और 491 वर्ष पुराने अयोध्या विवाद का हुआ सुखद अंत, प्रशस्त हुआ राम मंदिर निर्माण का मार्ग

* सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक बहुप्रतीक्षित निर्णय

* विवादास्पद भूमि राम जन्म भूमि न्यास को देने का आदेश

* मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ भूमि दी जाए

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 9 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। 9 नवंबर 2019 शनिवार का दिन भारत के इतिहास में ‘स्वर्णिम दिवस’ के रूप में जुड़ गया। क्योंकि आज के दिन अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्ज़िद की भूमि पर अधिकार को लेकर चल रहे लगभग 5 सदी पुराने विवाद का सुखद और शांतिपूर्ण अंत आया है। देश की सबसे बड़ी अदालत के पाँच न्यायमूर्तियों ने अत्यंत संतुलित निर्णय करके दोनों पक्षों के हितों की रक्षा की। इसी के साथ अयोध्या में विवादास्पद भूमि पर भगवान राम का भव्य मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया और मस्ज़िद को भी विवादास्पद भूमि से दूर अन्य स्थल पर 5 एकड़ भूमि देने का आदेश दिया गया है। देश भर में सर्वोच्च अदालत के फैसले का स्वागत किया जा रहा है। दोनों ही पक्षों ने शीर्ष अदालत के फैसले को स्वीकार कर लिया है। सर्वोच्च अदालत के पाँचों न्यायमूर्तियों ने आपसी सहमति से निर्णय सुनाया है। पिछले 70 वर्ष से तंबू में बिराजमान रामलला का मंदिर का इंतज़ार आज खत्म हो गया।

यह है सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पाँच सदस्यीय खंडपीठ ने अयोध्या में राम जन्मभूमि विवाद पर 9 नवंबर 2019 शनिवार को ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। इस खंडपीठ में अन्य न्यायमूर्ति जस्टिस एस. ए. बोबड़े, जस्टिस डी. वाय. चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर शामिल थे। शनिवार सुबह 10.30 बजे न्यायमूर्तियों ने अपना-अपना सीलबंद कवर खोला और एक-एक करके अपना-अपना निर्णय पढ़ना शुरू किया था। लगभग एक घण्टे बाद अदालत का निर्णय साफ हुआ कि अयोध्या में जिस भूमि को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष में विवाद था, उस भूमि पर दोनों ही पक्ष अपना-अपना अधिकार साबित करने में विफल रहे हैं। चूँकि यह भूमि सरकारी रिकॉर्ड में सरकारी भूमि के रूप में दर्ज है और पुरातात्विक शोध में भूमि की खुदाई के दौरान बाबरी मस्ज़िद के विवादास्पद ढाँचे के नीचे राम मंदिर होने के प्रमाण मिले हैं, इसलिये अदालत ने रामलला को इस भूमि का अधिकारी माना है और सरकार को यह 2.77 एकड़ भूमि भव्य मंदिर निर्माण के लिये तीन महीने के भीतर ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया है। साथ ही अदालत ने सरकार को मुस्लिम पक्ष को नमाज के लिये मस्ज़िद बनाने हेतु सुन्नी वक्फ बोर्ड को अन्यत्र 5 एकड़ भूमि आबंटित करने का भी आदेश दिया। इस प्रकार अदालत ने दोनों पक्षों के पक्ष संतुलित न्याय किया है। अदालत ने राम जन्म भूमि स्थल पर निर्मोही अखाड़ा के दावों को खारिज कर दिया।

कलियुग में 70 साल में खत्म हुआ राम का वनवास

बड़ी बात यह रही कि अदालत का निर्णय पाँच न्यायधीशों में से 3-2 या 4-1 के बहुमत से नहीं, अपितु पाँचों जजों की आम सहमति से दिया गया है, जो भारत की विविधता में एकता, भाईचारे, सहिष्णुता, सौहार्द और शांति का प्रतीक है। दोनों ही पक्षों (हिन्दू और मुसलमानों) ने सुप्रीम निर्णय का सम्मान करते हुए उसे स्वीकार किया है। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि वह शीर्ष अदालत के निर्णय से संतुष्ट नहीं है, परंतु शीर्ष अदालत के निर्णय का सम्मान करते हुए उसे स्वीकार करता है। इस प्रकार लगभग 5 सदियों से चले आ रहे विवाद का आज सुखद अंत आया है। रामलला (भगवान राम का शिशु स्वरूप) जो अयोध्या में पिछले लगभग 70 वर्ष से एक तंबू में बिराजमान थे, अब उन्हें देश की सबसे बड़ी अदालत से न्याय मिला है और इसी के साथ अब अयोध्या में उनके भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया है। विश्व भर के करोड़ों हिन्दू देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले को भगवान राम के वनवास का अंत मान रहे हैं। इसे भव्य भारत की भव्य विजय और भगवान राम की विजय मान रहे हैं। करोड़ों हिन्दुओं की श्रद्धा, आस्था और भक्ति की विजय मान रहे हैं। सचमुच यह भारतीय संविधान, भारतीय कानून और देश की सबसे बड़ी अदालत की विजय है। भारत की संप्रभुता, संस्कृति, एकता, भाईचारा और शांति की विजय है। सर्वोच्च अदालत के पाँचों न्यायमूर्तियों ने आपसी सहमति से निर्णय सुनाया है, यह भी अपने आप में सामुदायिक सौहार्द की विजय है।

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