विचित्र विडंबना : राहुल को अपने पिता राजीव की ही पहल EVM पर नहीं है विश्वास ! सवाल उठाने वाले दलों के इन 10 मुख्यमंत्रियों को कुर्सी पर बने रहने का अधिकार है ?

लोकसभा चुनाव 2019 में पहले चरण में 20 राज्यों की 91 सीटों के लिए मतदान हो चुका है और यह मतदान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के जरिए हुआ है। अभी छह और चरणों का मतदान हो, उससे पहले फिर एक बार ईवीएम को लेकर सत्तारूढ़ NDA-BJP को छोड़ लगभग सभी विपक्षी राजनीतिक दलों ने फिर एक बार ईवीए को लेकर रोना-पीटना शुरू कर दिया है।

भारतीय लोकतंत्र में ईवीएम का पहला उपयोग 37 वर्ष पहले 1982 में केरल के परूर विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में 50 प्रतिशत मतदान केन्द्रों पर किया गया था और तब केन्द्र में कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी की सरकार थी। पूरे देश में ईवीएम का उपयोग करने में चुनाव आयोग (EC) को 16 साल लग गए। ऐसा तब संभव हुआ, जब दिसम्बर-1988 में तत्कालीन कांग्रेस नेता राजीव गांधी की सरकार ने संसद में भारतीय जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में नई धारा 61ए जोड़ी। इस तरह देखा जाए, तो देश में ईवीएम से मतदान कराने का मार्ग प्रशस्त किया दिवंगत राजीव गांधी ने, परंतु यह कैसी विडंबना है कि दिवंगत राजीव के पुत्र और आज की कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को अपने ही पिता की पहल ईवीएम पर विश्वास नहीं है।

नवम्बर-1998 के बाद शुरू हुआ ईवीएम का देशव्यापी उपयोग

यद्यपि राजीव गांधी सरकार ने तो उच्चतम् न्यायालय के निर्देश पर 1988 में ही ईवीएम के उपयोग के लिए कानून बना दिया था, परंतु ईवीएम का देशव्यापी उपयोग शुरू करने में 10 वर्ष का समय लग गया, क्योंकि केन्द्र सरकार, चुनाव आयोग और सभी राजनीतिक दल ईवीएम की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करने की प्रक्रिया में जुटे थे और अंतत: नवम्बर-1998 के बाद पूरे देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों में ईवीएम के आंशिक उपयोग का आरंभ हुआ।

मोदी-भाजपा के जीतते ही मचा घमासान

लोकसभा चुनाव 2014 में पहली बार पूरे देश में ईवीएम से मतदान कराया गया। सभी जानते हैं कि 2014 में पूरे देश में मोदी लहर थी। ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर हालाँकि 2014 से पहले भी सवाल उठते रहे। सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया, परंतु सवाल उठाने वाले ईवीएम के उपयोग पर रोक लगवाने में विफल रहे, परंतु 2014 में जब भाजपा भारी बहुमत से विजयी हुई और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो मोदी लहर में टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरे विपक्ष ने ईवीएम पर निशाना साधना शुरू किया।

ईवीएम पर संदेह है, तो कुर्सी छोड़ें 10 मुख्यमंत्री

ऐसा नहीं है कि ईवीएम के देश व्यापी उपयोग और लोकसभा चुनाव 2014 में मिली भारी सफलता के बाद भाजपा को हार का सामना ही न करना पड़ा हो, परंतु इस एकमात्र पार्टी ने अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर नहीं फोड़ा। दूसरी तरफ हार के लिए लगातार ईवीएम को जिम्मेदार ठहराने वाले कांग्रेस सहित सभी विरोधी दल चुनाव जीतने पर ईवीएम को लेकर कुछ नहीं कहते। यदि विपक्षी दलों को ईवीएम पर विश्वास नहीं है, तो उन्हें हार और जीत, दोनों ही परिस्थितियों में ईवीएम पर सवाल उठाने चाहिए, लेकिन ईवीएम पर दोषारोपण करने के बावजूद देश के 10 राज्य ऐसे हैं, जहाँ सवाल उठाने वाले राजनीतिक दलों की ही सरकार है। ऐसे में ईवीएम पर सवाल उठाने से पहले क्या इन सरकारों और उनके मुख्यमंत्रियों को कुर्सी नहीं छोड़ देनी चाहिए ?

अरविंद केजरीवाल

AAP MLA disqualification

ईवीएम का भारी विरोध करने वालों की सूची में सबसे मुखर हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। वे 2015 में फूले नहीं समा रहे थे, जब ईवीएम के जरिए दिल्ली की जनता ने उनकी आम आदमी पार्टी (AAP-आआपा) को 70 में 67 सीटें देकर केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाया था।

चंद्रबाबू नायडू

ईवीएम पर नए सिरे से बवाल छेड़ने वाले तेलुगु देशम् पार्टी (TPD) के मुखिया चंद्रबाबू नायडू भी 2014 में इसी ईवीएम से हुए मतदान में जीत कर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे।

के. चंद्रशेखर राव

इसी सूची में तेलंगाणा राष्ट्र समिति (TRS) के मुखिया के. चंद्रशेखर राव (KCR) भी हैं, जो 2018 में ही ईवीएम से हुए मतदान में मुख्यमंत्री बने हैं।

ममता बैनर्जी

तृणमूल कांग्रेस (TMC) की मुखिया ममता बैनर्जी ईवीएम पर सवाल उठाने वालों में एक और प्रमुख चेहरा हैं। 2011 से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी बैठीं ममता क्या 2016 का चुनाव भूल गईं, जब ईवीएम से हुए मतदान में टीएमसी को भारी बहुमत मिला और आज भी वे मुख्यमंत्री बनी हुई हैं ?

विजयन-नारायणसामी

ईवीएम में धांधली के कांग्रेस और राहुल के आरोपों के साथ वामपंथी दल भी कंधे से कंधा मिला कर खड़े हैं, तो उन्हें भी केरल और पुड्डुचेरी की गद्दी छोड़ देनी चाहिए। 2016 में ईवीएम से हुए मतदान के जरिए ही केरल में पी. विजयन और पुड्डुचेरी में वी. नारायणसामी मुख्यमंत्री बने हैं।

कमलनाथ-गहलोत-बघेल

अब बात करते हैं कांग्रेस की। देश में आखिरी चुनाव दिसम्बर-2018 में पाँच राज्यों में हुए, जहाँ तीन में कांग्रेस ने सत्ता हासिल की। ये चुनाव भी ईवीएम से ही हुए। यदि कांग्रेस और राहुल को ईवीएम पर संदेह है, तो क्या राहुल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को त्यागपत्र देने को कहेंगे ?

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