‘नेक’ वादे V/S ‘ख़तरनाक’ इरादे : ‘जन आवाज़’ में राष्ट्रद्रोह की छूट, ‘संकल्प पत्र’ में राष्ट्रवाद की गूंज, चुनाव आपको करना है ?

देश आज निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 130 करोड़ जनता का भविष्य चंद राजनेताओं के हाथों दाव पर लगा हुआ है। दिल्ली के सिंहासन पर सवार होने के लिए हर नेता लालायित है। यद्यपि मुख्य प्रतिस्पर्धा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP) और कांग्रेस के बीच है। दोनों पार्टियों ने जनता के बीच अपने वादे और इरादे व्यक्त कर दिए हैं, परंतु सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए तो एक बात स्पष्ट उभर कर सामने आती है और वह यह कि वादे दोनों ही पार्टियों ने किए हैं। निभाने का प्रश्न सत्ता मिलने के बाद का है, पर वादों के नेक होने या नहीं होने का अनुमान तो आप लगा ही सकते हैं।

किसी भी पार्टी के वादे नेक या बद हो सकते हैं, परंतु उन वादों में यदि ख़तरनाक इरादों की बू आती हो, तो उन पर भरोसा करना चाहिए ? भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2019 के लिए देर से ही सही, परंतु आज अपना संकल्प पत्र नामक घोषणा पत्र जारी कर दिया, तो कांग्रेस तीन दिन पहले इसे जन आवाज के नाम से जारी कर चुकी है। जनता के सामने दोनों ही पार्टियों के घोषणा पत्र है। जहाँ तक हमारी समझ जो कहती है, उसके अनुसार भाजपा के वादों में नेकनीयती स्पष्ट झलक रही है। भले ही वादे पूरे न हो सकें, परंतु पार्टी ने एक तरफ ऐसा कोई वादा नहीं किया है, जो देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करता हो। उल्टे भाजपा ने किसान, गरीब, छोटे व्यापारियों सहित जनता के तमाम वर्गों को ध्यान में रखते हुए भी राष्ट्रवाद को सर्वोपरि रखा है। भाजपा देश की एकमात्र पार्टी है, जिसने अपने घोषणा पत्र में हर बार की तरह इस बार भी छाती ठोक कर कहा कि कश्मीर से धारा 370, 56ए हटाएँगे और अयोध्या में राम मंदिर ही बने, इसके लिए हर संभव संभावनाएँ तलाशेंगे। भाजपा ने 2014 में भी कई वादे किए थे और 2019 में भी कई वादे दोहराए हैं। यदि वादे किए हैं और वे नेक हैं, तो उन्होंने निभाने में देरी को जनता धैर्यपूर्वक सहन कर सकती है। यदि जनता को लगता है कि भाजपा के वादों में नेकी और नीयती दोनों ही है, तो जनता को उन पर भरोसा करना चाहिए, क्योंकि भाजपा के वादों के पीछे इरादे तो नेक ही हैं।

दूसरी तरफ कांग्रेस का घोषणा पत्र जन आवाज़ पर ध्यान दीजिए। कांग्रेस के घोषणा पत्र में भी वादे अनेक हैं। कुछ नेक भी हैं। अच्छा है कि कांग्रेस न्यूनतम् आय योजना (NYAY) के जरिए देश के ग़रीबों की मासिक न्यूनतम् आय 12,000 रुपए करना चाहती है। पैसा कहाँ से आएगा, यह कांग्रेस को तब सोचना है, जब वह सत्ता में आएगी, परंतु क्या इस योजना के दुरुपयोग की रत्ती भर भी संभावना नहीं है ? तनिक सोचिए, जो आदमी महीने में 6,000 रुपए कमा रहा है और बाकी के 6,000 रुपए उसे सरकार देने वाली होगी, तो वह भला क्यों अपनी आय बढ़ाने के प्रयास करेगा। या तो वह कोई ऐसी नौकरी ढूँढेगा, जहाँ मासिक 12,000 से अधिक हो या फिर 12,000 से कम जितना भी वेतन मिल रहा है, उसी में पड़ा रहेगा, क्योंकि बाकी के रुपए तो सरकार देने ही वाली है। चलिए यह तो कांग्रेस की सोच का ही दोष है। इस आधार पर देश के करोड़ों ग़रीब कांग्रेस को कदाचित वोट दे भी देंगे, परंतु क्या आपने सोचा है कि 20 करोड़ ग़रीब सहित 130 करोड़ भारतीय रहते कहाँ हैं ? उत्तर आसान है भारत में। तो फिर यह सोचिए कि यदि भारत ही नहीं रहेगा, तो हम कहाँ रहेंगे ? और हम ही नहीं रहेंगे, तो उसमें ग़रीब कहाँ रहेंगे ? और ग़रीब ही नहीं रहेंगे, तो कांग्रेस न्याय के तहत किसकी ग़रीबी दूर करेगी ? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है, क्योंकि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में तीन महत्वपूर्ण वादे भी किए हैं, जिनके पीछे उसके ख़तरनाक इरादे ज़ाहिर होते हैं और जो देश की सुरक्षा के साथ सीधे-सीधे खिलवाड़ कर सकते हैं। कांग्रेस का एक वादा है देश को राष्ट्रद्रोह कानून से मुक्त करने का, दूसरा वादा है जम्मू-कश्मीर सहित पूर्वोत्तर राज्यों में अपनी जान पर खेल कर आतंकवाद और उग्रवाद का सामना कर रहे सुरक्षा जवानों के अधिकारों की रक्षा करने वाले कानून AFSPA को हटाने का और तीसरा वादा है जम्मू-कश्मीर में कश्मीरियों के पथ्थर खाकर भी कश्मीरियों और देश की रक्षा करने वाले जवानों की संख्या कम करने का वादा। मान लीजिए यदि कांग्रेस की सरकार बनी और उसने इन तीनों वादों को पूरा किया, तो देश कितने बड़े संकट में पड़ जाएगा ? इसका अंदाज़ा कदाचित राहुल गांधी को नहीं है, क्योंकि उन्हें केवल दिल्ली की कुर्सी दिखाई दे रही है। सोचिए, राष्ट्रद्रोह कानून होने के बावजूद यदि लोग भारत में रह कर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे हजार’, ‘अफज़ल हम शर्मिंदा हैं-तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं’, ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के नारे लगाने का साहस दिखा सकते हैं, तो जब यह कानून ही नहीं रहेगा, तो ऐसे लोगों को कौन नियंत्रम में रखेगा ?

हमने यहाँ आपके सामने भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही घोषणा पत्रों की सबसे महत्वपूर्ण बातें रख दी हैं। भाजपा ने इस बारे वादों का पिटारा छोटा रखा है, परंतु विवादों से बचने में वह साफ-साफ सफल रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस का घोषणा पत्र न सेना को सुहा रहा, न रक्षा विशेषज्ञों को और न ही देशभक्त लोगों को। अब देश की जनता को यह तय करना है कि वह राष्ट्रद्रोह कानून से मुक्त भारत चाहती है या राष्ट्रवाद की भावना से युक्त भारत चाहती है ?

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