भारतीय युवा सेना (BVS)/शिवसेना के पदों तथा शिवसेना से त्यागपत्र दे रहा हूँ। मैं उद्धव टाकरे और आदित्य ठाकरे का धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने मुझे मुंबई, महाराष्ट्र व हिन्दुस्तान के लोगों की सेवा करने का अवसर दिया।’

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