जिसका सान्निध्य आपको सिद्ध करता है भारतीय, उसका आज है BIRTH DAY : सिर झुका कर कीजिए SALUTE !

कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 22 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। किसी भी देश के स्वाभिमान का चिह्न उसका राष्ट्र ध्वज होता है। भारत का भी अपना एक राष्ट्र ध्वज है, जो पूरे विश्व में भारत का प्रतिनिधित्व करता है। तीन रंगों के बने इस तिरंगे तले खड़ा हर व्यक्ति जाति-धर्म से परे केवल और केवल भारतीय कहलाता है। भारतीय तिरंगे के लिए आज 22 जुलाई का दिन ऐतिहासिक दिन है। यही वह दिन था, जिसके चलते आज हमें अपनी राष्ट्रीयता और भारतीयता की पहचान दिलाने वाला तिरंगा राष्ट्र ध्वज मिला।

भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनेक प्रकार के क्रांतिकारी ध्वजों का उदय हुआ, परंतु स्वतंत्र भारत ने जिस तिरंगे ध्वज को राष्ट्र ध्वज के रूप में अपनाया, उस तिरंगे की यात्रा को आज 72 वर्ष पूर्ण हुए हैं। आज से ठीक 72 वर्ष पहले भारतीय संविधान सभा ने तिरंगे को राष्ट्र ध्वज के रूप में स्वीकृति प्रदान की थी। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि भारत को स्वतंत्रता तो 15 अगस्त, 1947 को मिली, परंतु तिरंगे की नींव स्वतंत्रता से 24 दिन पहले ही पड़ गई थी। भारतीय संविधान सभा ने 22 जुलाई, 1947 को ऊपर केसरी, मध्य में सफेद और नीचे हरे यानी तीन रंगों वाले और सफेद रंग पर अशोक चक्र का चिह्न रखने वाले राष्ट्र ध्वज तिरंगे को भारत का राष्ट्र ध्वज घोषित किया था। 15 अगस्त, 1947 को प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा की ओर से स्वीकृत तिरंगे को पहली बार लाल किले की प्राचीर पर फहराया था।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले और हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देने वाले तिरंगे का पहला विचार महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय के मन में उठा था। यह विचार उस समय उठा था, जब फ्रांस में क्रांति चल रही थी। यह क्रांति फ्रांस के तिरंगे झंडे तले हुई थी। यह झंडा फ्रांस की बुनियादी समानता, भातृभाव और स्वतंत्रता की भावना से ओतप्रोत था। राजा राममोहन राय ने फ्रांस का तिरंगा झंडे को ही अपना आदर्श बना लिया। इसी दौरान अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया। इसके विरुद्ध पूरे देश में बंग भंग विरोधी आंदोलन छिड़ गया। इस आंदोलन को छत्रछाया देने के लिए एक राष्ट्र ध्वज की आवश्यकता की महसूस की गई और फ्रांस के राष्ट्र ध्वज को ही सामान्य परिवर्तन के साथ भारतीय राष्ट्र ध्वज के रूप में अपना लिया गया। इस तरह तैयार हुए प्रथम राष्ट्र ध्वज को 7 अगस्त, 1860 को कोलकाता के फेडरेशन हॉल में सर सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी की अध्यक्षता में पहली लामी दी गई। एक अन्य जानकारी के अनुसार प्रथम ध्वजारोहण समारोह कोलकाता के पारसी बगानस्क्वेयर ग्रीन पार्क में हुआ था। इस तिरंगे ध्वज में लाल, पीले और हरके रंग के तीन पट्टे थे। लाल पट्टे में चंद्र तारक, पारसियों के प्रतीक के रूप में सूर्य और बीच वाले पट्टे में गहरे आसमानी रंग से वंदे मातरम् लिखा हुआ था।

मिदनापुर के एक क्रांतिकारी हेमचंद्र कानुंगो जब बम बनाने का प्रशिक्षण लेने फ्रांस गए, तब वहाँ उन्होंने मैडम भीकाईजी कामा को यह राष्ट्र ध्वज दिखाया। भारत से निर्वासित गुजरात के नवसारी मूल की कामा ने 18 अगस्त, 1807 को जर्मनी के स्टुअर्ट गार्ड में आयोजित विश्व समाजवादी कांग्रेस के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह राष्ट्र ध्वज फहराया। ब्रिटन ने इस सम्मेलन में हिन्दुस्तान की ओर से यूनियन जैक नाम का ध्वज फहराया था, परंतु कामा ने इस ध्वज को हटवा कर भारतीय ध्वज फहराया। इस ध्वज में लाल पट्टे में एक कमल तथा भारतीय संस्कृति के सप्तर्षियों के सूचक सात तारक थे। इसके बाद 1916 में होमरूल आंदोलन के समय राष्ट्र ध्वज पर पुनर्विचार किया गया और स्वराज की कल्पना के अनुसार उसे नया रूप दिया गया। इस ध्वज में तीन चौड़े पट्टों के स्थान पर पाँच लाल, चार हरे सहित कुल नए सँकरे पट्टे थे। उनके ऊपर ठीक मध्य में सप्तर्षि तारे और बाईं ओर शीर्ष पर मुस्लिमों का प्रतीक चंद्र तारा था। बाईं ओर एक चौथाई भाग में यूनियन जैक को शामिल किया गया था।

वर्ष 1920 में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में मोहनदास करमचंद गांधी का प्रवेश हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर गांधीजी के हाथों में आते ही फिर एक बार राष्ट्र ध्वज पर मंथन शुरू हुआ। 1921 में महात्मा गांधी ने सफेद, लाल और हरे रंग के पट्टे वाले ध्वज का राष्ट्र ध्वज के रूप में चयन किया। अहमदाबाद में 1922 में आयोजित कांग्रेस सम्मेलन में पहली बार महात्मा गांधी की ओर से स्वीकृत राष्ट्र ध्वज को फहराया गया और सलामी दी गई। सिखों ने इस ध्वज में काले रंग का समावेश करने का आग्रह किया, परंतु गांधीजी ने रंगों का अर्थघटन साम्प्रदायिक रूप से न करने का आग्रह किया। 1931 में इस राष्ट्र ध्वज में लाल रंग के स्थान पर शौर्य तथा समर्पण के प्रतीक केसरी रंग का समावेश किया गया। क्रम में भी फेरबदल करते हुए ऊपर केसरी, बीच में सफेद और नीचे हरे रंग को रखा गया। मध्य में स्थित सफेद पट्टे में उद्योग के प्रतीक चरखा का चिह्न रखा गया। इस ध्वज में केसरी रंग शौर्य व समर्पण, हरा रंग दाक्षिण्य व श्रद्धा तथा सफेद रंग शांति और सत्य का प्रतिपादन करता था। 1947 में जब स्वतंत्रता मिली, तब इसी तिरंगे को राष्ट्र ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया गया।

15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के बाद प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा नियुक्त समिति ने निष्कर्ष दिया कि राष्ट्र ध्वज के मध्य में स्थित चरखे का चित्र दूसरी ओर से उल्टा दिखाई पड़ता है। समिति ने इस चरखे के स्थान पर अशोक चक्र रखने का सुझाव दिया, जो दोनों ओर से समान दिखाई दे। इस प्रकार देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त, 1947 को पहली बार लाल किले की प्राचीर से अशोक चक्र युक्त तिरंगा ध्वज फहराया। इस तिरंगे राष्ट्र ध्वज में ऊपर की ओर केसरी, मध्य में श्वेत तथा नीचे हरे रंग का पट्टा है। इस तिरंगे में तीनों पट्टों की चौड़ाई एक समान है। तिरंगे की लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 2:3 है। ध्वज पर जो प्रतीक है, वह सारनाथ में स्थित अशोक स्तंभ के शीर्ष पर के चक्र की प्रतिकृति है। यह चक्र बीच के पट्टे पर रखा गया है। सफेद रंग के पट्टे जितनी ही उसकी चौड़ाई है। गहरे नीले रंग के अशोक चक्र में 24 दाँते हैं। 22 जुलाई, 1947 को भारत की संविधान सभा ने इस तिरंगे को राष्ट्र ध्वज के रूप में स्वीकृति प्रदान की और आज यह तिरंगा पूरे 72 वर्ष का हो गया है।

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