EXCLUSIVE : मोदी की ‘माटी’ नहीं जानते ‘बॉडी लैंग्वेज’ पंडित !

1. 26 फरवरी, 2002 से 16 मई, 2014 तक कोई चुनाव नहीं हारने वाले मोदी पर भविष्यवाणी करने से पहले, सावधान !

2. 18 वर्षों में विरोध की 1800 आंधियों को झेलने वाले मोदी ने संगठन से लेकर सरकार तक हर मोर्चे पर फहराई विजय पताका !

3. पाँच वर्ष में पहली PC में मोदी के शांत चेहरे पर किसी ने परिश्रम की संतुष्टि और जीत की गारंटी क्यों नहीं पढ़ी ?

4. 50 दिनों के प्रचंड प्रचार में मोदी ने कंधे और हाथ उठा-उठा कर जो बॉडी लैंग्वेज दिखाई, उसे क्यों नज़रअंदाज़ कर गए पंडित ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 18 मई, 2019। नरेन्द्र मोदी ने 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अपने 17 मई, 2019 तक यानी 4 वर्ष 11 महीने 22 दिनों के कार्यकाल में शुक्रवार को पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस (PC) की। इस पीसी की पहली विशेषता तो यह थी कि मोदी पहली बार मीडिया के सामने आए और पीसी के साथ दूसरी विशेषता स्वयं मोदी ने मौन रह कर जोड़ दी। इसके साथ ही विरोधियों को बोलने का अवसर मिल गया और पिछले 18 वर्षों से गालियाँ दे रहे मोदी विरोधियों ने फिर एक बार मोदी के मौन पर हमला बोला। कुछ विरोधी तो इतने उतावले निकले कि उन्होंने यह निष्कर्ष भी निकाल लिया कि पीसी में मोदी की बॉडी लैंग्वेज बता रही थी कि वे हार मान चुके हैं।

घोर आश्चर्य होता है कि आखिर देश की राजनीति में सक्रिय ऐतिहासिक-पुराने-नए-अनुभवी-युवा राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को हो क्या गया है ? आखिर क्यों ये सभी नेता पिछले पाँच वर्षों से मोदी को मापने की कोशिश कर रहे हैं ? क्या उन्हें पता भी है कि वे जिस मापपट्टी से मोदी को माप रहे हैं, वह सही है ? इसका उत्तर मोदी विरोधी टोली के वक्तव्यों से नहीं, अपितु आचरण से मिलता है। पिछले 3 वर्षों से एकमात्र मोदी विरोध का एजेंडा लेकर चल रहे कांग्रेस सहित मोदी विरोधियों के झुंड की मापपट्टी सही नहीं थी, क्योंकि यदि सही होती, तो वास्तव में वे मोदी को माप लेते, तो भाँप भी लेते और चुनावी ज़मीन पर मोदी को एक साथ मिल कर चुनौती देते, परंतु ऐसा हुआ नहीं।

अब जबकि लोकसभा चुनाव 2019 समाप्ति की ओर है, रविवार को अंतिम चरण में केवल 8 राज्यों की केवल 59 सीटों का मतदान होना है यानी छह चरणों में देश ने 484 निर्णायक सीटों के लिए मतदान कर दिया है। अंतिम चरण के लिए भी चुनाव प्रचार अभियान शुक्रवार शाम पाँच बजे समाप्त हो गया है, तब मोदी ने पहली बार भाजपा नेता के रूप में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की, तो विरोधियों की नज़रें 28 मार्च, 2019 को मेरठ से लेकर 17 मई, 2019 को खरगोन तक की 50 दिनों की 144 रैलियों में 216 घण्टों तक देश के लोगों का सामना करने वाले नरेन्द्र मोदी के परिश्रम की संतुष्टि पर नहीं गई। उनकी नज़र पड़ी मोदी की बॉडी लैंग्वेज पर। कई राजनेताओं ने बॉडी लैंग्वेज और मौन पर प्रश्न उठाए, तो कई राजनीतिक विश्लेषक भी यह अनुमान लगाने बैठ गए कि मोदी के कंधे झुके हुए थे। किसी ने तो यहाँ तक कह दिया कि 2004 में जिस तरह वाजपेयी ने परिणाम से पहले ही हार मान ली थी, मोदी ने भी कल की पीसी में मौन साध कर और ऊर्जावान बॉडी लैंग्वेज न दिखा कर हार मान ली है, परंतु आश्चर्य की बात यह है कि बॉडी लैंग्वेज के जानकार पंडितों को 50 दिनों तक प्रचंड प्रचार अभियान में नरेन्द्र मोदी की ओर से कंधे और हाथ उठा-उठा कर दिखाई गई विजयी बॉडी लैंग्वेज क्यों नहीं दिखाई दी ?

प्रखर संघी से राजनेता तक सफलता के झंडे गाड़े

ख़ैर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सबको है, परंतु जो लोग नरेन्द्र मोदी की माटी को जानते हैं, वो मोदी की बॉडी और लैंग्वेज पर तक ही सीमित रहने वालों के अभिप्राय से संबंध नहीं रखते। मात्र 8 वर्ष की आयु यानी 1958 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ने वाले नरेन्द्र मोदी ने 1985 यानी 27 वर्षों तक स्वयंसेवक से लेकर प्रचारक और संभाग प्रचारक तक सेवाएँ दीं। इस दौरान मोदी ने आपातकाल का दंश और कारावास भी झेला। संघ के कड़े अनुशासन और प्रशिक्षण से तप कर निकले नरेन्द्र मोदी ने 1985 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP) के साथ राजनीतिक यात्रा शुरू की। संगठन में 1985 से 6 अक्टूबर, 2001 यानी 16 वर्षों तक काम करने वाले मोदी ने भाजपा को गुजरात और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में पहली बार सत्ता दिलाई। संगठन में मोदी ने हर मोर्चे पर सफलता के झंडे गाड़े। मोदी कभी हारे नहीं।

चुनावी राजनीति में अडिग मोदी

मोदी का चुनावी राजनीति में प्रवेश हुआ 7 अक्टूबर, 2001 को, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के आदेश पर मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। अब तक मोदी को विरोधी दल गंभीरता से नहीं ले रहे थे। मोदी ने राजकोट 2 विधानसभा क्षेत्र से पहला उप चुनाव लड़ा और 26 फरवरी, 2002 को वे विजयी भी हुए। बस, फिर मोदी ने यहाँ से पीछे मुड़ कर नहीं देखा और इन 18 वर्षों में विरोध की 1800 आंधियाँ झेलते हुए उन्होंने हर चुनाव में जीत ही हासिल की। यद्यपि 26 फरवरी, 2002 तक विरोधियों की ओर से नज़रअंदाज़ किए जा रहे नरेन्द्र मोदी अगले ही दिन 27 फरवरी, 2002 को हुए गोधरा कांड और उसके बाद गुजरात में भड़के दंगों के चलते विरोधियों के लिए केन्द्र की वाजपेयी सरकार और गुजरात की भाजपा सरकार पर निशाना साधने के लिए हथियार बन गए। गुजरात दंगों में कथित भूमिका को लेकर जहाँ विरोधियों ने मोदी के विरुद्ध हमला करते हुए उनकी सरकार को बर्खास्त करने की मांग शुरू कर दी, तो वाजपेयी ने गुजरात दौरे के दौरान मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह देकर भाजपा के भीतर भी मोदी विरोधी गुट को हवा दी, परंतु मोदी ने गुजरात विधानसभा चुनाव 2002 जीत कर पार्टी के भीतरी और बाहरी विरोधियों की हवा निकाल दी। मोदी ने इसके बाद गुजरात विधानसभा चुनाव 2007 में भी जीत का परचम लहराया, तो विरोधियों के स्वर मंद पड़ने लगे, परंतु 2012 आते-आते नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में विकास की ऐसी हवा बहाई, जिससे पूरा देश प्रभावित हुआ। यही कारण है कि भाजपा के भीतर और देश की आम जनता में मोदी सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में उभरने लगे और इस उभार पर मुहर लगाई गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 ने, जिसमें मोदी ने लगातार तीसरी बार जीत हासिल की।

2002 से जारी विजय यात्रा पर संदेह कैसा ?

गुजरात दंगों के कारण भाजपा के कुछ नेताओं के साथ ही पूरे देश के लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं की गालियाँ खा चुके नरेन्द्र मोदी के लिए 2002 से शुरू हुई विजय यात्रा में 2012 की विजय सबसे महत्वपूर्ण सिद्ध हुई और जनता के बीच लोकप्रियता तथा पार्टी के भीतर वाजपेयी की निष्क्रियता और लालकृष्ण आडवाणी की अप्रासंगिकता के चलते नरेन्द्र मोदी को लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया। गुजरात में 13 वर्षों के शासन के दौरान एकमात्र 2002 के दंगों को छोड़ कर हर क्षेत्र में सराहनीय काम करने वाले नरेन्द्र मोदी को लेकर 2014 में राजनीतिक पंडित भविष्यवाणियाँ कर रहे थे कि यह देश का चुनाव है, एक छोटे-से राज्य का नहीं। देश में इतने धर्म, इतनी जातियाँ, इतनी बोलियाँ, इतने गाँव, इतने शहर जैसे तर्क देकर भविष्यवाणियाँ की जा रही थीं कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा का बहुमत तो क्या, बहुमत के करीब पहुँचना भी संभव नहीं है, परंतु यह मोदी की उस माटी का ही कमाल था, जिसने 13 वर्षों तक घोर राजनीतिक घृणा और विरोध सहन करने के बावजूद देश के लोगों के दिल में जगह बनाई और 30 वर्षों बाद भाजपा को पूर्ण बहुमत दिलाया। ऐसे में 2002 से शुरू हुई विजय यात्रा 2019 में आकर रुक जाने को लेकर संदेह जताने वालों को मानसिक रूप से दिवालियेपन का शिकार ही साबित करेंगे मोदी।

पंडितों की बार-बार हुई पिटाई और इस बार भी पिटेंगे

मोदी जब से केन्द्र की राजनीति में आए, तब से उनके विरोधियों की सूची लगातार लम्बी ही होती चली गई, परंतु मोदी ने बिना रुके-बिना थके 18 वर्षों से हर दिन 18 घण्टे काम ही किया और उसी के बल पर वे 2019 में भी जनता के बीच गए। पिछले पाँच वर्षों में प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने पूरी दुनिया में भारत का डंका बजाया। पड़ोसी शत्रुओं पाकिस्तान को सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और अभिनंदन वर्तमान की वापसी तक के पूरे घटनाक्रम में पस्त किया, तो चालाक चीन को डोकलाम से लेकर मसूद अज़हर तक के मुद्दे पर पूरी दुनिया के सामने झुका कर चित्त किया। देश में विकास कार्यों पर ध्यान दिया। पार्टी के प्रचारक के रूप में काम करते वक्त भी मोदी ने प्रधानमंत्री पद के दायित्व से कभी दूरी नहीं बनाई। चुनावी सरगर्मी के बीच भी मोदी ने देश पर आए फानी चक्रवात संकट से निपटने में मुस्तैदी दिखाई। न कोई छुट्टी, न कोई पिकनिक। दूसरी तरफ विरोधियों ने इन पाँच वर्षों में केवल मोदी की बॉडी और लैंग्वेज को ही मुद्दा बनाया। देह से किए जा रहे कार्यों की आलोचना की, तो मुँह से बोली जा रही भाषा पर प्रश्न उठाए। मोदी की इस कार्यशैली को नहीं जानने वाले और उनके विरोधियों के कुतर्कों पर विश्वास करके अनेक बार राजनीतिक और चुनावी पंडितों ने मोदी पर ग़लत भविष्यवाणियाँ कर मुँह की खाई है। 2002 में जब पूरे देश में मोदी विरोध की आंधी थी, तब मोदी ने गुजरात विधानसभा चुनाव जीत कर सारे राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक पंडितों की बुरी पिटाई कर दी थी। उसके बाद ये तथाकथित पंडित 2007 और 2012 के चुनाव में मौन ही रहे, परंतु 2014 के चुनाव में देश में चल रही मोदी लहर को भाँपने में फिर पंडितों को विफलता मिली। मोदी की अनुपस्थिति में पहली बार जब गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 हुए, तब भी कांग्रेस ने कुछ मोदी विरोधी सामाजिक नेताओं के कंधों का सहारे लेकर भाजपा को हराने का प्रयास किया, परंतु मोदी ने ऐन वक्त पर भाजपा को गुजरात में लगातार सातवीं विधानसभा चुनाव जीत दिलवाई। मोदी की ग़ैरहाजिरी में भाजपा की हार निश्चित मानने वाले राजनीतिक-चुनावी पंडितों और मोदी विरोधियों को मुँह की खानी पड़ी। आपको बता दें कि इन पंडितों में वे सभी शामिल हैं, जिनका एजेंडा केवल मोदी विरोध का है। इसीलिए एकसूत्री एजेंडा पर काम करने वालों ने शुक्रवार को नरेन्द्र मोदी की पीसी में भी उनकी बॉडी लैंग्वेज के आधार पर भविष्यवाणी करके अफवाहें फैलाना शुरू कर दिया कि मोदी हार मान चुके हैं। भले इन तथाकथित पंडितों को शांत बैठे मोदी के भीतर चुनाव जीतने के लिए किए गए अथक परिश्रम की संतुष्टि और जीत की गारंटी का विश्वास नहीं दिखाई दिया, परंतु मोदी को क़रीब से जानने वाला देश का हर नागरिक जानता है कि मोदी किस मिट्टी के बने हैं ? मोदी की यह मिट्टी ही इन बॉडी लैंग्वेज के जानकार पंडितों की फिर एक बार पिटाई करने वाली है।

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