POINT TO BE NOTED : देश में बहुदलीय चुनाव व्यवस्था ने बनाया दलों का दल-दल !

* भाजपा-कांग्रेस सहित कुल 2,416 राजनीतिक दल

* लोकसभा चुनाव 2019 के बाद बदले दो दलों के दर्जे

* EC से NDA के लिए आई दो GOOD NEWS

* NPP बनी देश की आठवीं व पूर्वोत्तर की पहली राष्ट्रीय पार्टी

* JDU बिहार-मणिपुर के बाद अब अरुणाचल में भी राज्य दल

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 8 जून, 2019। एक राजनीतिक दल की मूल भावना होती है सत्ता तक पहुँचने का लक्ष्य। हमारे देश में राजनीतिक दलों के लिए सत्ता के जो केन्द्र हैं, उनमें पंचायत-पालिका से लेकर राज्य और देश की सत्ता शामिल है। स्थानीय निकायों, राज्यों तथा देश में सत्ता हासिल करने के लिए ही किसी भी राजनीतिक दल की स्थापना होती है।

अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों में द्विपक्षीय शासन और चुनाव व्यवस्था है, परंतु भारत में बहुदलीय चुनाव व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र, संविधान और बहुदलीय चुनाव व्यवस्था देश के प्रत्येक नागरिक को पंचायत सदस्य से अध्यक्ष, पार्षद से लेकर महापौर, विधायक से लेकर मुख्यमंत्री और सांसद से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक का अवसर देता है। इसी अवसर का लाभ उठाते हुए देश में स्वतंत्रता के बाद जहाँ केवल एक राजनीतिक दल कांग्रेस थी, वहीं आज की तारीख में कुल 2,416 राजनीतिक दल हैं। इनमें स्वतंत्रता पूर्व स्थापित कांग्रेस के अलावा 2014 से केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) शामिल हैं। स्वतंत्र भारत के 72 वर्षों के इतिहास में कांग्रेस के बाद सैकड़ों राजनीतिक दलों का उदय और अस्त हुआ। कुछ का अस्तित्व बना रहा, तो कुछ सदैव के लिए लुप्त हो गए।

चुनाव आयोग (EC) के वर्तमान आँकड़ों के अनुसार देश में 2,416 राजनीतिक दल हैं, परंतु आपको जान कर आश्चर्य होगा कि इन राजनीतिक दलों में मई-2019 तक केवल 7 ही राष्ट्रीय राजनीतिक दल थे। इनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC), भाजपा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा-CPM), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा-CPM), बहुजन समाज पार्टी (बसपा-BSP) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) शामिल थीं।

संगमा का संघर्ष रंग लाया

लोकसभा चुनाव 2019 के बाद देश के राजनीतिक दलों के दर्जे में बदलाव आया है। ईसी की ओर से जारी नए आँकड़े भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतातांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) के लिए गुड न्यूज़ है। ईसी के अनुसार कोनराड संगमा के नेतृत्व वाली नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी-NPP) अब देश की 8वीं राष्ट्रीय पार्टी बन गई है। इतना ही नहीं, एनपीपी पूर्वोत्तर की पहली राष्ट्रीय पार्टी बनी है। एनडीए के घटक दल एनपीपी के अध्यक्ष व मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पी. ए. संगमा के पुत्र हैं। संगमा ने 1973 में कांग्रेस पार्टी जॉइन कर मेघालय से राजनीतिक यात्रा आरंभ की थी, परंतु 1999 में पी. ए. संगमा ने शरद पवार और तारिक़ अनवर के साथ कांग्रेस से किनारा किया और एनसीपी की स्थापना की, परंतु बाद में शरद पवार ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया, तो संगमा ने एनसीपी से किनारा किया। वे कुछ समय के लिए ममता बैनर्जी के साथ हो लिए। अंतत: पी. ए. संगमा ने 5 जनवरी, 2013 को एनपीपी की स्थापना की। 4 मार्च, 2016 को संगमा के निधन के बाद पुत्र कोनराड ने एनपीपी की कमान संभाली और आज इस मुकाम तक पहुँचा दिया कि ईसी ने एनपीपी को राष्ट्रीय दल की मान्यता का प्रमाण पत्र सौंपा। ईसी के अनुसार हाल ही में संपन्न लोकसभा और अरुणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2019 में शानदार प्रदर्शन के चलते एनपीपी ने राष्ट्रीय दल की मान्यता के लिए जरूरी शर्तों को पूरा किया है। उल्लेखनीय है कि एनपीपी मेघालय में सत्तारूढ़ है और कोनराड मुख्यमंत्री है। अब तक एनपीपी को मेघालय, नगालैण्ड व मणिपुर में राज्य स्तरीय दल का दर्जा प्राप्त था, परंतु अरुणाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में 5 सीटें जीतने के बाद अब एनपीपी को वहाँ भी राज्य स्तरीय दर्जा मिल चुका है। चार राज्यों में राज्य स्तरीय दर्जा मिलना राष्ट्रीय राजनीतिक दल बनने की योग्यता का मानदंड है, जो एनपीपी ने पूरा किया है।

इस सफलता पर कोनराड संगमा ने अपने पिता पी. ए. संगा की तसवीर के साथ एक ट्वीट करते हुए लिखा, ‘यह बहुत भावुकता क्षण है कि पीए संगमा द्वारा स्थापित पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा मिला है। यह सिर्फ एनपीपी के लिए ही गौरव की बात नहीं है बल्कि समूचे पूर्वोत्तर के लिए एक उपलब्धि है।’

जेडीयू के भी बढ़ते कदम

ईसी की ओर से जारी आँकड़ों के अनुसार एनडीए के एक और घटक दल जनता दल ‘युनाइटेड’ (जेडीयू-JDU) के कदम भी राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त करने की ओर बढ़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव और चार राज्य विधानसभा चुनाव 2019 के बाद बिहार में भाजपा के साथ मिल कर सरकार चला रहे मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के नेतृत्व वाले जेडीयू को अरुणाचल प्रदेश में राज्य पार्टी का दर्जा मिल गया है। ईसी ने इस संबंध में विधिवत् पत्र जारी किया है। इसके साथ ही जेडीयू बिहार, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश यानी 3 राज्यों में राज्य स्तरीय दल बन गया है। जेडीयू महासचिव आफ़ाक़ खान ने बताया कि अरुणाचल विधानसभा चुनाव में जेडीयू को 9.85 प्रतिशत वोट मिले और 15 में से 7 सीटें मिलीं। पार्टी को शीघ्र ही नगालैण्ड में भी राज्य पार्टी का दर्जा मिलने की उम्मीद है, जबकि जम्मू-कश्मीर में भी पार्टी ज़ोर लगाने वाली है। खान ने बताया कि शीघ्र ही जेडीयू देश का 9वां राष्ट्रीय राजनीतिक दल बन जाएगा।

निर्धन देश में खर्चीले दलों का दल-दल

देश का हर नागरिक जानता है कि पंचायत से लेकर लोकसभा तक के लिए लड़े जाने वाले चुनाव में जीत के लिए उम्मीदवार को 5 हजार रुपए लेकर 5 करोड़ रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं। यदि मोटे तौर पर देखा जाए, तो देश में लोकसभा की 542 और 31 राज्यों की विधानसभाओ की 4,120 यानी कुल 4,662 सीटें हैं। पाँच वर्ष में एक बार अलग-अलग समय पर होने वाले चुनावों में कुल मिला कर 4,662 लोगों को विधायक और सांसद बनने का अवसर मिलता है, जिनके जरिए कोई राजनीतिक दल बहुमत वाली या गठबंधन वाली सरकार और मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री पद हासिल करता है, परंतु भारत जैसे निर्धन देश में बहुदलीय चुनाव व्यवस्था अरबों रुपए का खर्च करवा देती है। सरकारें खर्च करती हैं, चुनाव आयोग खर्च करता है, राजनीतिक दल और उनके बाद संबंधित प्रत्याशी खर्च करता है। कुल मिला कर देखा जाए, तो द्विदलीय चुनाव व्यवस्था नहीं होने के कारण देश में खर्चीले दलों का दल-दल बन चुका है। यदि एक सीट पर औसत 10 प्रत्याशी भी चुनाव मैदान में उतरते हों, तो कुल 46,620 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरते हैं। ऐसे में संसद (विधायिका), केन्द्र सरकार (कार्यपालिका) और सुप्रीम कोर्ट (न्यायपालिका) को मिल कर ऐसा कोई रास्ता अवश्य निकालना चाहिए, जिससे भारत में चुनावी खर्च में कमी लाई जा सके और उन करोड़ों-अरबों रुपयों का उपयोग राष्ट्र हित और विकास के कार्यों में किया जा सके।

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