देखिए बॉलीवुड की इस “धन्नो” का धमाकेदार जोश, जिन्होंने 83 की उम्र में किया भरतनाट्यम !

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 27 दिसंबर, 2019 युवाPRESS। फिल्म शोले की धन्नो से तो आप परिचित ही हैं, परंतु क्या आप इस धन्नो को जानते हैं, जिन्होंने 83 की उम्र भले ही पार कर ली है, परंतु आज भी वह जब नृत्य करती हैं, तो लोग कह उठते हैं OMG। हम बात कर रहे हैं, 1961 में दिलीप कुमार की गंगा-जमुना फ़िल्म में अभिनेत्री वैजयन्ती माला की, जो एक देहाती लड़की “धन्नो” के किरदार में नज़र आईं थीं और आलोचकों ने उनके पात्र की प्रशंसा करते हुए “धन्नो” पात्र को उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय घोषित किया था। आज हम वैजयन्ती माला को चर्चा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि सोशल साइट ट्विटर पर उनका एक डांस प्रफॉमेंस बहुत ही तेज़ी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह भरतनाट्यम कर रही हैं। उम्र के इस पड़ाव पर पहुँचने का बाद भी उनका जोश वास्तव में सराहीय है।

चौकाने वाली बात तो ये है कि इस उम्र में जब लोग किसी से बात करने में भी असहाय महसूस करते हैं, उस उम्र में वैजयंती माला चेन्नई के एक स्टेज़ पर डांस परफॉमेंस कर लोगों को दंग कर रही हैं। उनके इस परफॉमेंस के पीछे एक विशेषता ये भी है कि ये डांस शो उन्हें पैसे के लिए नहीं, अपितु चैरिटी के लिए किया है।

वैजयन्ती माला ने अपने फिल्मी कैरिअर की शुरुआत 1949 में तमिल भाषीय फ़िल्म “वड़कई” से की थी, परंतु जब उन्होंने हिन्दी फ़िल्म बहार और लड़की से हिन्दी सिनेमा में कदम रखा, तो उनके हुनर का लोहा दुनिया ने माना। वैजयन्ती माला बाली रमन का जन्म 13 अगस्त, 1936 को ब्रिटिश भारत के मद्रास प्रैज़िडन्सी, त्रिपलिकेन (अब तमिलनाडु) में हुआ था। वे हिन्दी फिल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री, राजनीतिज्ञा भरतनाट्यम की नृत्यांगना, कर्नाटक गायिका, नृत्य प्रशिक्षक और सांसद रही हैं।

वैजयन्ती माला ने हिन्दी फिल्मों पर लगभग 2 दशकों तक राज किया है। दक्षिण भारत से आकर राष्ट्रीय अभिनेत्री का दर्ज़ा पाने वाली वे पहली महिला हैं। वैजयन्ती माला ने हिन्दी फिल्मों में अपने नृत्य के दम पर ही अर्थ-शास्त्रीय नृत्य के लिए जगह बनाई थी। वैजयन्ती माला के थिरकते पाँवों ने उसे “ट्विन्कल टोज़” (twinkle toes) का खिताब दिलाया। 1950-1960 के दशक में उन्हें प्रथम श्रेणी की नायिका के नाम से जाना जाता था। 1962 से वैजयन्ती माला की अधिकांश फ़िल्में या तो औसत दर्जे की सफलता प्राप्त करने लगी या फिर नाकाम होने लगी। 1964 में संगम फ़िल्म की सफलता ने उसके कैरिअर को एक नई ऊँचाई पहुँचाई। वैजयन्ती माला को बारहवीं फ़िल्मफ़ेयर समारोह में संगम फ़िल्म में राधा के रोल के लिए पुरस्कृत किया गया था। ऐतिहासिक नाटक आम्रपाली में अपनी भूमिका के लिए उन्हें आलोचकों की बहुत प्रशंसा मिली। करिअर के अंत में वैजन्ती माला ने मुख्य धारा की कुछ फिल्में जैसे कि सूरज, ज्वेल थीफ, प्रिन्स, हटी बाज़ारी और संघर्ष में काम किया। इन में से अधिकांश फिल्में वैजयन्ती माला के फिल्म उद्योग को छोड़ने के पश्चात सिनेमाघरों में देखी गईं। वैजयन्ती माला को फिल्म जगत में दिए गए अपने योगदान के लिए भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित भी किया है।

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