अयोध्या कांड समाप्त : जानिए निर्मोही अखाड़ा और राम जन्मभूमि नहीं तो किसे मिला ज़मीन का मालिकाना हक़ ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 9 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। सर्वोच्च अदालत ने अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्ज़िद वाली भूमि का विवाद शनिवार को खत्म कर दिया। बड़ी बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्ज़िद के पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से विवादास्पद भूमि पर किये जा रहे दावे को तो नकारा ही, साथ ही हिंदू पक्षकार निर्मोही अखाड़ा और राम जन्मभूमि ट्रस्ट के दावे को भी नकार दिया। अब सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट ने जब दोनों ही हिंदू-मुस्लिम पक्षकारों के दावों को नकार दिया तो फिर विवादास्पद भूमि का मालिकाना हक़ किसे सौंपा है ? इसका जवाब है बाल स्वरूप भगवान राम यानी रामलला बने हैं 2.77 एकड़ ज़मीन के नये स्वामी!

सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि मुस्लिम पक्षकार विवादास्पद भूमि पर अपना एकाधिकार सिद्ध करने में सफल नहीं हो सका है। इसलिये अदालत ने सुन्नी वक्फ बोर्ड के ज़मीन पर दावे को नकार दिया। ऐसा ही हिंदू पक्षकारों के साथ भी हुआ और अदालत ने निर्मोही अखाड़े के दावे को खारिज कर दिया। अदालत ने निर्मोही अखाड़े को सेवादार का अधिकार भी नहीं दिया। अदालत ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट को भी ज़मीन का मालिकाना हक़ नहीं दिया। अदालत ने बाल स्वरूप भगवान राम यानी रामलला विराजमान को विवादास्पद ज़मीन का स्वामित्व सौंप दिया, जिनका इसी भूमि पर जन्म हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि विवादास्पद भूमि के आंतरिक और बाहरी दोनों हिस्सों पर रामलला का हक़ बनता है। इसलिये अदालत ने केन्द्र सरकार को तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बना कर उसके माध्यम से इस 2.77 एकड़ भूमि पर रामलला का भव्य मंदिर बनाने का भी आदेश दिया। अदालत ने सरकार को ट्रस्ट में सदस्यों को चुनने का अधिकार भी दिया है। तीन महीने के भीतर ट्रस्ट बनने के बाद विवादित भूमि और अधिगृहित भूमि के बाकी हिस्से को इस ट्रस्ट के सुपुर्द किया जाएगा। इसके बाद यही ट्रस्ट इस भूमि पर राम मंदिर निर्माण की रूपरेखा तैयार करेगा। निर्मोही अखाड़े को इस ट्रस्ट में जगह दिये जाने की संभावना है। इस प्रकार मंदिर के निर्माण में उसका सहयोग होगा।

क्या है निर्मोही अखाड़ा ?

निर्मोही अखाड़ा पहली बार 1959 में तब चर्चा में आया था जब उसने विवादास्पद ढाँचे को लेकर पहली बार अदालत में एक पक्षकार के रूप में याचिका दायर की थी। उसी ने विवादास्पद भूमि पर स्वामित्व का दावा करते हुए कहा था कि अदालत की ओर से नियुक्त रिसीवर हटाया जाये। निर्मोही अखाड़ा स्वयं को उस स्थल का संरक्षक बताता रहा है, जिस स्थल पर भगवान रामलला का जन्म हुआ था। 1885 में अयोध्या मामले में सबसे पहली कानूनी प्रक्रिया भी इसी अखाड़े के महंत रघुवीर दास ने शुरू कराई थी। महंत रघुवीर दास ने याचिका दायर करके राम चबूतरे पर छतरी बनाने की अनुमति माँगी थी, परंतु एक वर्ष बाद फैजाबाद की जिला अदालत ने अनुरोध को खारिज कर दिया था। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद कोर्ट ने अपने निर्णय में विवादास्पद भूमि को 3 हिस्सों में बाँटा था, जिसमें से एक तिहाई हिस्सा निर्मोही अखाड़े, दूसरा हिस्सा रामलला विराजमान और आसपास की भूमि राम मंदिर को देने की बात कही थी। हाईकोर्ट ने एक तिहाई भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी थी। हाईकोर्ट के निर्णय को सभी पक्षकारों ने मानने से इनकार कर दिया और इस निर्णय के विरुद्ध उसी साल सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के लिये 14 अलग-अलग याचिकाएँ दायर की गई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह मामला अलग-अलग कारणों से 9 वर्ष तक लटका रहा। तत्पश्चात् मुख्य न्यायमूर्ति जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व में पाँच सदस्यीय खंडपीठ का गठन करके गत 6 अगस्त से मामले की दैनिक सुनवाई शुरू की थी। 40 दिन दलीलें सुनने के बाद 16 अक्टूबर को अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा था। शनिवार को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को पूरी तरह से बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद भूमि का मालिकाना हक़ वहाँ बिराजमान रामलला को सौंपा है, निर्मोही अखाड़े और राम जन्मभूमि ट्रस्ट को भी इस भूमि के मालिकाना हक़ से अलग कर दिया है और सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावे को भी खारिज कर दिया है।

कौन हैं रामलला विराजमान ?

22 और 23 दिसंबर 1949 की रात को सेवादार अभय रामदास और उनके साथियों ने राम-जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियों को दीवार फाँद कर मस्ज़िद के अंदरूनी भाग में मुख्य गुंबद के नीचे वाले कमरे में रख दिया था और अगली सुबह यह प्रचार किया था कि भगवान राम ने वहाँ प्रकट होकर अपने जन्म स्थान पर पुनः कब्जा कर लिया है। इससे पहले सदियों तक यह मूर्तियाँ मस्ज़िद के बाहर राम चबूतरे पर बिराजमान थीं और वहीं पर सीता रसोई जिसे कौशल्या रसोई भी कहते हैं, उसमें रामलला के लिये भोग बनता था। यह राम चबूतरा और सीता रसोई निर्मोही अखाड़े के नियंत्रण में थे और इसी अखाड़े के साधु-संन्यासी यहाँ रामलला की पूजा-पाठ आदि का विधान करते थे। अब अदालत के आदेश से निर्मोही अखाड़े से अलग करके रामलला विराजमान के लिये अलग से ट्रस्ट बनाया जाएगा और उसी ट्रस्ट के माध्यम से इस भूमि पर जहाँ भगवान राम का जन्म हुआ था, भव्य मंदिर का निर्माण किया जाएगा।

क्या है राम जन्मभूमि न्यास ?

1989 में विश्व हिंदू परिषद के नेता और सेवा निवृत्त जज देवकीनंदन अग्रवाल ने 1 जुलाई को भगवान राम के मित्र के रूप में फैजाबाद की अदालत में पाँचवां मुकदमा दायर किया था। इस याचिका में स्वीकार किया गया था कि 23 दिसंबर 1949 की रात को राम चबूतरे की मूर्तियों को मस्जिद के अंदर रखा गया था। इसी के साथ यह भी दावा किया गया था कि यह भगवान राम का जन्म स्थान है और जन्म स्थान तथा भगवान राम दोनों ही पूज्यनीय हैं, वही इस संपत्ति के मालिक हैं। इसी मुकदमे में पहली बार राम जन्म भूमि न्यास का जिक्र किया गया था और कहा गया था कि यह न्यास इस स्थान पर एक विशाल मंदिर बनाना चाहता है। इसके बाद इस दावे में इस न्यास को भी प्रतिवादी बनाया गया था। विहिप नेता अशोक सिंघल इस न्यास के मुख्य पदाधिकारी थे। इस प्रकार इस न्यास के नाम से विश्व हिंदू परिषद परोक्ष रूप से पक्षकार बनी थी।

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