‘प्याज तूने क्या किया’ : आखिरकार हर साल क्यों महँगे हो जाते हैं आलू, प्याज और टमाटर ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 5 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। पूरे देश में प्याज को लेकर धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। घरों से लेकर होटल तक में सलाद से प्याज गायब हो गया है। सामान्य जन की पहुँच से प्याज बाहर चला गया है। ऐसे में संसद के अंदर से लेकर बाहर तक विपक्ष भी सत्तापक्ष पर हमलावर हो गया है। ऐसे में हर किसी के मन में एक सवाल जरूर उठता होगा कि आखिरकार हर साल आलू, प्याज या टमाटर में से कोई एक चीज़ महँगी क्यों हो जाती है ? इसके पीछे के मुख्य कारणों पर नज़र डालें तो चार से पाँच प्रमुख कारण देखने को मिलते हैं। एक उपज में कमी, दूसरी भंडारण की व्यवस्था में लापरवाही, व्यापारियों की कालाबाजारी और मुनाफाखोरी तथा अंत में राजनीति। आइये विस्तार से जानते हैं।

बाढ़ और बारिश ने फसल को धो डाला

दरअसल भारत में आलू, प्याज और टमाटर यह तीनों ऐसी चीजें हैं जो शाकाहारी और माँसाहारी दोनों ही प्रकार के लोग खाते हैं। यह तीन चीजें ऐसी भी हैं, जो अधिकांश सब्जियों में मिश्रण की जाती हैं। इसलिये इन तीनों ही चीजों की खपत बहुत अधिक है। एक अनुमान के मुताबिक प्रत्येक 1000 लोगों में से 908 लोग प्याज का इस्तेमाल करते हैं। इस हिसाब से पूरे देश में 100 करोड़ से भी अधिक लोग प्याज का उपयोग करते हैं। इस खपत की तुलना में देश में प्याज का उत्पादन नहीं होता है। क्योंकि सभी राज्यों में प्याज की खेती नहीं होती है। कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 2.3 करोड़ टन प्याज का उत्पादन होता है। इसमें से लगभग 36 प्रतिशत महाराष्ट्र, 16 प्रतिशत मध्य प्रदेश, 13 प्रतिशत कर्नाटक, 6 प्रतिशत बिहार और 5 प्रतिशत प्याज का उत्पादन राजस्थान में होता है। गुजरात सहित बाकी राज्यों में प्याज का उत्पादन बहुत कम है। देश के अलग-अलग राज्यों में पूरे साल प्याज की खेती होती है। अप्रैल से अगस्त के बीच रबी फसल में लगभग 60 प्रतिशत प्याज का उत्पादन होता है, जबकि अक्टूबर से दिसंबर और जनवरी से मार्च के बीच 20-20 प्रतिशत प्याज की पैदावार होती है। जून से लेकर अक्टूबर तक का समय वर्षाकाल का होता है। कई राज्यों में भारी बारिश, बाढ़ आदि के कारण फसल बरबाद हो जाती है। भारी बारिश और बाढ़ से ही प्याज का जो भंडारण किया होता है, वह भी लापरवाही और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के अभाव में सड़ या बिगड़ जाता है। ऐसा अक्सर होता है, जो कि इस साल भी हुआ। प्याज की खेती करने वाले प्रमुख राज्यों महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, बिहार, गुजरात आदि में भारी बारिश हुई और बाढ़ के हालात रहे। इससे प्याज के उत्पादन पर गहरा असर पड़ा है।

कालाबाजारी और मुनाफाखोरी

प्याज का उत्पादन जैसे देश के 6 प्रमुख राज्यों में ही होता है, वैसे ही 50 प्रतिशत प्याज देश की 10 प्रमुख मंडियों से ही देश के विभिन्न हिस्सों में पहुँचता है। इनमें से 6 मंडियाँ महाराष्ट्र और कर्नाटक में हैं। अर्थात् कुछ गिने-चुने व्यापारियों के हाथ में 50 प्रतिशत प्याज का व्यापार रहता है। ये व्यापारी प्याज के दामों को प्रभावित करने में सक्षम हैं। सरकार की ओर से प्याज का कोई समर्थन मूल्य भी घोषित नहीं किया गया है। ऐसे में जब पैदावार होने पर बड़ी संख्या में प्याज मंडियों में पहुँचता है, तो इसके दाम गिरकर 1 रुपये किलो तक पहुँच जाते हैं। ऐसे में किसान प्याज सड़कों पर फेंक कर चले जाते हैं। सस्ते में प्याज मिलने से कालाबाजारी भी शुरू हो जाती है। जब पैदावार का समय नहीं होता है तब दाम बढ़ जाते हैं।

भंडारण की व्यवस्था में खामी से सड़ जाता है स्टॉक

सरकार हर चीज का कुछ हिस्सा अपने पास सुरक्षित रखती है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में उसे उपयोग किया जा सके। इसे बफर स्टॉक कहते हैं। केन्द्र सरकार लगभग 13,000 टन प्याज का बफर स्टॉक रखती है, परंतु हर साल यह खराब हो जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में बफर स्टॉक में रखे गये प्याज में से 6,500 टन प्याज सड़ने से खराब हो गया था।

राजनीति भी करती है दामों को प्रभावित

कहने की जरूरत तो नहीं, क्योंकि यह स्वाभाविक ही है कि बड़े-बड़े व्यापारियों के राजनेताओं तथा राजनीतिक दलों से संबंध होते हैं। ये राजनेता और राजनीतिक दल भी व्यापारियों के साथ मिलकर प्याज की राजनीति करते हैं। इस प्रकार इन कारणों से आलू, टमाटर और प्याज जैसी चीजों के दाम प्रभावित होते रहते हैं और यह सिलसिला चलता रहता है।

दामों को नियंत्रित करने के लिये सरकार ने उठाए ये कदम

इस साल नवरात्रि के बाद से प्याज के दाम बढ़ने शुरू हुए तो फिर घटने का नाम नहीं लिया, बढ़ते ही चले गये और अब स्थिति यह है कि प्याज आम आदमी की पहुँच से दूर निकल गया है। ऐसे में सरकार की ओर से पहला कदम यह उठाया गया कि उसने प्याज के निर्यात पर 29 सितंबर को रोक लगा दी और इसी दिन प्याज के भंडारण पर स्टॉक लिमिट भी लगाई। स्टॉक लिमिट को सरकार ने दो दिन पहले फिर से संशोधित किया है, ताकि जमाखोरी को रोका जा सके। इसी के साथ केन्द्र सरकार ने पहली बार प्याज का 57,000 टन का बफर स्टॉक किया। जिन राज्य सरकारों ने जब और जितना प्याज माँगा, उन्हें उतना प्याज सस्ते दामों से उपलब्ध कराया गया। केन्द्र सरकार खुद भी नाफेड और एनसीसीएफ के माध्यम से अलग-अलग जगहों पर तथा सफल, केन्द्रीय भंडार, मदर डेयरी आदि के काउंटरों से लोगों को सस्ता प्याज उपलब्ध करवा रही है। एमएमटीसी के माध्यम से सरकार प्याज का आयात भी कर रही है। इसके अलावा निजी आयातकों को भी प्रोत्साहन दे रही है। बाजार में पर्याप्त मात्रा में प्याज उपलब्ध करवा कर दामों को नियंत्रित करने के लिये सरकार ने मिस्र से 6,090 टन और तुर्की से 11,000 टन प्याज मँगवाया है, जो 15 दिसंबर से 15 जनवरी तक आएगा। तुर्की से और 4,000 टन प्याज जनवरी के मध्य तक मँगवाकर बाजार में उपलब्ध कराया जाएगा। इसके अलावा 5-5 हजार टन के तीन नये टेंडर भी निकाले गये हैं। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि अगले सप्ताह से आयातित प्याज के बाजार में आने पर प्याज के दाम घटने शुरू हो जाएँगे।

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